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शुक्रवार, 2 सितंबर 2022
एक गजल
बुधवार, 17 अगस्त 2022
एक ग़ज़ल
एक ग़ज़ल
नई जब राह पर तू चल तो नक़्श-ए-पा बना के चल,
क़दम हिम्मत से रखता चल, हमेशा सर उठा के चल ।
बहुत से लोग ऐसे हैं , जो काँटे ही बिछाते हैं ,
अगर मुमकिन हो जो तुझसे तो गुलशन को सजा के चल ।
डराते है तुझे वो बारहा बन क़ौम के ’लीडर’ ,
अगर ईमान है दिल में तो फिर नज़रें मिला के चल ।
किसी का सर क़लम करना, सिखाता कौन है तुझको ?
अँधेरों से निकल कर आ, उजाले में तू आ के चल ।
तुझे ख़ुद सोचना होगा ग़लत क्या है सही क्या है ,
फ़रेबी रहनुमाओं से ज़रा दामन बचा के चल ।
न समझें है ,न समझेंगे , वो अन्धे बन गए क़स्दन ,
मशाल इन्सानियत की ले क़दम आगे बढ़ा के चल ।
सफ़र कितना भी हो मुशकिल, लगेगा ख़ुशनुमा ’आनन’
किसी को हमसफ़र, हमराज़ तो अपना बना के चल ।
-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ
क़स्दन = जानबूझ कर
मंगलवार, 16 अगस्त 2022
चौपई छंद "चूहा बिल्ली"
चौपई छंद / जयकरी छंद
नाम- बासुदेव अग्रवाल;जन्म दिन - 28 अगस्त, 1952;
निवास स्थान - तिनसुकिया (असम)
रुचि - काव्य की हर विधा में सृजन करना। हिन्दी साहित्य की हर प्रचलित छंद, गीत, नवगीत, हाइकु, सेदोका, वर्ण पिरामिड, गज़ल, मुक्तक, सवैया, घनाक्षरी इत्यादि।
सम्मान- मेरी रचनाएँ देश के सम्मानित समाचारपत्र और अधिकांश प्रतिष्ठित वेब साइट में नियमित रूप से प्रकाशित होती रहती हैं। हिन्दी साहित्य से जुड़े विभिन्न ग्रूप और संस्थानों से कई अलंकरण और प्रसस्ति पत्र नियमित प्राप्त होते रहते हैं।
प्रकाशित पुस्तकें- गूगल प्ले स्टोर पर मेरी दो निशुल्क ई बुक प्रकाशित हैं।
(1) "मात्रिक छंद प्रभा" जिसकी गूगल बुक आइ डी :- 37RT28H2PD2 है। (यह 132 पृष्ठ की पुस्तक है जिसमें मात्रिक छंदों की मेरी 91 कविताएँ विधान सहित संग्रहित हैं। पुस्तक के अंत में 'मात्रिक छंद कोष' दिया गया है जिसमें 160 के करीब मात्रिक छंद विधान सहित सूचीबद्ध हैं।)
(2) "वर्णिक छंद प्रभा" जिसकी गूगल बुक आइ डी :- 509X0BCCWRD है। (यह 134 पृष्ठ की पुस्तक है जिसमें वर्णिक छंदों की मेरी 95 कविताएँ विधान सहित संग्रहित हैं। पुस्तक के अंत में 'वर्णिक छंद कोष' दिया गया है जिसमें 430 के करीब वर्णिक छंद विधान सहित सूचीबद्ध हैं।)
Web Site - visit kavikul.com
गंग छंद "गंग धार"
गंग छंद
नाम- बासुदेव अग्रवाल;जन्म दिन - 28 अगस्त, 1952;
निवास स्थान - तिनसुकिया (असम)
रुचि - काव्य की हर विधा में सृजन करना। हिन्दी साहित्य की हर प्रचलित छंद, गीत, नवगीत, हाइकु, सेदोका, वर्ण पिरामिड, गज़ल, मुक्तक, सवैया, घनाक्षरी इत्यादि।
सम्मान- मेरी रचनाएँ देश के सम्मानित समाचारपत्र और अधिकांश प्रतिष्ठित वेब साइट में नियमित रूप से प्रकाशित होती रहती हैं। हिन्दी साहित्य से जुड़े विभिन्न ग्रूप और संस्थानों से कई अलंकरण और प्रसस्ति पत्र नियमित प्राप्त होते रहते हैं।
प्रकाशित पुस्तकें- गूगल प्ले स्टोर पर मेरी दो निशुल्क ई बुक प्रकाशित हैं।
(1) "मात्रिक छंद प्रभा" जिसकी गूगल बुक आइ डी :- 37RT28H2PD2 है। (यह 132 पृष्ठ की पुस्तक है जिसमें मात्रिक छंदों की मेरी 91 कविताएँ विधान सहित संग्रहित हैं। पुस्तक के अंत में 'मात्रिक छंद कोष' दिया गया है जिसमें 160 के करीब मात्रिक छंद विधान सहित सूचीबद्ध हैं।)
(2) "वर्णिक छंद प्रभा" जिसकी गूगल बुक आइ डी :- 509X0BCCWRD है। (यह 134 पृष्ठ की पुस्तक है जिसमें वर्णिक छंदों की मेरी 95 कविताएँ विधान सहित संग्रहित हैं। पुस्तक के अंत में 'वर्णिक छंद कोष' दिया गया है जिसमें 430 के करीब वर्णिक छंद विधान सहित सूचीबद्ध हैं।)
Web Site - visit kavikul.com
रविवार, 14 अगस्त 2022
चन्द माहिए : 15-अगस्त पर
चन्द माहिए
[ 15-अगस्त पर ]
1
यह पर्व है जन-जन का,
करना है अर्पण,
अपने तन-मन-धन का।
2
सौ बार नमन मेरा,
वीर शहीदों को,
जिनसे है चमन मेरा।
3
हासिल है आज़ादी,
रंग तिरंगे का,
क्यों आज है फ़रियादी?
