मित्रों!

आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।


फ़ॉलोअर

मंगलवार, 1 सितंबर 2020

एक व्यंग्य : एक पत्र कविता चोर के नाम

एक व्यंग्य : एक पत्र 
कविता- चोर के नाम 

हे मेरे कविता प्रेमी !

सादर चरण स्पर्श

अत्र कुशलम ! तत्रास्तु ?आशा करता हूं कि आप ’चुल्लू भर पानी’ ढूँढ रहे होंगे ।

सुबह ही सुबह ,जब मेरे मित्रों ने ’ब्रेकिंग न्यूज़ ’ शैली में यह ख़बर सुनाई की मेरी एक कविता
फिर चोरी हो गई तो मेरा मन अति प्रफ़्फ़ुलित हो गया । अब मेरी कविता गीत ग़ज़ल ’चोरी’ होने के योग्य
हो गई ।बड़ी हो गईं। चोरों की नज़रों में चढ़ गई और मैं स्वयं अपनी नज़रों चढ़ गया। मेरी वह कविता चोरी कर के आप ने उसे अमर कर दिया ।

ना "ब्लाग" की सीमा हो, ना ’व्हाट्स अप" का बन्धन
मेरे गीत चुरा लेना , जब चाहे तेरा मन 

मेरे गीत चुरा कर तुम --मेरे गीत अमर कर दो
इस चोरा-चोरी की, सखे! रीति अमर कर दो 

सुबह से ही फ़ोन की घंटियाँ टनटना रही है । मित्रों की उत्सुकता है। जानना चाह्ते है कि कौन सी वह  कविता थी
जिसे ’चुरा’ कर आप ने अमरत्व प्रदान कर दिया । वे सब इस अदा से पूछ रहें कि हाय ! वो गीत उन्होने  क्यों न चुराया ।

हे प्रियवर !
तुझे  सूरज कहूँ या चन्दा ,तुझे दीप कहूँ  या तारा
मेरा नाम करेगा रौशन ,तू गीत चुरा के दुबारा

मैं कब से तरस रहा था --मेरा गीत  चुरा ले कोई--

माफ़ करना मित्र ! मारे खुशी के, मैं क्षण भर के लिए विषय पथ से भटक गया ।
आप को सूरज-चन्दा क्या कहूँ। और भी बहुत से शब्द हैं आप के लिए --चोर --चोरकट-- उच्चक्का
-चाईं--गिरहकट--उठाईगीर- --पाकेटमार--जेबकतरा--चोर -महाचोर--।किस पद्म श्री से विभूषित करूँ, महराज!
डकैत इसलिए नहीं लिख रहा हूं कि डकैतों के सम्मान में  गुस्ताखी हो जायेगी।और ’लुच्च्चा,लफ़ंगा,आवारा--दूसरी श्रेणी के शब्द हैं।

चाईं तो आप समझते होंगे ? नहीं ? तो मुगल सराय जंक्शन पर ऐसे बहुत से मिल जायेंगे कहते हुए
"सौ चाईं --एक मुगलसराई"
कभी पाला नहीं पड़ा । बस सुना ही सुना है ।

हे मित्र प्रवर !
आप स्वयं पर शर्मिन्दा न हों ।
बहुत से लोग ऐसा काम करते रहते हैं। कोई दिल चुराता है ,कोई नज़र चुराता है, कोई "टैक्स’ चुराता है।
राजकुमार जी तो खुली आँखों से ’सुर्मा"  चुरा लेते थे ।
मेरा तो एक ’दिल चुरा" के ले गई सो आज तक लौटाई ही नहीं।
" कहते हो न देंगे हम दिल अगर पड़ा पाया "--अच्छा है ,मत देना ,मगर मेरा दिल किसी और को न दे देना।
इक तुम ही नहीं तनहा चोरी में मेरे रुस्वा
तुम जैसे यहाँ  मंचो पर चोर हज़ारों हैं

