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शुक्रवार, 28 मई 2021

आओ निहारिका हो जाए

 एक आकाश गंगा तुम  

एक निहारिका मैं 

अगनित तारों सूरज से 

भरे तुम 

कितने ही नजारे 

समाए हुई मैं 


एक काल से 

जलते हुए  तुम

एक समय से 

धधकती हुई मैं 


दूर सुदूर ब्रह्मांड में 

बसाये हुए तुम

और 

कुछ प्रकाश दूरी पे  

ठिठकी  हुई मैं 


सदियों से अपनी ओर

खींचते तुम

अनादि से तुम्हे

सम्मोहित करती हुई मैं 


सदियों के इस

रस्साकशी में 

न जीते हो तुम  

और न हारी हूं मैं 


तो आओ 

इस "मैं"  को मिटा कर 

इस "तुम"  को भुला कर 

बस राख राख 

 धुआं धुआं हो जाए

 

तितली के दो पंख सम

आज से ,अभी से 

 तितली  🦋 निहारिका

हो जाए 


और  फिर जन्म दे हम 

अगनित तारों को,

सौर्य मंडलों को,

और 

अनेकों ऊर्जा पिंडों सी

तुम्हारी और  मेरी 

अनंत  संततियो को !!



7 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (29 -5-21) को "वो सुबह कभी तो आएगी..."(4080) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    --
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत बहुत सुंदर।

    "अनंत संततियो को"
    गहन भाव विश्व कल्याण के।
    अप्रतिम।

    जवाब देंहटाएं