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शुक्रवार, 8 मार्च 2019

कुछ और नहीं हमी की तरह है

कुछ और नहीं हमी की तरह है
ये जिंदगी जिंदगी की तरह है
यो न झुका सर हर चैखटों पर
ये आदत बंदगी की तरह है
क्यूं जां लेके घूमता है हथेली पे
ये जूर्रत आशिकी की तरह है
रात ख्वाबों में उससे मुलाकात हुई
उसकी हर बात मौसिकी की तरह है
ळो अब ख्याल गजल बनने ळगे
हर खुशी गम, गम खुशी की तरह है
यूॅ तो चमकते सितारे खूब हैं पर
चाॅद बिन फ़लक में कुछ कमी की तरह है
फिर मयस्सर हुआ मुदृतों बाद मुझको
ये माॅं का आँचल बिल्कुल जमीं की तरह है
मुझे शहर छोड़ अब घर जाना ही होगा
माॅ से मिलने की चाहत बेखुदी की तरह है


3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (09-03-2019) को "जूता चलता देखकर, जनसेवक लाचार" (चर्चा अंक-3268) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. https://www.amarbalecha.com/2019/06/whatsapp-tips-and-tricks.html

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