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सोमवार, 11 मार्च 2024

 

चाँदनी महल

का

रहस्य

पोस्ट-कार्ड

रजत आठवीं कक्षा का छात्र था.

एक दिन वह स्कूल से घर लौट रहा था. स्कूल घर से अधिक दूर था इसलिए वह पैदल ही स्कूल आया-जाया करता था. रास्ते में उसने एक जगह एक पोस्ट-कार्ड पड़ा देखा. कुछ सोचे बिना ही उसने वह पोस्ट-कार्ड उठा लिया. पोस्ट-कार्ड किसी दुर्गा सिंह के नाम भेजा गया था.

एक पल के लिए रजत को लगा कि उसे किसी और का पोस्ट-कार्ड उठाना नहीं चाहिए था. उसने पोस्ट-कार्ड को उसी जगह रख देने की बात सोची. पर फिर जाने क्यों उसका मन हुआ कि पत्र पढ़ कर देखे कि उसमें लिखा क्या था. वह पत्र पढ़ने लगा, पत्र में लिखा था:

तुम्हें तो पता ही है कि मेरे पास माँ का कोई भी चित्र नहीं है. यह बात मुझे बहुत खलती है. माँ का एक चित्र शायद पिताजी ने कभी बनवाया था और उन्होंने उस चित्र को अच्छे से फ्रेम भी करवाया था. क्या तुम्हें उस तस्वीर के बारे में कोई जानकारी है? और अगर वह घर में कहीं है तो उसे ले अपने साथ आओ. विश्वास करो हमारे लिए वह तस्वीर बहुमूल्य है.’

रोचक पत्र है. लेकिन पत्र लिखने वाले ने अपना नाम नहीं लिखा है, ऐसा क्यों? शायद भूल गया होगा. या कुछ और बात है?उसने मन ही मन कहा.

उसके मन में आया कि डाकिये ने यह पत्र गलती से रास्ते में गिरा दिया होगा.

क्यों मैं ही जाकर यह पत्र दुर्गा सिंह को दे आऊँ?’ उसने सोचा.

उसने पता देखा, पता था: चाँदनी महल, चौड़ी सड़क, राज नगर. यह जगह उसके घर से ज़्यादा दूर थी. उसने तय किया कि दुपहर बाद माँ को बता कर वह पत्र चाँदनी महल में दे आयेगा.

शाम होने से पहले माँ को बता कर वह पत्र देने चल दिया. राज नगर पहुँच कर वह चौड़ी सड़क गया. उसने कई घरों के बाहर लगी नाम पट्टियाँ देखी. पर किसी पट्टी पर चाँदनी महल लिखा था. एक जगह उसने एक पान वाले की छोटी सी दुकान देखी, वह उस पान वाले के पास आया और बोला, क्या आपको पता है कि चाँदनी महल कहाँ है?

पान वाले ने उसे घूर कर देखा. फिर उसने कहा, क्यों? तुम्हें क्या काम हैं वहाँ?

रजत पान वाले को पोस्ट-कार्ड के बारे में बताने ही वाला था कि उसके मन में आया, ‘मैं इसे क्यों कुछ बताऊँ? इसने प्रश्न किस ढंग से किया था? और किस तरह मुझे घूर कर देख रहा है. नहीं, इसे कुछ बताने की आवश्यकता नहीं है.

उसने कहा, मैं वह महल देखना चाहता हूँ. मेरा एक मित्र इधर रहता है. उसने कहा था कि यहाँ एक पुराना महल है, किसी राजा का. शायद चाँदनी महल ही वह महल है.

मज़ाक कर रहा होगा वह, पान वाले कहा और फिर हाथ से एक घर की ओर संकेत किया. चाँदनी महल सड़क के दूसरी ओर दुकान से थोड़ी दूरी पर ही था.

चाँदनी महल नाम की ही महल था. वह एक साधारण सा मकान था, एक पुरानी-सी दो मंज़िला हवेली थी. हवेली के चारों ओर चार-पाँच फुट ऊंची दीवार थी. सामने लोहे का गेट था जिस पर शायद वर्षों से पेंट नहीं हुआ था. चारदीवारी के भीतर हर तरफ घास और झाड़ियाँ दिखाई दे रही थीं. हवेली  के पीछे एक विशाल पेड़ भी था.   

