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गुरुवार, 7 मार्च 2019

गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी संपन्न --डा श्याम गुप्त

गुरुवासरीय गोष्ठी संपन्न 
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प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली गुरुवासरीय काव्यगोष्ठी दिनांक ७ मार्च २०१९ गुरूवार को डा श्यामगुप्त के आवास सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना , लखनऊ पर संपन्न हुई |
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डा श्यामगुप्त ने माँ सरस्वती वन्दना प्रस्तुत करते हुए पढ़ा---

हे मातु ! विद्या बुद्धि ज्ञान प्रीति गुण प्रदायकं|
अज्ञान अन्धकार त्रिविधि ताप शान्ति दायकं |
हों कथ्य तथ्य सत्य मातु असत भाव नाशकं |
स्वर हों समाज राष्ट्र हित, भजाम्यहं भजाम्यहं ||
------एवं शहीदों को नमन गीत भी प्रस्तुत किया---
हैं नमन भारत देश को है शौर्य जिसकी हवाओं में,
नमन है उन सैनिकों को देश का सम्मान रख्खा |
आज अपने शौर्य से सारे जगत में छागये,
चालीस के बदले चार सौ मार कर जो आगये ||
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-----प्रथम सत्र में साहित्यकारों का सम्मान भी किया गया | लखनऊ पुस्तक-मेला संयोजक श्री देवराज अरोड़ा को भी सम्मानित किया गया |
----- अनिल किशोर शुक्ल ने अपनी रचना में कहा---
सोच समझ कर हर दम बोलो,
शब्द ब्रह्म है इसको तोलो |
------उमेश चन्द्र श्रीवास्तव ने भोले शंकर की महिमा में गायन किया एवं श्रीमती पुष्पा गुप्ता ने दर्पण में अपनी परछाईं से बात करते हुए कहा—
अस्फुट निगाहें दर्पण से झांकीं
परछाईं हमारी हम से यूं पूछ बैठी |
------श्री रामप्रकाश राम ने सुन्दर छंदों में श्रीकृष्ण की छवि को प्रस्तुत किया प्रस्तुत किया—
अंग अंग भूषण विराजें साजे वनमाल,
कमल नयन कमनीय तन श्याम हैं |
-------श्रीमती विजय लक्ष्मी महक ने महिला-दिवस का झंडा उठाते हुए कहा—
महिला दिवस है यह महिला दिवस है |
न मर्जी से खा सकती न मर्जी से पी सकती<
क्योंकि महिला दिवस है महिला दिवस है |
------ श्री बिनोद कुमार सिन्हा जी ने मधुत्सव प्रस्तुत करते हुए कहा ---
हुआ आगाज प्रिय वसंत का,
पुलकित वसुंधरा हुई मगन,
कुसुमित पल्लवित वन उपवन |
----- श्रीमती मधु दीक्षित जी ने एक सुन्दर गीत रचना प्रस्तुत की----
विकल आँखों में कटी रजनी के आँचल को उठाकर,
जागते जो नव अरुण से, कौन हो तुम !
------ कविवर अखिलेश जी ने एक गीत प्रस्तुत किया---
जाने कितनी देर लगा दी तुमने आने में |
अब तो स्वांस स्वांस का चलना ख़तम खजाने में |
------- श्रीमती सुषमा गुप्ता ने महिला सशक्तीकरण गीत प्रस्तुत करते हुए गाया---
तुम पुरुष अहं के हो सुमेरु
मैं नारी आन की प्रतिमा हूँ |
तुम पुरुष दंभ के परिचायक,
मैं सहज मान की गरिमा हूँ |
------- साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने एक श्रृंगार गीत प्रस्तुत करते एक पत्नी की इच्छा को बताया—
अबकी चुनाव लड़ि जाव मोरे संइयाँ,
अबकी विधायक बनि जाव मोरे संइयाँ |
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संक्षिप्त जलपान एवं धन्यवाद ज्ञापन के उपरांत सभा को स्थगित किया गया |

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (09-03-2019) को "जूता चलता देखकर, जनसेवक लाचार" (चर्चा अंक-3268) पर भी होगी।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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