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गुरुवार, 7 मार्च 2019

गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी संपन्न --डा श्याम गुप्त

गुरुवासरीय गोष्ठी संपन्न 
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प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली गुरुवासरीय काव्यगोष्ठी दिनांक ७ मार्च २०१९ गुरूवार को डा श्यामगुप्त के आवास सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना , लखनऊ पर संपन्न हुई |
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डा श्यामगुप्त ने माँ सरस्वती वन्दना प्रस्तुत करते हुए पढ़ा---

हे मातु ! विद्या बुद्धि ज्ञान प्रीति गुण प्रदायकं|
अज्ञान अन्धकार त्रिविधि ताप शान्ति दायकं |
हों कथ्य तथ्य सत्य मातु असत भाव नाशकं |
स्वर हों समाज राष्ट्र हित, भजाम्यहं भजाम्यहं ||
------एवं शहीदों को नमन गीत भी प्रस्तुत किया---
हैं नमन भारत देश को है शौर्य जिसकी हवाओं में,
नमन है उन सैनिकों को देश का सम्मान रख्खा |
आज अपने शौर्य से सारे जगत में छागये,
चालीस के बदले चार सौ मार कर जो आगये ||
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-----प्रथम सत्र में साहित्यकारों का सम्मान भी किया गया | लखनऊ पुस्तक-मेला संयोजक श्री देवराज अरोड़ा को भी सम्मानित किया गया |
----- अनिल किशोर शुक्ल ने अपनी रचना में कहा---
सोच समझ कर हर दम बोलो,
शब्द ब्रह्म है इसको तोलो |
------उमेश चन्द्र श्रीवास्तव ने भोले शंकर की महिमा में गायन किया एवं श्रीमती पुष्पा गुप्ता ने दर्पण में अपनी परछाईं से बात करते हुए कहा—
अस्फुट निगाहें दर्पण से झांकीं
परछाईं हमारी हम से यूं पूछ बैठी |
------श्री रामप्रकाश राम ने सुन्दर छंदों में श्रीकृष्ण की छवि को प्रस्तुत किया प्रस्तुत किया—
अंग अंग भूषण विराजें साजे वनमाल,
कमल नयन कमनीय तन श्याम हैं |
-------श्रीमती विजय लक्ष्मी महक ने महिला-दिवस का झंडा उठाते हुए कहा—
महिला दिवस है यह महिला दिवस है |
न मर्जी से खा सकती न मर्जी से पी सकती<
क्योंकि महिला दिवस है महिला दिवस है |
------ श्री बिनोद कुमार सिन्हा जी ने मधुत्सव प्रस्तुत करते हुए कहा ---
हुआ आगाज प्रिय वसंत का,
पुलकित वसुंधरा हुई मगन,
कुसुमित पल्लवित वन उपवन |
----- श्रीमती मधु दीक्षित जी ने एक सुन्दर गीत रचना प्रस्तुत की----
विकल आँखों में कटी रजनी के आँचल को उठाकर,
जागते जो नव अरुण से, कौन हो तुम !
------ कविवर अखिलेश जी ने एक गीत प्रस्तुत किया---
जाने कितनी देर लगा दी तुमने आने में |
अब तो स्वांस स्वांस का चलना ख़तम खजाने में |
------- श्रीमती सुषमा गुप्ता ने महिला सशक्तीकरण गीत प्रस्तुत करते हुए गाया---
तुम पुरुष अहं के हो सुमेरु
मैं नारी आन की प्रतिमा हूँ |
तुम पुरुष दंभ के परिचायक,
मैं सहज मान की गरिमा हूँ |
------- साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने एक श्रृंगार गीत प्रस्तुत करते एक पत्नी की इच्छा को बताया—
अबकी चुनाव लड़ि जाव मोरे संइयाँ,
अबकी विधायक बनि जाव मोरे संइयाँ |
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संक्षिप्त जलपान एवं धन्यवाद ज्ञापन के उपरांत सभा को स्थगित किया गया |