चाँदनी महल पूरी तरह सुनसान लग रहा था. ऐसा लगता था जैसे महीनों से उसका गेट भी खोला गया हो. रजत को यह सब विचित्र लगा. उसने आसपास देखा. वहाँ कोई भी था सिवाय एक भिखारी के जो चाँदनी महल के सामने बैठा भीख मांग रहा था.

अगर यहाँ कोई रहता नहीं है तो यह पत्र इस पते पर क्यों भेजा गया? रजत ने सोचा.

उत्सुकतावश रजत ने लोहे का गेट थोड़ा-सा खोला और चाँदनी महल की चारदीवारी के अंदर गया.

©आइ बी अरोड़ा

कहानी का दूसरा भाग अगले अंक में प्रकाशित किया जायेगा

शंखनाद संगठन साहित्य, संगीत,लेखन, रंगमंच और पत्रकारिता के लिए 14 विभूतियों को सिरमौर गौरव-2024

 

नाहन ,साहित्य ,संगीत ,कला ,मीडिया ,रंगमंच और समाजसेवा के क्षेत्र में प्रदेशभर में पिछले कई वर्षों से राज्यस्तरीय आयोजन करने वाली संस्था "शंखनाद संगठन" ने  नाहन में कला भाषा एवं संस्कृति अकादमी शिमला के सहयोग से एक राज्यस्तरीय भव्य आयोजन किया ज़िसमें प्रदेशभर में साहित्य ,संगीत ,कला ,रंगमंच ,मीडिया और लेखन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाली 14 विभूतियों को शंखनाद विशिष्ट सम्मान " सिरमौर गौरव -2024 " से विभूषित किया गया  .शंखनाद संगठन के प्रदेश अध्यक्ष श्री ललित शर्मा और निदेशक डॉ.श्रीकांत अकेला के अनुसार इस भव्य अलंकरण समारोह में सेवानिवृत आई ए एस अधिकारी श्री कश्मीर चन्द मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए  जबकि प्रसिद्ध लेखक भाषा संस्कृति विभाग के पूर्व सहायक निदेशक ,पूर्व सहायक निदेशक भाषाविद श्री गोपाल दिलैक ने समारोह की अध्यक्षता  की ,इस विशिष्ट सम्मान समारोह में पूर्व अतिरिक्त सचिव विधि विभाग ,प्रसिद्ध चिंतक राजेन्द्र भट्ट ,प्रसिद्ध समाजसेवी विनोज शर्मा और भारत विकास परिषद नाहन के अध्यक्ष और समाजसेवी एल. आर. भारद्वाज समारोह के विशिष्ट अतिथि थे  ,संस्था के पदाधिकारियों के अनुसार इस समारोह में प्रथम सत्र में गीत संगीत और सम्मान समारोह हुआ  और दूसरे सत्र में साहित्यिक गोष्ठी आयोज़ित की गई  ,  जिसकी अध्यक्षता प्रदेश की वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती शबनम शर्मा ने की , कार्यक्रम  में प्रसिद्ध कवि भुवन जोशी और अनिल शर्मा ने बेहतर मंच संचालन किया,इस  समारोह में साहित्य लेखन के क्षेत्र में सोलन के डॉ.प्रेमलाल गौतम,साहित्य लेखन के क्षेत्र में मंडी की प्रसिद्ध लेखिका डॉ.रेखा वशिष्ठ ,लेखन और समीक्षा के क्षेत्र में कांगडा के विजय उपाध्याय  ,रंगमच के किये नाहन के राकेश शर्मा ,कला के क्षेत्र में सोलन के डॉ.चमन शर्मा ,लोक संगीत के लिए संगड़ाह के हरिचन्द ठाकुर, शास्त्रीय संगीत के लिए मनोज कुमार ,साहित्य लेखन के लिए नाहन की अनुदीप भारद्वाज , कहानी लेखन में सिरमौर की लेखिका विजय रानी बंसल ,संगीत के लिए डॉ.मृत्युंजय शर्मा ,सकारात्मक पत्रकारिता के क्षेत्र में अक्स मीडिया के प्रधान सम्पादक अरूण साथी और एम बी एम न्यूज नेटवर्क की वरिष्ठ पत्रकार रेणु कश्यप, साहित्य के लिए डॉ.कुलदीप भाटिया ,लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए आरती शर्मा को शंखनाद विशिष्ट सम्मान सिरमौर गौरव -2024 प्रदान किया गया  ,दूसरे सत्र में एक कवि सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें दीपराज विश्वास ,शबनम शर्मा ,रविता ,सुनिता भारद्वाज ,मौ क्युम ,चिरानन्द शास्त्री ,अनिल शर्मा ,भुवन जोशी , डॉ श्रीकांत ,रेणु गोस्वामी ,साधना शर्मा ,दिलीप वशिष्ठ ,गोपाल दिलैक ,एल आर भारद्वाज ,अनुदीप भारद्वाज ,सरला गौतम ,विजय रानी बंसल ,विजय उपाध्याय ,आदि ने काव्य पाठ किया ,

