ये
आकाशवाणी है..........।
रेडियो पर
ये उद्घोषणा सुनते ही एक अजब अनुभूति का आभास होता है। जैसे आकाश से वाणी सुनाई दे रही हो। आकाशवाणी से
ये शब्द सुनते ही रोमान्च हो उठता है अनेक जिज्ञासाएं कौंध जाती है। छोटे से उपकरण रेडियों के माध्यम संवाद, समाचार संगीत और भी बहुत कुछ का प्रसारण हमेशा ही उद्वेलित करता रहा है।
कैसे होते है वे लोग जो आवाज के माध्यम से हमारे दिलों में कहीं गहरे उतर जाते है
और हृदय में जगह बना लेते हैं।

भारत में आकाशवाणी की स्थापना
की बात करें तो 23 जुलाई 1997 को यात्रा भारतीय प्रसारण सेवा कलकता और मुब्बई से आरम्भ हुई। 1936 में ऑल इंडिया रेडियों तो 1957 में आकाशवाणी हो गया।
मैं याद कर रहा आकाशवाणी शिमला को जिससे मेरा जुड़ाव एक लम्बे समय तक केजुअल उद्घोषक
और केजुअल सामाचार वाचक के रूप में रहा। उससे पूर्व युववाणी कार्यक्रम के कम्पेयरर
के रूप में सम्बंध रहा । आकाशवाणी शिमला
की शुरूआत 16 जून 1955 को हुई । ज्यों
ज्यों यादों के पन्ने पलटता हूं तो बाल्यकाल की कुछ धुंधली स्मृतियां सामने आती
है। परिवार में रेडियों होना सम्मान की बात होती थी । उस समय रेडियो रखने के लिए लाईसेंस लेना पड़ता था और डाकघर में सालना फीस जमा करवानी होती थी ।
रेडियो प्रतिदिन
विशेष कर प्रातःकाल और शाम को अवश्य सुना जाता । सुबह सुबह धार्मिक भजनों के लिए तो शाम समाचारों
के लिए । याद आता है कि मेरे बाल्य काल मे प्रादेशिक समाचारों में राम कुमार काले की प्रमुख
आवाज थी। उनकी बुलन्द आवाज और उच्चारण आज भी श्रोता याद करते है। उनको सुनते तो
जिज्ञासा होती कि काले साहब कैसे होंगे । ज़रूर
रोबिला और लम्बी हटीकट्टी कद काठी के रहे होंगे। बहुत बाद में जब मेरा आकाशवाणी
आना जाना हुआ तो पता चला कि वे बेहद सहृदय और साधारण कदकाठी के थे। मां बताती थी
कि अपने बाल्यकाल में अकसर मैं उनकी नकल
कर समाचार पढ़ने का प्रयास किया करता था ।
स्थान परिवर्तन
हुआ। 1977 में ठियोग से ढली शिमला आ गए और तो दसवीं कक्षा के लिए मशोबरा गए। उस
समय एक कार्यक्रम आता था विद्यार्थियों के लिए। आकाशवाणी की टीम स्कूलों में जाकर
रिकार्डिंग किया करती थी। ये 1979-80 की बात है हमारे स्कूल
में भी आकाशवाणी की टीम रिकॉर्डिंग के लिए आई थी। कई बच्चों की स्वर परीक्षा प्रस्तुति
कम्पेयरर ली गई परन्तु टीम की प्रभारी
नलिनी कपूर को कोई आवाज पसंद ही नहीं आई। विद्यालय के एनडीएसआई सर जोगेन्द्र धोलटा ने मेरा नाम सुझाया तो कम्पेयरर के रूप
में मेरा चयन हो गया और मेरे साथ चयनित हुई रीता श्रीवास्तव नाम की सहपाठी ।
सम्भवतः शनिवार साढ़े 12 बजे ये कार्यक्रम प्रसारित हुआ। विद्यालय में ही रेडियो का प्रबंध हुआ। पहली बार
आकाशवाणी के माध्यम से अपनी आवाज़ को सुना । सच मानिए बेहद रौमांच और गौरव के क्षण
थे मेरे लिए। दसवीं के बाद संजौली कालेज से बीए किया और फिर विश्वाविद्यालय पहुंच
गए। इस मध्य युववाणी कार्यक्रम के प्रस्तुत करने का अवसर मिला। युववाणी के बाद उद्घोषक
के लिए चयन हुआ तो प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित हुआ। दीपक भण्डारी, बी.आर.
