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शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 12

चन्द माहिया : क़िस्त 12

:1:
दीदार न हो जब तक
यूँ ही रहे चढ़ता
उतरे न नशा तब तक

:2:

ये इश्क़ सदाकत है
खेल नहीं , साहिब !
इक राह-ए-इबादत है

:3:

बस एक झलक पाना
मानी होता है
इक उम्र गुज़र जाना

:4:

अपनी पहचान नहीं
बाहर ढूँढ रहा
भीतर का ध्यान नहीं

:5:

जब तक मैं हूँ ,तुम हो
कैसे कह दूँ मैं
तुम मुझ में ही गुम हो 

-आनन्द.पाठक
09413395592

3 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (04-01-2015) को "एक और वर्ष बीत गया..." (चर्चा-1848) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    नव वर्ष-2015 की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आ0 शास्त्री जी
      रचना को स्थान देने के लिए आप का बहुत बहुत धन्यवाद
      सादर
      आनन्द पाठक

      हटाएं