बुधवार, 6 मार्च 2019


विपक्ष की बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक
आजकल विपक्ष का हर नेता और कई मीडिया वाले  बालाकोट पर हुए सर्जिकल स्ट्राइक का प्रमाण मांग रहा है, मोदी जी से चीख-चीख कर पूछ रहा है कि बताओ ‘कितने आदमी थे’, कितने आदमी मारे गये हवाई सर्जिकल स्ट्राइक में.
ध्यान देने योग्य है कि कोई यह नहीं पूछ रहा कि कितने ‘आतंकवादी’ थे बालाकोट में. अर्थात इन लोगों की समझ में यह लोग आतंकवादी नहीं थे.
अब मान लीजिये मोदी जी कुछ भी संख्या बताते हैं तो क्या विपक्ष इससे संतुष्ट हो जायेगा या फिर उस संख्या को पुष्टि करने के लिये मोदी जी से उन लोगों के (जो बालाकोट में मारे गये) ‘डेथ सर्टिफिकेट’ और ‘पोस्ट-मार्टम रिपोर्ट’ मांगेगा, अन्यथा या कैसे साबित होगा की वह लोग हवाई हमले में ही मरे थे, केंसर या दिल के दौरे से नहीं.
यह सारा बयानबाज़ी एक सोची-समझी योजना लगती है. भारत पिछले चालीस वर्षों से पाकिस्तान द्वारा चलाये जा रहे अघोषित युद्ध का सामना कर रहा है. इसमें कितने लोग मारे गये हैं मैं नहीं जानता. इन्टरनेट पर देखने पर भी कोई सही आंकड़े नहीं  मिले. किसी टीवी चैनल पर कोई विशेषज्ञ दावा कर रहा था कि  अस्सी हज़ार से अधिक लोग मारे गये हैं. पर इतना तो सत्य है कि इन चालीस वर्षों में पाक द्वारा चलाये गये आतंकवाद के कारण पंजाब में, जम्मू व् कश्मीर में, दिल्ली और देश के अन्य भागों में बड़ी संख्या में लोग मारे जा चुके हैं.
आजतक हमारी प्रतिक्रिया क्या रही है?
या तो हम बातचीत करते रहे हैं या फिर वागाह बॉर्डर पर मोमबत्तियां जलाते रहे हैं. लेकिन  न बातचीत से कुछ हुआ और न मोमबत्तियां जलाने से.
लोग वर्षों से चाह रहे थे कि सरकार को कोई सख्त कदम उठाने चाहियें. लेकिन पाकिस्तान पर उल्ट वार करने का साहस किसी सरकार ने नहीं दिखाया.  जो लोग इस आतंकवाद की मार सहते आ रहे हैं,  वह अब इस ज़ुल्म को और सहन करने को तैयार नहीं हैं.
जिस समय लोगों का गुस्सा भड़का हुआ था उसी समय मोदी सरकार ने हमला करने का निर्णय लिया. यह बात लोगों को अच्छी लगी. ध्यान देने योग्य है कि कोई आम नागरिक यह नहीं पूछ  रहा कि ‘कितने आदमी थे’. वह उत्साहित है और इस बात से प्रभावित हैं कि आखिरकार किसी सरकार ने आतंकवादियों को उनके घर में घुस कर चोट पहुंचाने का साहस तो किया.
बालाकोट में एक आतंकवादी मरा या तीन सौ, महत्वपूर्ण नहीं हैं, क्योंकि पाकिस्तान में आतंक के कई कारखाने काम कर रहे हैं. महत्वपूर्ण यह है कि अब सरकार ने बता दिया है कि पाकिस्तान के भीतर जाकर भी  आतंकवादियों पर हमला करने को सेना तैयार है.  
एक आम आदमी भली-भांति जानता है कि एक गुंडा तब तक ही आप को डरता है जब तक आप उससे डरते हैं. जिस दिन आप थोड़ा साहस कर, उसका मुकाबला करते हैं वह बिदक जाता है. वह शायद फिर आपको परेशान करे, पर उसे उल्ट वार के लिये तैयार रहना पड़ता है.
अब विपक्ष को यह बात हजम नहीं हो रही है कि मोदी सरकार के निर्णय से लोग उत्साहित हैं. उन्हें लगा कि लोगों का ध्यान किसी और मुद्दे पर ले जाना अनिवार्य हो गया था. तो सोची-समझी योजना के तहत सब एक साथ एक आवाज़ में पूछने लगे कि बताओ, ‘कितने आदमी थे’. किसी ने तो यह तक कहा है कि पुलवामा आतंकी हमला बी जे पी ने कर वाया था.
विपक्ष और मीडिया को इस बात की रत्ती भर भी परवाह नहीं कि इस बयानबाज़ी से भारत की प्रतिष्ठा को चोट पहुँच रही है,  शत्रु हमारी कमज़ोर कड़ियों को पहचान कर अपनी पकड़ में ले सकता है, सेना का मनोबल घट सकता है (आखिर क्यों कोई सैनिक ऐसे लोगों के लिए अपनी जान दांव पर लगाना चाहेगा जो लोग उसका मान नहीं करते या उस पर अभिमान नहीं करते).
विपक्ष को तो बस सरकार की साख को गिरानी है, और इसके लिए वह किसी हद तक जाने को तैयार हैं.
लेकिन आम लोगों को एक बात ध्यान में रखनी होगी. जब अफगानिस्तान से अमरीका के सेना लौट जायेगी, स्थिति और बिगड़ेगी, क्योंकि वहां पर सक्रीय पाकिस्तान के पाले हुए आतंकवादी भारत की ओर चल पड़ेंगे.

