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सोमवार, 4 जुलाई 2016

मेरी डिग्रियॉ




बिजली की तरह कौध गया यह वाक्य
-मैं डिग्रियॉ जला दूॅ !

मेरी डिग्रियॉ सारी
बेवफा प्रेयसी के प्रेम पत्रों की तरह हैं
जो पड़ी हैं
घर के किसी कोने में
आलमारी में
मेज पर
किताबों में
सिराने तकिए के नीचे।

अविस्मरणीय यादें हैं जुड़ी
प्रेम के पुट भी हैं
व हृदय तथा मस्तिष्क
मोहपाश में फॅसकर जकड़ा हुआ
जो रोक लेती है ऐसा करने से।

अंततः मनुष्य इतना आशावान क्यों होता है ?
क्यों उन सपनों को यथार्थ जान लेता है
जिसे सरकार समाज व वक्त ने
प्रतिबन्धित कर दिया है।

वो युग और था
जब कचरे से कागज उठाकर लोग
विध्या मॉ को अनगिनत नमन करते थे
किसी तालाब
किसी कुएॅ
या किसी गंगा के घाट पर
स्नेह से जलधारा में विसर्जित करते थे
आज तो भुजा खाकर फेंक देते हैं कागज
और रौंदते हुए निकलते हैं पैरों से
ये मैं इसलिए बतला रहा हूॅ -
कि तब और अब के कागज का कीमत
आप भी जान सको।

हॉ, याद आईं डिग्रियॉ
अपितु डिग्रियॉ कागज ही हैं
दुसरे अन्य कागजों जैसी
किंतु इनका महत्व व मोल अलग है
बिल्कुल जैसे आदमी
एक ही जैसा होता है खून से मॉस से
पर गुण व चरित्र के आधार पर
महत्व व मोल भिन्न-भिन्न हो जाता है।


खैर अब तो इनके भी बुरे दिन आ गए
डिग्रियों के सफेद पन्नों पर
बेरोजगारी के कालिख छा गए
उस पर लिखित समग्र विवरण
समूचे ही धुॅधला गए।

सच कहूॅ -
मेरी डिग्रियॉ मर गईं हैं
मैं तड़प रहा हूॅ
विलाप कर रहा हूॅ
कभी उसका चेहरा निहारता हूॅ
अश्रुयुक्त ऑखों से निहारकर रख देता हूॅ
खूब रोता हूॅ
अंतिम संस्कार की तैयारी के साथ
अपनी प्यारी डिग्रियों के ।

मैं इसे जलाउॅगा ही नहीं केवल
गंगा में भी बहाउॅगा
इसके राख के ढेर को
ताकि अपने विफलता से तड़पते
इनकी बेचैन आत्माओं को
मोक्ष मिल सके।


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