मंगलवार, 5 मार्च 2024

एक खत

 


एक खत  

एक मियाद से

आँखो मे लिखा है

एक सच

कई सदियों से

दिल ने कहा है

क्या  वो खत तुम पढ़ोगे बताओ ज़रा

क्या वो सच तुम सुनोगे बताओ ज़रा

हां बताओ ज़रा .....

हां बताओ ज़रा .....


क्या लिखा  उस  खत मे ये

कोई भी न जाने

जो कहा  इस दिल ने वो

कोई भी न माने

एक कहानी  पुरानी जो

 वक़्त ने लिखी थी

उसमे राजा था, रानी 

कहीं भी नहीं थी

एक नदी थी जो

सागर को मिलने चली थी

खो गई राह मे

या फिर गुम हो गई थी

जो  अधूरी कहानी  है  सुनाओ ज़रा

ये अधूरा  होगा पूरा क्या, बताओ ज़रा

हां बताओ ज़रा

हां सुनाओ ज़रा





रविवार, 25 फ़रवरी 2024

इक नगीने की तरह नायाब हो तुम


एक नगीने की तरह नायाब हो तुम 

ज़िंदगी एक सहरा, शादाब हो तुम


दिलकश भी तुम दिलनाज़ भी तुम 

हरदिल हो अजीज़,  सरताज हो तुम


एक अरसे से कोई मुलाकात  नहीं 

किस बात पे हमसे नाराज़ हो तुम 


हम तुमसे जुड़े जैसे रूह से' बदन 

परिंदा है हम , परवाज़ हो तुम 


सफ़र से है हम और सफ़र पे है हम

कि अंजाम ही तुम, आगाज़ हो तुम 

बुधवार, 14 फ़रवरी 2024

शबनम

 तुम्हारे बिना भी चल ही रही है ज़िंदगी,

मैं जी रही हूँ, हँस रही हूँ, खा-पी भी रही हूँ,

पर कभी कभी ये मुझे रुला ही जाती है ।


बेटे बहुएँ बहुत ख़्याल रखते हैं मेरा

 नाती पोते भी, कभी तो पूछ ही लेते हैं,

पर न जाने क्यों इन ऑंखों में फिर भी 

नमी आ ही जाती है 


जिन रास्तों पर हम तुम कभी चले थे साथ साथ

जब देखती हूं पेड़ पौधे, फूल और पंछी

क्या कहूँ ऑंखों में शबनम छा ही जाती है ।


गुरुवार, 30 नवंबर 2023

प्रहरी

 सीमा पर डटे रहते हैं,

हर समय सजग रहते हैं।

ये अपने देश के प्रहरी

तैयार सदा रहते हैं।।

सीमा की हर हलचल पर,

वे पैनी नज़र रखते हैं ।

शत्रु की हर हरकत पर 

नज़रों की धार रखते हैं।।

नियमों के भीतर रहकर,

शत्रु पे वार करते है।

और अपने लक्ष से ये,

पल भर को नहीं डिगते हैं।।

दसियों शत्रुओं पर ये,

एक ही काफ़ी होते हैं।

पर अंदर के देश के दुश्मन,

इनपे ही वार करते हैं।।

कैसे कैसे शब्दों के,

ये बाण झेलते जाते।

पर देश के ख़ातिर अभिमानी

यह सब भी सह लेते हैं।।

आओ नागरिकों अपने,