सोमवार, 4 मार्च 2019


मतदातों से एक निवेदन-अगली सरकार मज़बूत सरकार-3
लेख के पहले दो भागों में मैंने यह तर्क दिया था कि एक मज़बूत सरकार ही देश को सुरक्षित रख सकती है. देश के भीतर-बाहर कई शक्तियाँ इस प्रयास में हैं कि भारत बिखर जाए.
देश बिखरते हैं,  यह एक ऐसा यथार्थ है जिसे हमें कभी भूलना नहीं चाहिये. देश टूटा तो कई नये राजा और सामंत वजूद में आ जायेंगे, लेकिन आम आदमी का जीवन और भी कठिन हो जायेगा. इसका सीधा उदाहरण तो अपना देश ही है. पच्चीस वर्षों में ही भारत, पकिस्तान, बांग्ला देश अस्तित्व में आ गये. पर  तीनों देशों में ही आम आदमी जीने के संघर्ष में लगे हैं.
अगर और बिखराव हुआ, जैसा कि टुकड़े-टुकड़े गैंग चाहता है, तो स्थिति और भी बुरी हो सकती है. जितना बिखराव होगा उतना ही संघर्ष बढ़ेगा.
भारत की पहली मजबूर सरकार चरण सिंह सरकार थी. उसके बाद आई वी पी सिंह की मजबूर सरकार, और फिर चंद्रशेखर, देवे गौड़ा, गुजराल सरकारें. मनमोहन सिंह की सरकार भी मजबूर सरकार ही थी. मनमोहन सिंह को छोड़ कर अन्य मजबूर सरकारें कुछ वर्ष-डेढ़ वर्ष तक ही सत्ता में रहीं.
इन मजबूर सरकारों ने जो निर्णय लिए वह सब राजनितिक मजबूरियों के कारण ही लिये. चरण सिंह सरकार ने सिर्फ वोटरों को लुभाने के लिए निर्णय लिए. वी पी सिंह सरकार ने मंडल कमिशन लागु किया. और उससे भी भयंकर निर्णय था वी पी सिंह का मुफ़्ती को गृह मंत्री बनाना. मुफ़्ती के कार्यकाल में कश्मीर में जिहाद शुरू हुआ, जिसने अब एक उग्र रूप ले लिए है.
अन्य मजबूर सरकारों ने क्या किया उसका तो इतिहास में कोई ज़िक्र ही नहीं होगा.
और एक बात पर ध्यान देने योग्य है. जब तक देश में मज़बूत सरकारें थीं तब तक भ्रष्टाचार बहुत ही सीमित दायरे में था. जीप घोटाला जो 1947 में घटित हुआ वह अस्सी लाख का कॉन्ट्रैक्ट , बोफोर्स में साठ करोड़ रुपये बिचौलिये के दिए गये थे.
मजबूर सरकारें आईं तो जैसे भ्रष्टाचार की एक बाढ़ सी आ गई. घोटाले हज़ारों करोड़ के और फिर लाखों करोड़ के होने लगे. कामनवेल्थ गेम्स में 70000 करोड़ का और 2 जी में 176000 करोड़ का घोटला होने के आरोप हैं. यह धन आम आदमी का है और जिस के लिए उसे हर दिन बारह से बीस घंटे काम करना पड़ता है. जिस आदमी को दो वक्त की रोटी नहीं मिलती, टैक्स उसे भी देना पड़ता है.
और अब तो एक नई स्थिति प्रकट हो रही है. पिछले दिनों में  हमारे कई नेता और मीडिया के लोग पाकिस्तान के चहेते बन गये हैं. उनके मंत्री, सांसद और मीडिया के लोग मोदी सरकार की प्रतिष्ठा पर चोट करने के लिए हमारे लोगों के बयानों का  खूब इस्तेमाल कर रहे हैं.
पाकिस्तान के किसी रक्षा एक्सपर्ट् ने साफ़ कहा कि राहुल गांधी या अरविन्द केजरीवाल के प्रधान मंत्री बनने में ही पाकिस्तान की भलाई है. सत्य यही है कि हमारा हर शत्रु एक कमज़ोर सरकार की कामना कर रहा है.
जब यह लोग एक मजबूर सरकार बनायेंगे तो किस दिशा में जायेंगे इसका अनुमान लगाना भी कठिन है.