मैहता, अच्छर सिंह परमार, शान्ता वालिया
उस समय उदघोषणाओं में प्रमुख नाम थे। प्रशिक्षण के दौरान इन सभी से प्रत्यक्ष मुलाकात
हो पाई। मैं दीपक भण्डारी से अधिक प्रभावित रहा। प्रशिक्षण के बाद हमारी उदघोषणाओं
के लिए डयूटी लगनी आरम्भ हो गई। प्राय: शनिवार की रात और रविवार की सुबह की सभा
में ड्यूटी लगती।

उदघोषकों की अगर बात करें तो
दीपक भण्डारी एक ऐसा नाम है जिन्होने एक लम्बे समय तक आकाशवाणी शिमला में उदघोषक
के पद पर कार्य किया उनका व्यक्तित्व बेहद आकर्षक था। मैंने उनको सदा ही कुर्ता, चुड़ीदार पायजामा और जैकेट में ही देखा । ये परिधान उन पर बेहद भाता भी था। भंडारी जी का व्यवहार बेहद ही
मृदुभाषी और सरल था वे उदघोषकों को सदा ही
प्रोत्साहित करते और उच्चारण पर ज्यादा मेहनत करने पर बल देते। केजुअल उद्घोषक
सदैव ही उनसे प्रसारण की बारीकियां सीखते थे। वास्तव में दीपक भण्डारी प्रेरक व्यक्तिव
थे ।
अच्छर सिंह
परमार उदघोषक होने के साथ साथ संगीत प्रेमी और गायन भी थे। उनका नए कलाकारों से
हमेशा ही सौहार्द पूर्ण सम्बध रहे है नए कलाकार परमार से प्रसारण की बारिकीयां
सीखते रहे है। परमार जी गायन में विशेष
रुचि रखते थे। उनकी गायन जोड़ी ज्वाला प्रसाद शर्मा के साथ प्रसिद्ध थी। उनका गाया गीत पैहर सबैला री नी गई री बहुए अड़ीए दिन
चड़ने जो आया प्रसिद्ध है जो आज भी भी
बहुत शौक से सुना और गाया जाता है। अच्छर सिंह परमार मन्डयाली कार्यक्रम में भी बेहद रुचि
रखते थे।
बी.आर.मैहता
की भारी और दमदार आवाज़ श्रोताओं को बेहद
प्रभावित करती थी। श्रोता उनसे आकर्षित रहा करते थे। नाटकों में भी विशेष रूचि
रहती थी । बी. आर.मेहता हमेशा ही आवाज़ के
मोडूलेशन पर ज्यादा जोर देते थे। उनका मानना था कि इस माध्यम से श्रोताओं से
असरदार संवाद स्थापित हो पाता है। उस समय नियमित
उदघोषकों के अलावा शैल पंडित, दीपक शर्मा, जवाहर कौल, नरेंद्र कंवर केजुअल
उदघोषक हुआ करते थे। वर्तमान में डॉ.