मैं भी ऐसा ही चोर कर्म करता रहता हूँ यदा-कदा । किसी के-ग़ज़ल की ज़मीन चुरा लेता हूँ। भाव चुरा लेता हूँ ।
भावना चुरा लेता हूं।किसी की कल्पना चुरा लेता हूँ ।कभी कभी 1-2 मिसरा भी चुरा लेता हूँ ।
 परन्तु मैं इसे चोरी का नहीं, ’प्रेरणा’ का नाम देता हूँ।,
एक सलाह है आप को। आप यह " चोर-कर्म ’ शौक से करें परन्तु 1-2 शब्द ज़रा इधर उधर ज़रूर कर दें
1-2 रदीफ़-क़ाफ़िया ही बदल दें । अरे नहीं नहीं --रदीफ़ नहीं बदलना भाई मेरे--रंगे हाथ पकड़े जाओगे।
एकाध मिसरा ऊपर नीचे कर दें । हू-ब-हू न उतारें । फिर आप का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता ।
 तन कर खड़े हो सकते हो।ग्लानि-मुक्त हो सकते हैं।

न हारा हूँ मैं  - न तुम ही थके हो 
मैं तो हूँ कच्चा --तुम तो पके हो

अगले पत्र में आप को”चौर्य कर्म ’के और भी गुर सिखा सकते है ।
एक मंच भी बना सकते हैं -जैसे बड़े बड़े शहरों में -एक ’चोर बाज़ार ’ होता है । चोर-हटिया होता है ।

हे मेरे शुभ चिन्तक !
मुझे आजतक यह बात समझ में न आई कि लोग गीत, ग़ज़ल, माहिया ही क्यों चुराते हैं? कहानी, उपन्यास  क्यॊं
नही चुराते? इस प्रश्न का उत्तर लौटती डाक से अवश्य दीजियेगा।

इस कविता चोरी पर मेरे कुछ मित्रॊ ने अयाचित सलाह दी कि मैंअविलम्ब  इस चोरी की रिपोर्ट किसी थाने में
करूँ।मैने किया था एक बार वह भी  । । यह एक अलग किस्सा है । अब लौं नसानी ,अब ना नसइहों। अगले किसी पत्र
में इसकी चर्चा करूँगा । किसी ने सलाह दी कि अपनी ग़ज़ल में ”तख़ल्लुस’ का ताला लगा दो । मैने वह भी किया।
आप के हुनर के आगे मेरा हुनर कुछ काम न आया।

मित्रवर !
एक श्रीमान ने तो मेरा तख़ल्लुस हटा कर अपना ’तख़ल्लुस’ डाल दिया ।वह शख़्स पूर्व जनम में ज़रूर शायर रहा होगा । उसने  अपना तख़ल्लुस इस सफ़ाई
से डाला ’हम वज़न ’ हम क़ाफ़िया ’ बा-बह्र , बना कर डाला  वल्लाह क्या कहने  कि  एक बार तो हम भी अपनी ग़ज़ल को उसका ही ग़ज़ल समझ बैठे ।
वाह वाह कर बैठे। दाद दे बैठे ।ख़ुदा उसके इस ’हुनर’ को  और बुलन्दी अता करे।

मेरी एक मित्राणी  [ महिला मित्र ] ने सलाह दी  कि मै  अपनी ग़ज़ल में ऐसी भयंकर ग़लती कर के डाल दूँ  कि वैसी ग़लती बड़े से बड़ा शायर  भी न कर सके।
वह ग़लती ही आप का ’सिगनेचर स्टेट्मेन्ट" होगी और चोरी तुरन्त पकड़ी जायेगी ।श्रीमन! मैने  वह भी किया । मगर ’अली बाबा चालीस चोर ’ शैली में सभी ने
अपनी अपनी  ग़ज़ल में वैसी ही ग़लतियाँ डालनी  शुरु कर दी । मेरी रचना चोरी होने से वंचित तो हो गई पर मै उस सुख से वंचित हो गया जो चोरी होने के बाद
मुझे मिलता था । वही सुख -वही आनन्द --तुम्हें सूरज कहूँ या चंदा -वा्ला  सुख -।
उन महिला मित्र ने सबको यही सलाह दी और सभी ने माना। कारण-सभी शादी-शुदा थे ।