रविवार, 24 फ़रवरी 2019


‘कारवां’ और पुलवामा आतंकी हमला.
पुलवामा आतंकी हमले में शहीद हुए जवानों की जाति का विश्लेष्ण कर, ‘कारवां’ पत्रिका  ने एक अलग ही दृष्टिकोण प्रस्तुत करने का प्रयास किया है.
लेख पढ़ कर मुझे तो कोई आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि कई वर्षों से आतंकवाद के लिए आतंकवादियों को कम और इस देश की नीतियों को, सामाजिक व्यवस्था को, आर्थिक असमानता को अधिक दोषी ठहराने का प्रयास किया जा रहा है. कई ऐसे बुद्धिजीवी/मीडिया के लोग/राजनेता/अधिकारी हैं जो अलग संस्थाओं या एजेंसियों के पे-रोल पर है और उनका अपना एक एजेंडा है. वह सब निष्ठापूर्वक अपना कर्तव्य निभा रहे हैं.
समस्या तो वह लोग हैं जिन्हें अपने देश पर अभिमान है, अपनी सभ्यता में विश्वास है, वैदिक संस्कृति से लगाव है. यह सब इस बात से बिलकुल बेपरवाह हैं कि किस तरह हमारे विश्वास, आस्था  और देशभक्ति पर धीरे-धीरे लेकिन लगातार चोट की जा रही. कई लोगों की सोच को बदलें में यह लोग सफल हुए हैं. वह दिन दूर नहीं जब अधिकाँश लोग यह मानने लगें कि हम सब गलत हैं. उस दिन हमारी पूरी तरह हार होगी.
तो ख़तरा अज़हर मसूद से उतना नहीं है जितना खतरा उन लोगों से है जो देश और व्यस्था के भीतर हैं और जो दीमक की तरह हमें खत्म करने के मिशन में जुटे हुए हैं. बन्दूकधारी से तो जवान निपट लेंगे, लेकिन जिस के पास कलम है (आज के सन्दर्भ में कहें तो जिसके पास लैपटॉप या स्मार्ट फोन है) उसे हराना कठिन है.
इन्हें विफल करने का अभी तो किसी  ने संजीदगी से प्रयास ही नहीं शुरू किया, इसका उदाहरण कारवां का लेख ही है. इसका खंडन करने के लिए क्या कोई लेख या ब्लॉग किसी ने लिखा? और यह बात समझ लीजिये कि गाली-गलोच से इन लोगों का प्रतिकार आप नहीं कर सकते. गाली-गलोच कर आप इनको मज़बूत बना देंगे.
इनका सामना बौद्धिक स्तर पर करना होगा. और यह कोई सरल कार्य नहीं है. इसके लिए आत्मचिंतन करना होगा, जिसके लिए हम शायद तैयार नहीं हैं.
सब कुछ सरकार करेगी ऐसा समझ लेना भी गलत होगा. अपने समाज, अपनी संस्कृति, अपने देश की अखंडता हमें ही संभालनी होगी.