वीरों पर मान करें हम।

सदा सराहें  इनको,

इनका सम्मान करें हम।।

जो करें अवमान इनका,

उनको हम सबक़ सिखायें।

और देश के इन वीरों पर,

करना अभिमान सिखायें।।


मंगलवार, 31 अक्टूबर 2023

रेडियो भूली बिसरी स्मृतियां

ये आकाशवाणी है..........।  

रेडियो पर ये उद्‌घोषणा सुनते ही एक अजब अनुभूति का आभास होता है।  जैसे आकाश से वाणी सुनाई दे रही हो। आकाशवाणी से ये  शब्द सुनते ही रोमान्‍च  हो उठता है अनेक जिज्ञासाएं कौंध जाती है।  छोटे से उपकरण रेडियों के माध्यम संवाद, समाचार संगीत और भी बहुत कुछ का प्रसारण हमेशा ही उद्वेलित करता रहा है। कैसे होते है वे लोग जो आवाज के माध्यम से हमारे दिलों में कहीं गहरे उतर जाते है और हृदय में जगह बना लेते हैं।

भारत में आकाशवाणी की स्थापना की बात करें तो 23 जुलाई 1997 को यात्रा भारतीय प्रसारण सेवा कलकता और मुब्‍बई से आरम्भ हुई। 1936 में ऑल इंडिया रेडियों तो 1957 में आकाशवाणी हो गया। मैं याद कर रहा आकाशवाणी शिमला को जिससे मेरा जुड़ाव एक लम्बे समय तक केजुअल उद्‌घोषक और केजुअल सामाचार वाचक के रूप में रहा। उससे पूर्व युववाणी कार्यक्रम के कम्‍पेयरर  के रूप में सम्बंध रहा । आकाशवाणी शिमला की शुरूआत 16 जून 1955 को हुई । ज्यों ज्‍यों यादों के पन्ने पलटता हूं तो बाल्यकाल की कुछ धुंधली स्मृतियां सामने आती है। परिवार में रेडियों होना सम्मान की बात होती थी । उस समय रेडियो रखने के लिए लाईसेंस लेना पड़ता था और डाकघर में सालना फीस जमा करवानी होती थी । 

रेडियो प्रतिदिन विशेष कर प्रातःकाल और शाम को अवश्य सुना जाता ।  सुबह सुबह धार्मिक भजनों के लिए तो शाम समाचारों के लिए । याद आता है कि मेरे बाल्‍य काल मे  प्रादेशिक समाचारों में राम कुमार काले की प्रमुख आवाज थी। उनकी बुलन्द आवाज और उच्चारण आज भी श्रोता याद करते है। उनको सुनते तो जिज्ञासा होती कि  काले साहब कैसे होंगे ।   ज़रूर रोबिला और लम्बी हटीकट्टी कद काठी के रहे होंगे। बहुत बाद में जब मेरा आकाशवाणी आना जाना हुआ तो पता चला कि वे बेहद सहृदय और साधारण कदकाठी के थे। मां बताती थी कि अपने बाल्यकाल में अकसर मैं उनकी  नकल कर समाचार पढ़ने का प्रयास किया करता था ।

