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रविवार, 24 अप्रैल 2016

पिड़ा

पीड़ा

गरीबी  की गलियों मे,
                यह मन बहुत अकेला है |
रंग महल मे उनके,
               खुशीयों का मेला हैं |
दिन रैन श्रम कोल्हू मे पिसकर
           जीवन कण मैं  रचता हूँ |
शीत से हैं प्रीत मेरी कसकर,
ग्रीष्म सखा संग मै चलता हूँ |
जिंने की जद्दोजहद में यह तन,
हरदम साहूकार  तुफानो से खेला हैं |
गरीबी की गलियों में,
             यह मन बहुत अकेला हैं|
रंग महल मे उनके
         खुशियों का मेला हैं |
सेवक  बन जो सरकार चलाए,
मिल बैठ कर प्रेम भाव से,
करतल ध्वनि से वेतन  आकार बढ़ाए|
    क्या है उन्हें प्रेम मेरी पीड़ा से ?
अन्न का दाता मैं,मिटकर खुद,
तुमको जीवन देता हूँ |
देख दयालु (?) कभी उनको भी ,
दर्द जिनका चहुँ ओर  फैला हैं,
गरीबी की गलियों मे
यह मन बहुत अकेला हैं |
रंग महल मे उनके,
खुशियों  का मेला हैं |
आओ तुम्हें आज,
राज की बात बताता हूँ,
होली की बिसात ही क्या?
जब दिवाली भी खेतों मे,
काम करते मनाता हूँ |
रक्षा बंधन पर आँसूओं को अपने,
सावन की झड़ीयों से धो कर ,
  बहना को,प्रसन्न चेहरा दिखलाता हूँ |
दिल का दिया मेरा  
       रक्षा बंधन पर भी जलाता हूँ |
लगती जिंदगी अब तो
            बस एक झमेला है.
गरीबी की गलियों मे
           यह मन बहुत अकेला हैं,
रंग महल में उनके,
            खुशियों का मेला हैं |
   
                    जी. एस परमार
                 खानखेड़ी नीमच 

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