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बुधवार, 30 नवंबर 2016

Laxmirangam: स्वर्णिम सुबह

Laxmirangam: स्वर्णिम सुबह: स्वर्णिम सुबह ऐ मेरे नाजुक मन मैं कैसे तुमको समझाऊँ।। अंजुरी की खुशियाँ छोड़ सदा, अंतस में भरकर, बीते जीवन का क्रंदन, क्यों...

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स्वर्णिम सुबह
स्वर्णिम सुबह

ऐ मेरे नाजुक मन
मैं कैसे तुमको समझाऊँ।।

अंजुरी की खुशियाँ छोड़ सदा,
अंतस में भरकर,
बीते जीवन का क्रंदन,
क्यों भूल गए हो तुम स्पंदन.
ऐ मेरे नाजुक मन
मैं कैसे तुमको समझाऊँ।।

जब कोशिश होती है,
गुलाबों की,
हाथ बढ़ाए गुलाबों में,
कुछ आँचल
फंसते काँटों में,
कुछ तो धीरे से
तर जाते हैं,
बच जाते हैं फटने से, पर
दो तार कहीं छिड़ जाते हैं ।।
ऐ मेरे नाजुक मन
मैं कैसे तुमको समझाऊँ।।

कुछ ज्यादा ही उलझे जाते हैं.
जितना बच जाए, बच जाए,
जो फटे छोड़ना पड़ता है.
मजबूरी में ही हो
पर तब, नया आँचल
तो ओढ़ना पड़ता है।
ऐ मेरे नाजुक मन
मैं कैसे तुमको समझाऊँ।।

मुश्किल कंटकमय राहों में भी
जीवन तो जीना पड़ता है,
सीने में समाए जख्मों पर,
पत्थर तो रखना पड़ता है.
ऐ मेरे नाजुक मन
मैं कैसे तुमको समझाऊँ।।

हों लाख मुसीबत जीवन में,
हाँ, एक मुखौटा जरूरी है,
दुख भरी जिंदगी के आगे,
हँसना तो सदा जरूरी है,
ऐ मेरे नाजुक मन
मैं कैसे तुमको समझाऊँ।।


आँचल में सारी, दुनियाँ को,
तो छोड़ नहीं हम सकते हैं,
आगे बढ़िए... बढ़ते रहिए,
स्वागत करने को रस्ते हैं।।
ऐ मेरे नाजुक मन
मैं कैसे तुमको समझाऊँ।।

हर काली अँधियारी रात संग,
एक स्वर्णिम सुबह भी आती है,
अँधियारे का डर भूल छोड़,
सारे जग को महकाती है.
ऐ मेरे नाजुक मन
मैं कैसे तुमको समझाऊँ।।

अंजुरी की खुशियाँ छोड़ सदा,
अंतस में भरकर,
बीते जीवन का क्रंदन,
क्यों भूल गए हो तुम स्पंदन.
ऐ मेरे नाजुक मन
मैं कैसे तुमको समझाऊँ।।
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10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक चर्चा मंच पर 1-12-2016 को चर्चा - 2543 में दिया जाएगा ।
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

      हटाएं
    2. बहुत सुंदर और प्रेरणादायी रचना

      हटाएं
  2. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा आज शुक्रवार (02-12-2016) के चर्चा मंच "

    सुखद भविष्य की प्रतीक्षा में दुःखद वर्तमान (चर्चा अंक-2544)
    " (चर्चा अंक-2542)
    पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. सर, आभार. बाहर हूँ. देर से देखा. क्षमा करें. आप मेरी रचनाओं को स्थान देते रहते हैं. आपका सही आभार भी तो नहीं जतख पाता.
      सादर,
      अयंगर.

      हटाएं
  3. उत्तर
    1. सादर धन्यवाद.
      प्रोत्साहन की ऐसी टिप्पणियों से हमारी प्रेरणा बनती रहें तो शायद अच्छी रचनाएं दे पाऊँ.

      हटाएं