हुकुम शर्मा और सपना ठाकुार नियमित उदघोषक के रूप में कार्यरत है जो श्रोताओं को
अपनी प्रस्तुतियों से प्रभावित कर रहे हैं।
आकाशवाणी पारिश्रमिक
भी देती थी। सांयकालीन ड्यूटी के दौरान
कार्यक्रम गीत पहाड़ा रे प्रस्तुत करने में मुझे आनन्द आता था। फरमाईशी कार्यक्रम
था तो श्रोताओं की फरमाइश पर पहाड़ी गीत प्रसारित किए जाते । अपने मित्रों के नाम
भी इसमें अक्सर ले लिया करता था। कुछ समय बाद दोपहर की सभा संचालित करने लगा।
सैनिकों के लिए कार्यक्रम में फिल्मी गीत बजाए जाते। रविवार को सैनिकों के लिए
फरमाईशी कार्यक्रम होता था। इस कार्यक्रम को प्रसारित करने में मुझे आनन्द की अनुभूति
होती।
आकाशवाणी
शिमला के प्रादेशिक समाचार सबसे ज्यादा सुना जाने वाला कार्यक्रम है। समाचार एकांश में जी.सी.पठानिया, बी.के.ठुकराल सम्पादन कक्ष में कार्यरत थे जबकि हंसा गौतम निममित समाचार वाचक थी। कुछ समय बाद
शान्ता वालिया ने भी नियमित समाचार वाचन में नियुक्ति पाई थी।
1990-1991 के आसपास केजुअल
प्रादेशिक समाचार वाचक के रूप में मेरा चयन हो गया । प्रशिक्षण कार्यक्रम
राष्ट्रीय समाचार वाचक कृष्ण कुमार भार्गव के सानिध्य में पूरा किया। उस समय
समाचार एकांश में हंसा गौतम और शांता वालिया प्रमुख आवाज़ थी। हँसा गौतम आकर्षक
व्यक्तित्व और शानदार आवाज की मालिक थी। उनका वाचन हमेशा दोष रहित रहता था। वे नए
केजुअल समाचार वाचकों को उच्चारण पर ध्यान देने के लिए सदैव प्रेरित करती थी। हंसा गौतम का मृदु भाषी होना सभी को बेहद
प्रभावित करता
था। शांता वालिया आकर्षक
कदकाठी की थी और उनको हमेशा साड़ी में ही देखा । उनका रोबिले अंदाज में चलना उनके
व्यक्तिव को शानदार बनाता था। वे नए कलाकारों को हमेशा ही प्रोत्साहित करती थी ।
केजुअल समाचार वाचकों में दीपक शर्मा जवाहर कौल अनुराग पराशर

, भूपेंद्र शर्मा, डीडी.
शर्मा, मुकेश राजपूत, रोशन जसवाल और दो
एक महिला वाचक भी उस समय सक्रिय थे। जबकि वर्तमान समय में राकेश शर्मा,प्रभा शर्मा
और राजकुमारी शर्मा सक्रिय है जिन्होने अपनी पहचान बनाई है। समाचारों में
प्रारम्भ में पांच मिनट का बुलेटिन दिया जाता था। बाद में मुख्य बुलेटिन शाम सात
बज कर 50 मिनट वाला पढ़ने को दिया जाने लगा। जिसे लम्बे समय
तक निभाया। समाचार वाचन ने उस समय मुझे एक अलग पहचान दी । समाचार वाचन की मेरी यात्रा फरवरी 2010 तक चली उसके बाद व्यक्तिगत कारणों से मैं इसे नियमित नहीं कर पाया।

आकाशवाणी
शिमला को जब जब याद करता हूँ तो बहुत सी आवाजें और वरिष्ठ सहयोगी याद आते है जिन्होने श्रोताओं के मानस पटल पर अपनी आवाज के दम पर अपना नाम बनाया । कृष्ण कालिया का नाम उन लोगों में
लिया जाता है जिन्होने आकाशवाणी शिमला की स्थापना से कार्य किया। वे शिव शरण
सिंह ठाकुर को याद करते हुए बताते है कि उनको आकाशवाणी में लाने का श्रेय ठाकुर जी
को जाता है। कृष्ण कालिया अक्सर पुराने समय को याद करते थे । इन्ही लोगों में शान्ति स्वरूप
गौतम का नाम भी अदब के साथ लिया जाता है। लता वर्मा बच्चों के कार्यक्रम