4
जब तक सीने में दम,
झुकने मत देना,
भारत का यह परचम।
5
इस ध्वज का मान रहे,
लहराए नभ में,
भारत की शान रहे।
-आनन्द.पाठक-
शनिवार, 6 अगस्त 2022
15-अगस्त पर एक गीत
स्वतन्त्रता के पर अमृत महोत्सव पर और घर घर तिरंगा अभियान पर----
एक गीत -15 अगस्त पर- हर घर पर लहराए तिरंगा------
भारत माँ की शान तिरंगा, घर घर पर लहराए
विश्व शान्ति ,बलिदान त्याग का नव संदेश सुनाए
’जन-मन-गण ’का प्रान तिरंगा
हम सब की पहचान तिरंगा
प्राण निछावर करने वालों-
का करता सम्मान तिरंगा
हिमगिरि से भी ऊँची जिसकी कीर्ति-पताका जग में
’सत्यमेव जयते’- का निश दिन मंत्र सदा दुहराए
इस झंडे के तले लड़े हम
चट्टानों-सा रहे खड़े हम
सत्य, अहिंसा, आदर्शों पर
नैतिकता पर रहे अड़े हम
इस झंडे का मान रखें, संकल्प यही करना है
आँच न इस पर आने पाए ,प्राण भले ही जाए
वीरों ने हुंकार भरा जब
दुश्मन का दिल सदा डरा तब
आगे आगे ध्वजा हमारी
फिर पीछे जयघोष किए सब
इस झंडे की मर्यादा की, आन-बान की खातिर
हँसते हँसते वीर शहीदों ने हैं प्राण गँवाए
गाँधी जी का त्याग भी देखा
’जलियाँवाला बाग’ भी देखा
लाल रंग से रहे खेलते -
वीरों का वह फाग भी देखा
वीरॊं के बलिदानों का यह देता सदा गवाही
अमर रहे यह झंडा मेरा, कभी न झुकने पाए
केसरिया रंग त्याग सिखाता
श्वेत- शान्ति का अनुपम नाता
हरा रंग मानो भारत की
समृद्धि का गीत सुनाता
तीन रंग से बना तिरंगा मेरा झंडा न्यारा
मानवता का पाठ पढ़ाए, नई राह दिखलाए
भारत माँ की शान तिरंगा हर घर पर लहराए
-आनन्द.पाठक-
गुरुवार, 4 अगस्त 2022
एक ग़ज़ल : वक़्त देता वक़्त आने पर सज़ा है
एक ग़ज़ल
वक़्त देता, वक़्त आने पर सज़ा है ,
कौन इसकी मार से अबतक बचा है ।
रात-दिन शहनाइयाँ बजती जहाँ थीं ,
ख़ाक में ऎवान अब उनका पता है ।
तू जिसे अपना समझता, है न अपना,
आदमी में ’आदमीयत’ लापता है ।
दिल कहीं, सजदा कहीं, है दर किसी का,
यह दिखावा है ,छलावा और क्या है !
इज्तराब-ए-दिल में कितनी तिश्नगी है,
वो पस-ए-पर्दा बख़ूबी जानता है ।
क्या उसे ढूँढा कभी है दिल के अन्दर.
बारहा ,बाहर जिसे तू ढूँढता है ?
ज़िंदगी क्या है ! न इतना सोच ’आनन’
इशरत-ओ-ग़म से गुज़रता रास्ता है ।
-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ
ऎवान = महल , प्रासाद
इज़्तराब-ए-दिल =बेचैन दिल
तिश्नगी = प्यास
पस-ए-पर्दा = परदे के पीछॆ से
बारहा = बार बार
इशरत-ओ-ग़म से = सुख -दुख से