स्‍थान परिवर्तन हुआ। 1977 में ठियोग से ढली शिमला आ गए और तो दसवीं कक्षा के लिए मशोबरा गए। उस समय एक कार्यक्रम आता था विद्यार्थियों के लिए। आकाशवाणी की टीम स्कूलों में जाकर रिकार्डिंग किया करती थी। ये 1979-80 की बात है हमारे स्कूल में भी आकाशवाणी की टीम रिकॉर्डिंग के लिए आई थी। कई बच्चों की स्वर परीक्षा प्रस्तुति कम्पेयरर  ली गई परन्तु टीम की प्रभारी नलिनी कपूर को कोई आवाज पसंद ही नहीं आई। विद्यालय के एनडीएसआई सर जोगेन्‍द्र  धोलटा ने मेरा नाम सुझाया तो कम्पेयरर के रूप में मेरा चयन हो गया और मेरे साथ चयनित हुई रीता श्रीवास्तव नाम की सहपाठी । सम्भवतः शनिवार साढ़े 12 बजे ये कार्यक्रम प्रसारित हुआ।  विद्यालय में ही रेडियो का प्रबंध हुआ। पहली बार आकाशवाणी के माध्यम से अपनी आवाज़ को सुना । सच मानिए बेहद रौमांच और गौरव के क्षण थे मेरे लिए। दसवीं के बाद संजौली कालेज से बीए किया और फिर विश्वाविद्यालय पहुंच गए। इस मध्य युववाणी कार्यक्रम के प्रस्तुत करने का अवसर मिला। युववाणी के बाद उद्‌घोषक के लिए चयन हुआ तो प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित  हुआ। दीपक भण्डारी, बी.आर. मैहता, अच्छर सिंह परमार, शान्ता वालिया उस समय उदघोषणाओं में प्रमुख नाम थे। प्रशिक्षण के दौरान इन सभी से प्रत्यक्ष मुलाकात हो पाई। मैं दीपक भण्डारी से अधिक प्रभावित रहा। प्रशिक्षण के बाद हमारी उदघोषणाओं के लिए डयूटी लगनी आरम्भ हो गई। प्राय: शनिवार की रात और रविवार की सुबह की सभा में ड्यूटी लगती।

उद‌घोषकों की अगर बात करें तो दीपक भण्डारी एक ऐसा नाम है जिन्होने एक लम्बे समय तक आकाशवाणी शिमला में उ‌दघोषक के पद पर कार्य किया उनका व्यक्तित्व बेहद आकर्षक था।  मैंने उनको सदा ही कुर्ता, चुड़ीदार पायजामा और जैकेट में ही देखा । ये परिधान उन पर  बेहद भाता भी था।  भंडारी जी का व्‍यवहार बेहद ही मृदुभाषी और सरल था वे उदघोषकों को सदा ही  प्रोत्साहित करते और उच्चारण पर ज्यादा मेहनत करने पर बल देते। केजुअल उद्‌घोषक सदैव ही उनसे प्रसारण की बारीकियां सीखते थे। वास्तव में दीपक भण्डारी प्रेरक व्‍यक्तिव थे । 

अच्‍छर सिंह परमार उदघोषक होने के साथ साथ संगीत प्रेमी और गायन भी थे। उनका नए कलाकारों से हमेशा ही सौहार्द पूर्ण सम्‍बध रहे है नए कलाकार परमार से प्रसारण की बारिकीयां सीखते रहे है। परमार जी  गायन में विशेष रुचि रखते थे। उनकी गायन जोड़ी ज्‍वाला प्रसाद शर्मा के साथ प्रसिद्ध थी। उनका  गाया गीत  पैहर सबैला री नी गई री बहुए अड़ीए  दिन चड़ने जो आया  प्रसिद्ध है जो आज भी भी बहुत शौक से सुना और गाया जाता है। अच्‍छर  सिंह परमार मन्डयाली कार्यक्रम में भी बेहद रुचि रखते थे। 

बी.आर.मैहता की भारी और दमदार आवाज़  श्रोताओं को बेहद प्रभावित करती थी। श्रोता उनसे आकर्षित रहा करते थे। नाटकों में भी विशेष रूचि रहती थी । बी. आर.मेहता हमेशा ही आवाज़  के मोडूलेशन पर ज्यादा जोर देते थे। उनका मानना था कि इस माध्यम से श्रोताओं से असरदार संवाद स्थापित हो पाता है।  उस समय नियमित उदघोषकों के अलावा  शैल पंडित,  दीपक शर्मा, जवाहर कौल, नरेंद्र कंवर केजुअल उदघोषक हुआ करते थे।  वर्तमान में डॉ. हुकुम शर्मा और सपना ठाकुार नियमित उदघोषक के रूप में कार्यरत है जो श्रोताओं को अपनी प्रस्‍तुतियों से प्रभावित कर रहे हैं।  