प्रस्तुत किया करती थी कला बोबो और लता बोबो को आज भी
श्रोता याद करते है।
प्रादेशिक
समाचार के बाद सुने जाने वाले कार्यक्रम विभिन्न बोलियों के कार्यक्रम थे। बोलियों
के कार्यक्रमों में मुझे शांति स्वरूप गौतम, कृष्ण कालिया, अमर सिंह चौहान, अश्विनी
गर्ग, ओंकार लाल भारद्वाज चंगर याद आते है। ओंकार लाल भारद्वाज रिड़कू राम के नाम से
श्रोताओं में प्रसिद्ध थे। चंगर उनका लेखकीय नाम था वे कांगड़ी बोली में कविताएं
गीत नाटक लिखा करते थे।
आकाशवाणी शिमला में
तैयार किए जाने वाले नाटकों ने राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा प्राप्त की है। नाटकों
और बच्चों के कार्यक्रम में मुझे अनूप महाजन, राज कुमार शर्मा, गुरमीत रामल मीत, इन्द्रजीत
दुग्गल, देवेन्द्र महेन्द्रु, रविश्री
बाला स्मरण होते है जो हमेशा ही प्रेरक
रहे और सीखने सीखाने की परम्परा के पक्षधर रहे।
इस केन्द्र ने संगीत के क्षेत्र में देश में विशेष सम्मान हासिल किया है। संगीत
के कार्यक्रमों में एस शशि, ,
बी.डी. काले,
भीमसेन शर्मा,
सोमदत
बटु,
रामस्वरूप शांडिल,
जीत राम,
शिवशरण ठाकुर,
एस. एस. एस.ठाकुर,
सुन्दर लाल गन्धर्व,
लेख राम गन्धर्व,
श्रीराम शर्मा,
शंकर लाल शर्मा,
कति राम के एल सहगल त्रिलोक सिंह
ज्वाला प्रसाद याद आते है जो श्रोताओं के हृदय में आज भी उपस्थित है। कला ठाकुर लता वर्मा हीरा नेगी,
कृष्ण सिंह ठाकुर, रोशनी देवी. कुछ ऐसे नाम है
जो संगीत,
प्रसारण, प्रोग्राम
प्रोडक्शन आदि अनेक कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने में सफल हो पाए थे ।
आपका पत्र
मिला,
कृषि जगत, बाल गोपाल, वनिता
मण्डल, शिखरों के आसपास, अमरवाणी,
सैलानियों के लिए, धारा रे गीत, और बोलियों के कार्यक्रम ज्यादा सुने जाने वाले कार्यक्रमों में रहे है। कला
ठाकुर और हीरा नेगी ने विभिन्न कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण भूमिका निभार्इ। कला
ठाकुर जानकी के नाम से कार्यक्रम प्रस्तुत करती थी उनके फैन उनसे मिलने आते तो
जानकी को ही पूछा करते थे। अनेक ऐसे कलाकार है जो अपनी योग्यता के कारण हमेशा स्मृति
पटल पर अंकित है।
आकाशवाणी
शिमला को जब भी याद करता हूँ तो लेखा संकाय, कंटीन और गेस्ट रूम याद आते । गेस्ट
रूम में उदघोषणाओं की क्रास डयूटी के दौरान सोया हूं । लेखा संकाय से चैक मिला
करते थे जो अब भी मुझे उद्वेलित करते हैं। मुझे मालूम है कि कुछ नाम अवश्य ही
छूट गए होंगे। पाठक इसे अन्यथा नहीं लेंगे और इसकी जानकारी मुझे दे कर प्रोत्साहित
करेंगे ।
एफएम के
आने से प्रायमरी प्रसारण का सुना जाना जरूर कम हुआ है लेकिन प्रायमरी चैनल के
प्रसारणों में लोग आज भी रूचि रखते है।
मैं आज भी
गांव की ऊंची पहाड़ी पर से रेडियो पर बज रहा पहाड़ी गीतों के कार्यक्रम में गीत सुनता हूं, तेरी परांउठी लागा रेडिया ...... और मैं सदा ही आश्वसत हूं कि रेडियों जनमानस
की आवाज़ रहेगा और एक आकर्षण भी ।
* रौशन जसवाल
विक्षिप्त