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019


मोदी सरकार की एक बड़ी विफलता
लगभग चालीस वर्ष पुरानी बात है. जम्मू-कश्मीर विधान सभा के चुनाव हो रहे थे. घाटी के अधिकांश लोग बड़े उत्साह के साथ चुनावों में भाग ले रहे थे.
मेरा एक जानकार था, जिसके बारे में मेरी धारणा थी कि वह पाक-समर्थक था.  मैंने व्यंग्य करते हुए उससे कहा कि तुम लोग पाकिस्तान की रट लगाये हुए हो और आम जनता तो खूब उत्साह के साथ चुनावों में भाग ले रही है.  उसने हँसते हुए कहा कि ऐसा न करेंगे तो पैसा कैसे मिलेगा.
मैं पलभर को उसकी बात समझा नहीं. थोड़ा कुरेदा तो उसने बताया कि कश्मीर में कई ‘लोगों’ को पाकिस्तान से पैसा मिलता है, कुछ को भारत से और कुछ चालाक लोगों को दोनों तरफ से. उसकी बात सत्य थी या नहीं, उस समय तय नहीं कर पाया था; पर अब लगता है कि उसका कथन पूरी तरह असत्य न था.
पर आज नई आशंका मन में उजागर हो रही है. ऐसा प्रतीत होता है कि सिर्फ कश्मीर के ‘लोगों’ को ही नहीं, भारत के भी कई लोगों को पकिस्तान सरकार ने अपने पे-रोल पर रखा हुआ है. यह लोग राजनीति में हैं, मीडिया में हैं, विश्वविद्यालयों में हैं. कई स्व-घोषित सोशल एक्टिविस्ट और एनजीओ भी पाकिस्तान से पैसा लेते  होंगे, ऐसा संभव है.
इस आरोप का प्रमाण क्या है? प्रमाण उन लोगों का आचरण है.
ऐसा क्यों होता है कि जब भी सरकार पाकिस्तान के विरुद्ध कोई कार्यवाही करने का सोचती है, तो पाकिस्तान के समर्थन में यहाँ-वहाँ आवाज़ें सुनाई देने लगती हैं? यह लोग सरकार के निश्चय को कमज़ोर करने का प्रयास क्यों करते हैं?
पिछले कुछ वर्षों से सेना का मनोबल गिराने का भी भरपूर प्रयास हो रहा है. एक ओर सेना अघोषित युद्ध का लगातार सामना कर रही है, देश को सुरक्षित रखने के लिए हर दिन अपने अधिकारियों और जवानों की आहुति दे रही है, दूसरी ओर सेना को हतोत्साहित करने की चेष्टा होती रहती है.
कोई नेता सेना अध्यक्ष को गाली देता है, तो कोई सेना के वीरता पर प्रश्न-चिन्ह लगाता. सेना के अधिकारियों के विरुद्ध ऍफ़आईआर दर्ज किये जाते हैं, पीआईएल दाखिल की जाती हैं. 
लोगों में ऐसी धारणा बनाने का प्रयास होता है कि आतंकवादी घटनाओं के लिए आतंकवादी कम और इस देश के लोग या सेना या सरकार अधिक ज़िम्मेवार हैं.
संभव है कि कुछ लोग सरकार या सेना की आलोचना सिर्फ अपनी विचार धारा के कारण ही करते हों. पर इस संभावना को नकारा नहीं जा सकता कि कुछ लोग और कुछ संस्थायें अवश्य ही पाकिस्तान की  पे-रोल पर हैं.
पिछली सरकारों के लिए ऐसे लोगों की कलई खोलना शायद हितकर न था. इसलिये उन सरकारों ने इस दिशा की ओर कोई कदम नहीं उठाया.
पर मोदी सरकार ने ऐसा क्यों नहीं किया, यह बात समझ के परे है. बाहर के शत्रु से अधिक खतरनाक घर के भीतर बैठे शत्रु होते हैं. इन लोगों से निपटे बिना सरकार पाकिस्तान के मनसूबों को विफल नहीं कर सकती. हो सकता है कि इन में से कुछ लोग (और संस्थायें) बहुत शक्तिशाली हों, पर इसके बावजूद इनके विरुद्ध कारवाही करने का जोखिम तो सरकार को उठाना ही पड़ेगा.
मेरी समझ में इन लोगों की पोल खोलने में और इनसे निपटने में सरकार विफल रही है.