आकाशवाणी पारिश्रमिक भी देती थी।  सांयकालीन ड्यूटी के दौरान कार्यक्रम गीत पहाड़ा रे प्रस्तुत करने में मुझे आनन्द आता था। फरमाईशी कार्यक्रम था तो श्रोताओं की फरमाइश पर पहाड़ी गीत प्रसारित किए जाते । अपने मित्रों के नाम भी इसमें अक्सर ले लिया करता था। कुछ समय बाद दोपहर की सभा संचालित करने लगा। सैनिकों के लिए कार्यक्रम में फिल्मी गीत बजाए जाते। रविवार को सैनिकों के लिए फरमाईशी कार्यक्रम होता था। इस कार्यक्रम को प्रसारित करने में मुझे आनन्‍द की अनुभूति होती। 

आकाशवाणी शिमला के प्रादेशिक समाचार सबसे ज्यादा सुना जाने वाला कार्यक्रम है।  समाचार एकांश में जी.सी.पठानिया, बी.के.ठुकराल सम्पादन कक्ष में कार्यरत थे जबकि  हंसा गौतम निममित समाचार वाचक थी। कुछ समय बाद शान्ता वालिया ने भी नियमित समाचार वाचन में नियुक्ति पाई थी।

1990-1991 के आसपास केजुअल प्रादेशिक समाचार वाचक के रूप में मेरा चयन हो ग‌या । प्रशिक्षण कार्यक्रम राष्ट्रीय समाचार वाचक कृष्ण कुमार भार्गव के सानिध्य में पूरा किया। उस समय समाचार एकांश में हंसा गौतम और शांता वालिया प्रमुख आवाज़ थी। हँसा गौतम आकर्षक व्यक्तित्व और शानदार आवाज की मालिक थी। उनका वाचन हमेशा दोष रहित रहता था। वे नए केजुअल समाचार वाचकों को उच्चारण पर ध्यान देने के लिए सदैव प्रेरित करती थी।  हंसा गौतम का मृदु भाषी होना सभी को बेहद प्रभावित करता
था।  शांता वालिया आकर्षक कदकाठी की थी और उनको हमेशा साड़ी में ही देखा । उनका रोबिले अंदाज में चलना उनके व्‍यक्तिव को शानदार बनाता था। वे नए कलाकारों को हमेशा ही प्रोत्‍साहित करती थी । केजुअल समाचार वाचकों में दीपक शर्मा जवाहर कौल अनुराग पराशर

भूपेंद्र शर्मा, डीडी. शर्मा, मुकेश राजपूत, रोशन जसवाल और दो एक महिला वाचक भी उस समय सक्रिय थे। जबकि वर्तमान समय में राकेश शर्मा,प्रभा शर्मा और राजकुमारी शर्मा सक्रिय है जिन्‍होने अपनी पहचान बनाई है। समाचारों में प्रारम्भ में पांच मिनट का बुलेटिन दिया जाता था। बाद में मुख्य बुलेटिन शाम सात बज कर 50 मिनट वाला पढ़ने को दिया जाने लगा। जिसे लम्बे समय तक निभाया। समाचार वाचन ने उस समय मुझे एक अलग पहचान दी  । समाचार वाचन की मेरी यात्रा फरवरी 2010 तक चली उसके बाद व्यक्तिगत कारणों से मैं इसे नियमित नहीं कर पाया।

आकाशवाणी शिमला को जब जब याद करता हूँ तो बहुत सी आवाजें और वरिष्‍ठ सहयोगी  याद आते है जिन्‍होने श्रोताओं के मानस पटल  पर अपनी आवाज के दम पर अपना नाम बनाया । कृष्‍ण कालिया का नाम उन लोगों में लिया जाता है जिन्‍होने आकाशवाणी शिमला की स्‍थापना से कार्य किया। वे शिव शरण सिंह ठाकुर को याद करते हुए बताते है कि उनको आकाशवाणी में 
लाने का श्रेय ठाकुर जी को जाता है। कृष्‍ण कालिया अक्‍सर पुराने समय को याद करते थे । 
इन्‍ही लोगों में शान्‍ति स्‍वरूप गौतम का नाम भी अदब के साथ लिया जाता है। लता वर्मा बच्‍चों के कार्यक्रम प्रस्‍तुत किया करती थी कला बोबो और लता बोबो को आज भी श्रोता याद करते है।