किसी मित्र ने सलाह दिया कि तुम अपनी रचना के अन्त में "अपनी स्वरचित रचना" लिख दो। कोई माई का लाल नहीं चुरा पायेगा ।
तो हे मेरे काव्य प्रिये ! तुम भी तो किसी माई के लाल ही होगे ?
अब तो बहुत से लोग अपनी रचना के नीचे ’ कापी राइट -फ़लाना सिंह ’ लिख देते हैं । हा हा हा । वो अज्ञानी है । मूढ़ हैं।
आप जैसे खानदानी चोर के लिए  इन छोटे-मोटे तालों की क्या औक़ात !
आप के इस " चौर्य कर्म " में आप का ’शौर्य’ झलकता है -जैसे आप कह रहे हों --हाँ मैने चुराया है --क्या कर लोगे ?
प्रभु ! मैं एक दीनहीन  कवि क्या कर सकता हूँ । आप ने यशोधरा को नहीं पढ़ा

  हाँ तुम मुझ से कह ,ले जाते 
तो क्या अपने चोर-कर्म में मुझको बाधा पाते ?
 हाय !तुम मुझ से कह  ले जाते 

हे मित्रवर !
अगर आप कहते तो आप के श्री चरणॊ में ऐसे ही 2-4 गीत  ऐसे ही  समर्पित कर देता  -फ़्री में । कम से कम यह पाप तो आप को नहीं करना पड़ता।
"फ़्री में"- इसलिए कि मेरे एक साहित्यिक मित्र बता रहे थे कि उनके पास किसी का [ महिला या पुरुष ,नहीं बताया ] एक ऐसा प्रस्ताव आया था कि वह अपनी रचनाएँ
उन्हे देते जाएँ -और उनसे धन लेते जाए । धनोपार्जन का अच्छा साधन हो जायेगा ।
पता नहीं इसमें कितनी सत्यता थी  --मगर अन्त में  उन्होनें जो बताया वह बिल्कुल सत्य था।

उन्होने बड़े दर्द भरे स्वर में बताया ---पाठक जी -जानते हैं -मैं बिक सकता हूँ , मेरी ’क़लम’ नहीं बिक सकती ।
फिर मैने उनकी क़लम को प्रणाम किया।

तो हे मित्र !
यह पत्र अब लम्बा हो चला है और आप को भी जम्हाई आ रही होगी रात में "सत्कर्म" करते करते थक जो गए होंगे।
"ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता। ख़ैर।कभी साक्षात मिलेंगे तो चरण वन्दना भी कर लूँगा
अपने अन्य साथियों को मेरा प्रणाम कहिएगा ।अगले पत्र में अन्य  बातों पर मिल कर विस्तार से चर्चा करेंगे।
 । भगवान आप के ’ हुनर’ को यूँ ही ज़िन्दा रखे।

उत्तर की प्रतीक्षा में

भवदीय

-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

एक ग़ज़ल

एक ग़ज़ल -- बेज़ार हुए तुम क्यों---


बेज़ार हुए तुम क्यों  , ऐसी भी  शिकायत क्या ?
मै अक्स तुम्हारा हूँ ,इतनी भी हिक़ारत क्या !     

हर बार पढ़ा मैने , हर बार सुना तुमसे ,
पारीन वही किस्से ,नौ हर्फ़-ए-हिक़ायत क्या ?     

जन्नत की वही बातें  ,हूरों से मुलाक़ातें ,
याँ हुस्न पे परदा है ,वाँ  होगी इज़ाजत क्या ?