बुधवार, 20 फ़रवरी 2019


समस्या भ्रष्टाचार ही है
आज के हिंदुस्तान टाइम्स में एक दिलचस्प लेख छपा है.
इस लेख का सार है कि भ्रष्टाचार पर मुख्यरूप से केन्द्रित कर, मोदी सरकार देश की बिगड़ी हुई सामाजिक कल्याण प्रणाली को दुरस्त नहीं कर सकती.
अर्थात भ्रष्टाचार को घटाना या खत्म करना सरकार का मुख्य उद्देश्य नहीं होना चाहिये, बस अन्य उपायों के साथ यह भी एक उपाय होना चाहिये. सुनने में बात बहुत ही तर्कशील लगती है.
लेकिन यह बात इस सच्चाई की पूरी तरह अनदेखी कर देती है कि इस देश में अगर सरकार एक रुपया खर्च करती है तो सिर्फ पन्द्रह पैसे की ही लाभ लोगों तक पहुँचता था. (यह बात भारत के एक प्रधान मंत्री ने ही कही थी).  
बाकी के पचासी पैसे कहाँ जाते हैं? क्या प्रणालियाँ और व्यवस्था इतनी घटिया हैं कि इतने पैसे बर्बाद हो जाते हैं?
हर कोई जानता है (और निश्चय ही लेख को लिखने वाली लेखिका भी जानती है) कि पचासी पैसे भ्रष्टाचारियों की जेबों में ही जाते हैं. और यह भ्रष्टाचारी सिर्फ सरकारी तंत्र में नहीं हैं, सरकारी तंत्र के बाहर भी हैं. इस लूट के कई भागिदार हैं और आज सब वह परेशान हैं.
इस सरकार को उखाड़ फेंकने की छटपटाहट आप जो देश में देख रहे हैं उसका एक मुख्य कारण है कि लूट के रास्ते बंद करने का एक प्रयास किया जा रहा है. यह छटपटाहट आम जनता में नहीं है, यह तड़प है सिर्फ राजनेताओं में, बुद्धिजीवियों में, मीडिया में, व्यापारी वर्ग में. सभी सम्पन्न वर्ग  पुरानी रीतियों के लिये तड़प रहे हैं.
हर कोई जानता है कि भ्रष्टाचार की मार सिर्फ गरीब आदमी को झेलनी पड़ती है. भारत जब स्वतंत्र हुआ था लगभग उसी समय दूसरा विश्व युद्ध समाप्त हुआ था. उस युद्ध के कारण जर्मनी और  जापान तो लगभग विनाश की कगार पर खड़े थे. फ्रांस और इंग्लैंड की हालत भी खराब थी. चीन की स्थिति भी (किन्हीं अलग कारणों से) अच्छी न थी. आज वह देश कहाँ हैं और हम कहाँ है?
हम आजतक गरीबी नहीं हटा पाये, इस का मुख्य कारण भ्रष्टाचार ही है और कुछ बुद्धिजीवियों को लगता है कि भ्रष्टाचार खत्म करना मुख्य मुद्दा नहीं होना चाहिये. आश्चर्य है!

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019


कमल हासन उवाच: क्यों नहीं हो रहा कश्मीर में जनमत?
एक रिपोर्ट के अनुसार कमल हासन ने सरकार से यह पूछा है कि वह कश्मीर में जनमत कराने से क्यों डरती है?
प्रश्न उचित है और हर उस व्यक्ति को ऐसा प्रश्न पूछने का अधिकार है जो राजनीति में स्थापित होना चाहता है. पर समस्या यह है कि कश्मीर पर ब्यान देने वाले अन्य बुद्धिजीवियों और राजनेताओं की तरह कमल हासन की जानकारी भी नगन्य है. 
यू एन के प्रस्ताव के अनुसार जनमत कराने की पहली शर्त है कि पाकिस्तान कश्मीर से अपने सारे नागरिक और सैनिक हटायेगा.
आज तक पाकिस्तान ने यह शर्त पूरी नहीं की है. अगर कमल हासन का हृदय कश्मीरियों के लिए द्रवित हो रहा है तो उन्हें चाहिये कि पाकिस्तान पर दबाव डालें और पाकिस्तान को यू एन प्रस्ताव की पहली शर्त पूरी करने के लिए उत्साहित करें. इस कार्य को पूरा करने के लिए वह सिधु और मणि शंकर की सहायता ले सकते हैं. (वैसे कमल हासन को इस बात की  जानकारी शायद न हो कि कश्मीर का कुछ भाग पकिस्तान ने चीन को भी दे रखा है और चीन तो वह इलाका कभी खाली न करेगा.)
जिस दिन पकिस्तान पहली शर्त पूरी कर देगा उस दिन कमल हासन के पास सरकार से यह प्रश्न पूछने का पूरा नैतिक अधिकार होगा.
कमल हासन को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वह ऐसा जनमत सिर्फ ‘कश्मीर’ में चाहते हैं या  ‘जम्मू और कश्मीर’  में? वहां और भी  लोग रहते हैं और उनकी भी अपनी कुछ अपेक्षाएं हैं.