प्रादेशिक समाचार के बाद सुने जाने वाले कार्यक्रम विभिन्‍न बोलियों के कार्यक्रम थे। बोलियों के कार्यक्रमों में मुझे शांति स्‍वरूप गौतम, कृष्‍ण कालिया, अमर सिंह चौहान, अश्विनी गर्ग, ओंकार लाल भारद्वाज चंगर याद आते है।  ओंकार लाल भारद्वाज रिड़कू राम के नाम से श्रोताओं में प्रसिद्ध थे। चंगर उनका लेखकीय नाम था वे कांगड़ी बोली में कविताएं गीत नाटक  लिखा करते थे। 

आकाशवाणी शिमला में तैयार किए जाने वाले नाटकों ने राष्‍ट्रीय स्‍तर पर प्रशंसा प्राप्‍त की है। नाटकों और बच्चों के कार्यक्रम में मुझे अनूप महाजन, राज कुमार शर्मा, गुरमीत रामल मीत, इन्द्रजीत दुग्गल, देवेन्द्र महेन्द्रु, रविश्री बाला  स्मरण होते है जो हमेशा ही प्रेरक रहे और सीखने सीखाने की परम्परा के पक्षधर रहे।

इस केन्‍द्र ने संगीत के क्षेत्र  में देश में विशेष सम्‍मान हासिल किया है। संगीत के कार्यक्रमों में एस शशि, बी.डी. काले, भीमसेन शर्मा, सोमदत बटु, रामस्वरूप शांडिल, जीत राम, शिवशरण ठाकुर, एस. एस. एस.ठाकुर, सुन्दर लाल गन्धर्व, लेख राम गन्धर्व, श्रीराम शर्मा, शंकर लाल शर्मा, कति राम के एल सहगल  त्रिलोक सिंह ज्वाला प्रसाद याद आते है जो श्रोताओं के हृदय में आज भी उपस्थित है। कला ठाकुर  लता वर्मा हीरा नेगी, कृष्ण सिंह ठाकुर, रोशनी देवी. कुछ ऐसे नाम है जो संगीत
प्रसारण, प्रोग्राम प्रोडक्शन आदि अनेक कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने में सफल हो पाए थे ।

आपका पत्र मिला, कृषि जगत, बाल गोपाल, वनिता मण्डल, शिखरों के आसपास, अमरवाणी, सैलानियों के लिए, धारा रे गीत, और बोलियों के कार्यक्रम ज्‍यादा सुने जाने वाले कार्यक्रमों में रहे है। कला ठाकुर और हीरा नेगी ने विभिन्‍न कार्यक्रमों में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभार्इ। कला ठाकुर जानकी के नाम से कार्यक्रम प्रस्‍तुत करती थी उनके फैन उनसे मिलने आते तो जानकी को ही पूछा करते थे। अनेक ऐसे कलाकार है जो अपनी योग्‍यता के कारण हमेशा स्‍मृति पटल पर अंकित है।

आकाशवाणी शिमला को जब भी याद करता हूँ तो लेखा संकाय, कंटीन और गेस्‍ट रूम याद आते । गेस्‍ट रूम में उदघोषणाओं की क्रास डयूटी के दौरान सोया हूं । लेखा संकाय से चैक मिला करते थे जो अब भी मुझे उद्वेलित करते हैं। मुझे मालूम है कि कुछ नाम अवश्‍य ही छूट गए होंगे। पाठक इसे अन्‍यथा नहीं लेंगे और इसकी जानकारी मुझे दे कर प्रोत्‍साहित करेंगे ।

एफएम के आने से प्रायमरी प्रसारण का सुना जाना जरूर कम हुआ है लेकिन प्रायमरी चैनल के प्रसारणों में लोग आज भी रूचि रखते है।

मैं आज भी गांव की ऊंची पहाड़ी पर से रेडियो पर बज रहा पहाड़ी गीतों के कार्यक्रम में  गीत सुनता हूं,  तेरी परांउठी लागा रेडिया ......  और मैं सदा ही आश्‍वसत हूं कि रेडियों जनमानस की आवाज़ रहेगा और एक  आकर्षण भी ।

 

* रौशन जसवाल विक्षिप्‍त