तक़रीर तेरी ज़ाहिद ,मुद्दत से वही बातें ,
कुछ और नया हो तो ,वरना तो समाअत क्या ! 

हर दिल में निहाँ हो तुम ,हर शै में फ़रोज़ां  हो ,
ऎ दिल के मकीं मेरे ! यह कम है क़राबत क्या !

दिल पाक अगर तेरा ,क्यों ख़ौफ़जदा  बन्दे !
सज़दे का दिखावा है ? या हक़ की इबादत , क्या ?

मसजिद से निकलते ही,फिर रिन्द हुआ ’आनन’ ,
इस दिल को यही भाया ,अब और वज़ाहत क्या !

-आनन्द.पाठक--

सोमवार, 24 अगस्त 2020

Bhai Chara / भाईचारा / Brother Hood

Bhai-Chara-Brother-Hood

Bhai Chara / भाईचारा / Brother Hood


Bhai Chara / भाईचारा / Brother Hood


क्या गजब है देशप्रेम,
क्या स्वर्णिम इतिहास हमारा है|
अजब-गजब कि मिलती मिसालें,
क्या अद्भुत भाईचारा है||

जब भी दुश्मन आता सरहद पर,
हमें देशप्रेम बुलाता है|
माँ भारती कि आन-बान को,
हर भारतवासी मर-मिट जाता है||

जब सैनिक भारत माँ कि रक्षा को,
सीने पर गोली खाता है|
हर भारतवासी के सीने को,
वो लहूलुहान कर जाता है||

जब जब आई है विपदा हम पर,
हम कंधे से कंधा मिलाते है|
हम भारत माँ और उन वीर सपूतो के,
वंदन को शीश झुकाते है||

वीर सपूतो के बलिदानों पर,
हर भारत वासी हारा है|
हम माँ भारती कि संताने है,
और हिंदुस्तान हमारा है||

क्या अद्भुत भाईचारा है||



ऋषभ शुक्ला

Hindi Kavita Manch / हिंदी कविता मंच

आप मेरी कविताओं को अगर पढ़ना चाहे तो नीचे लिंक पर जाकर मेरे ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं|
Hindi Kavita Manch /हिन्दी कविता मंच - https://hindikavitamanch.blogspot.com/
मेरी कहानियों को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें|
Mere Man Kee / मेरे मन की - https://meremankee.blogspot.com/
मेरे यात्रा से संबंधित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें|
Ghumakkadi Dil Se / घुमक्कड़ी दिल से - https://theshuklajee.blogspot.com/
Facebook / फेसबुक - https://instagram.com/theshuklajee
Instagram / इंस्टाग्राम - https://www.facebook.com/theshuklajii
Twitter / ट्विटर - https://twitter.com/theshuklajee
Youtube / यूट्यूब - https://www.youtube.com/channel/MereManKee
Contact Us / संपर्क करें - rushabhshukla8@gmail.com
आपका ब्लॉग पर आने के लिए आभार, हमारे मार्गदर्शन हेतु पुनः पधारें | क्योकी आपके आगमन से ही हमारे लेखन में उत्साह की वृद्धी होती है | धन्यवाद |

शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

स्वामी विवेकानंद जी के चुनिंदा प्रेरणादायक सुविचार

स्वमी विवेकानंद जी के सुविचार


● शक्ति जीवन है तो निर्बलता मृत्यु है। विस्तार जीवन है तो संकुचन मृत्यु है। प्रेम जीवन है तो द्वेष मृत्यु है।

● अपने इरादों को मज़बूत रखो। लोग जो कहेंगे उन्हें कहने दो। एक दिन वही लोग तुम्हारा गुणगान करेंगे।

