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मंगलवार, 1 जून 2021

कभी कभी

 




मैं  किस्सा  हूं सुनो कुछ मैं कहूं 

एक   प्रीत पुरानी सा मैं  जुनूँ 

कुछ  वादों  के, कुछ यादों के  

बनूं एक  तराने  कभी कभी 


मैं दिन हूंं, धूप में   जलूं बुझूं 

मैं हवा हूं  , मैं फिर भी न बहूँ 

 शामों को क्षितिज  सिरहाने  पे

जडूं चांद सितारे  कभी कभी 


मैं बादल, धम धम गरजा करूं 

मैं बिजली सी पल पल मचला करूं 

मैं बूंद हूं , तेरे सिरहाने  पे  

पायल सी छनकू कभी कभी 


मैं फूल  सी खुद ही लरजा करूं 

शबनम  सी  खुद ही  पिघला करूं 

तेरे आंखों   से , तेरे होंठो से 

मचलूं खुद को मैं कभी कभी 


मैं ख्वाहिश हूं दिल में दुबकी रहूं 

मैं चाहत हूं नस नस में पलूं

तन्हा ख्वाबों के मौसम में 

धड़कन सी धडकूं कभी कभी 


मैं  इश्क़ हूं  मैं हर रंग  बनूं 

मैं इश्क़ हूं, मैं हर रंग ढलूं

बस   धूप धनक के रंगों सी 

बिखरूं तुझमें मैं कभी कभी



8 टिप्‍पणियां:

  1. मैं ख्वाहिश हूं दिल में दुबकी रहूं
    मैं चाहत हूं नस नस में पलूं
    तन्हा ख्वाबों के मौसम में
    धड़कन सी धडकूं कभी कभी
    मैं इश्क़ हूं मैं हर रंग बनूं
    👌👌वाह! बहुत ही बेहतरीन 👌👌👌
    हमारे ब्लॉग पर भी आइएगा आपका स्वागत है🙏🙏

    जवाब देंहटाएं
  2. बस धूप धनक के रंगों सी

    बिखरूं तुझमें मैं कभी कभी---वाह बहुत खूब पंक्तियां हैं।

    जवाब देंहटाएं
  3. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (2 -6-21) को "ऐसे ही घट-घट में नटवर"(चर्चा अंक 4084) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    --
    कामिनी सिन्हा

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  4. बेहद खूबसूरत ख्याल !

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह!!!
    बहुत ही सुन्दर... मनभावन सृजन।

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