● हजारों ठोकरें खाने के बाद ही एक अच्छे चरित्र का निर्माण होता है।

● दिन में कम से कम एक बार खुद से जरूर बात करें अन्यथा आप एक उत्कृष्ट व्यक्ति के साथ एक बैठक गँवा देंगे।

● खुद को कमजोर मान लेता बहुत बड़ा पाप है।

● जब आप व्यस्त होते हैं तो सब कुछ आसान सा लगता है परन्तु आलसी होने पर कुछ भी आसान नहीं लगता है।

● बार बार परमेश्वर का नाम लेने से कोई धार्मिक नहीं हो जाता। जो व्यक्ति सत्यकर्म करता है वही धार्मिक है। 

● हमारा कर्तव्य है कि हम सभी को अपने उच्चतम विचार को जीने के लिए संघर्ष करने के लिए प्रोत्साहित करें, और साथ ही आदर्श को सत्य के जितना संभव हो सके बनाने के लिए प्रयास करें।

● यह कभी मत सोचो कि आत्मा के लिए कुछ भी असंभव है। ऐसा सोचना सबसे बड़ा विधर्म है। यदि पाप है, तो यह एकमात्र पाप है, यह कहना कि आप कमजोर हैं, या अन्य कमजोर हैं। 

● ब्रह्मांड की सभी शक्तियां हमारे अंदर हैं। यह हम ही हैं जिन्होंने अपनी आंखों के सामने हाथ रखा है और रोते हुए कहा कि अंधेरा है।

● हम जैसा सोचते हैं बाहर की दुनिया बिलकुल वैसी ही है, हमारे विचार ही चीजों को सुंदर और बदसूरत बनाते हैं। सम्पूर्ण  संसार हमारे अंदर समाया हुआ है, बस जरूरत है तो चीजों को सही रोशनी में रखकर देखने की।

● उठो मेरे शेरो, इस भ्रम को मिटा दो कि तुम निर्बल हो, तुम एक अमर आत्मा हो, स्वच्छंद जीव हो, धन्य हो, सनातन हो, तुम तत्व नहीं हो, ना ही शरीर हो, तत्व तुम्हारा सेवक है तुम तत्व के सेवक नहीं हो.

● हम वो हैं जो हमें हमारी सोच ने बनाया है, इसलिए इस बात का धयान रखिये कि आप क्या सोचते हैं. शब्द गौण हैं. विचार रहते हैं, वे दूर तक यात्रा करते हैं.

● एक विचार लो. उस विचार को अपना जीवन बना लो – उसके बारे में सोचो उसके सपने देखो, उस विचार को जियो. अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, नसों, शरीर के हर हिस्से को उस विचार में डूब जाने दो, और बाकी सभी विचार को किनारे रख दो. यही सफल होने का तरीका है.
                             

● वेदान्त कोई पाप नहीं जानता, वो केवल त्रुटी जानता है. और वेदान्त कहता है कि सबसे बड़ी त्रुटी यह कहना है कि तुम कमजोर हो, तुम पापी हो, एक तुच्छ प्राणी हो, और तुम्हारे पास कोई शक्ति नहीं है और तुम ये-वो नहीं कर सकते.


● मस्तिष्क की शक्तियां सूर्य की किरणों के समान हैं. जब वो केन्द्रित होती हैं, चमक उठती हैं.
                          

● एक समय में एक काम करो, और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ
  

● हम जो बोते हैं वो काटते हैं. हम स्वयं अपने भाग्य के विधाता हैं. हवा बह रही है, वो जहाज जिनके पाल खुले हैं, इससे टकराते हैं, और अपनी दिशा में आगे बढ़ते हैं, पर जिनके पाल बंधे हैं हवा को नहीं पकड़ पाते. क्या यह हवा की गलती है ?…..हम खुद अपना भाग्य बनाते हैं


● प्रेम विस्तार है, स्वार्थ संकुचन है. इसलिए प्रेम जीवन का सिद्धांत है. वह जो प्रेम करता है जीता है, वह जो स्वार्थी है मर रहा है. इसलिए प्रेम के लिए प्रेम करो, क्योंकि जीने का यही एक मात्र सिद्धांत है, वैसे ही जैसे कि तुम जीने के लिए सांस लेते हो.


● स्वतंत्र होने का साहस करो. जहाँ तक तुम्हारे विचार जाते हैं वहां तक जाने का साहस करो, और उन्हें अपने जीवन में उतारने का साहस करो.

एक प्रणय गीत --खोल कर यूँ न ज़ुल्फ़ें ---

आज [ 21-08-2020 ] हरितालिका तीज है --इस अवसर पर

एक प्रणय गीत --

खोल कर यूँ न ज़ुल्फ़ें चलो बाग़ में
प्यार से है भरा दिल,छलक जाएगा

ये लचकती महकती हुई डालियाँ
झुक के करती नमन हैं तुम्हें राह में 
हाथ बाँधे हुए सब खड़े फ़ूल  हैं
बस तुम्हारे ही दीदार की चाह में 

यूँ न लिपटा करो , शाख से पेड़  से
मूक हैं भी तो क्या ? दिल धड़क जायेगा

एक मादक बदन और उन्मुक्त मन
बेख़ुदी में क़दम लड़खड़ाते हुए
एक यौवन छलकता चला  आ रहा
होश फूलों का कोई उड़ाते हुए

यूँ न इतरा के बल खा चला तुम करो
ज़र्रा ज़र्रा चमन का  महक जाएगा

आसमाँ से उतर कर ये कौन आ गया
हूर जन्नत की या अप्सरा या परी  ?
हर लता ,हर कली ,फ़ूल पूछा किए
यह हक़ीक़त है या रब की जादूगरी ?

देख ले जो कोई मद भरे दो नयन
आचमन के बिना ही बहक जाएगा

तुमको देखा तो ऐसा लगा क्यों मुझे
ज़िन्दगी आज अपनी सफल हो गई
मन खिला जो तुम्हारा कमल हो गया
और ख़ुशबू बदन की ग़ज़ल हो गई 

लाख कोशिश करूँ पर रुकेगा नहीं
दिल है मासूम मेरा भटक जाएगा ।

खोल कर यूँ न ज़ुल्फ़ें चलो बाग़ में ,-प्यार से  है भरा दिल---

-आनन्द,पाठक--

शनिवार, 15 अगस्त 2020

चन्द माहिया : 15-अगस्त पर

[ मित्रो !
स्वतन्त्रता दिवस -2020 की आप  सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ ।

चन्द माहिया : 15-अगस्त पर

1
यह पर्व है जन-जन का 
करना है अर्पण
अपने तन-मन-धन का

2
सौ बार नमन मेरा
वीर शहीदों को
जिनसे है चमन मेरा

3
हासिल है आज़ादी
रंग तिरंगे का 
क्यों आज है फ़रियादी ?

4
जब तक सीने में दम
झुकने मत देना
भारत का यह परचम

5
इस ध्वज का मान रहे 
लहराए नभ में
भारत की शान रहे 

-आनन्द.पाठक-

रविवार, 2 अगस्त 2020

राम जन्मभूमि के शिलान्यास के अवसर पर विनीता अग्निहोत्री की कविता

राम जन्मभूमि के शिलान्यास के 
अवसर पर
नभ से देव सुमन बरसायेंगे
तब हम सब खुशी मनायेंगे

अपने घर में भारवंशी दिये जलायेंगे
नभचर-जलचर गीत खुशी के गायेंगे

नर-नारी, नागर-वनचारी मंगल राग सुनायेंगे
अद्भुत दृश्य देखकर अपने राम-सिया मुस्कायेंगे

कोरोना के कारण नहीं अयोध्या जा पायेंगे
सब अपने घर पर ही रहकर जमकर जश्न मनायेंगे
- विनीता अग्निहोत्री