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सोमवार, 13 जून 2016

अमेरिका की कांग्रेस में मोदी जी का भाषण
अमेरिका की कांग्रेस में दिए मोदी जी के भाषण को लेकर कई प्रकार की बातें की जा रही हैं. उनका भाषण सार्थक था या नहीं यह एक अलग बहस का मुद्दा है, मैं जिस बात पार आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ वह तथाकथित उदारवादियों (लिबरल्स) की प्रतिक्रिया. तथाकथित कहने का कारण है. मेरे मानने में अगर कोई व्यक्ति सच में उदारवादी है तो वह हर समय और हर स्थिति में उदारवादी होगा.  ऐसा व्यवहार हमारे उदारवादियों का नहीं होता. हमारे उदारवादी, चाहे वो वामपंथी हों या कोई और पंथी, स्थिति और समय अनुसार ही उदारवादी होते हैं.
अब इन लिबरल्स की समस्या यह है कि इस देश में शुरू से ही इन्हें राजनेतिक संरक्षण मिला. नेहरु जी यूरोपियन अधिक और भारतीय कम थे और उन्हीं लोगों के संगत पसंद करते थे जो उन्हीं की भाँति यूरोप से पढ़ कर आये थे और पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित थे. इसी कारण राजेन्द्र प्रसाद जैसे लोगों से उनके सम्बन्ध सहज नहीं थे.
उसी काल से तथाकथित उदारवादियों को पनपने का अवसर मिला. इन्हें इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, जे एन यू जैसी कई अन्य संस्थाओं में उन्हें स्थान और सम्मान मिला. इनके द्वारा चलाई एनजीओ’स को सरकार से सहायता मिलने लगी. विदेश से भी चन्दा आने लगा. दिल्ली में रहने के लिए अपने लिए एक अलग दुनिया बना ली जहां न आवारा पशु घूमते हैं, न सड़कों में गड्ढे हैं और न ही फूटपाथों पर कूड़ा.
आज एक ऐसा व्यक्ति इन उदारवादियों पर राज कर रहा जो अंगेरजी भी ठीक से नहीं बोल पाता, जिसे शायद कॉन्टिनेंटल और मेक्सिकन खाने की कोई जानकारी नहीं है, और किसी वाइन का नाम भी नहीं जानता. ऐसे व्यक्ति को झेलना किसी भी उदारवादी के लिए एक चुनौती से कम नहीं है.
ऐसा व्यक्ति जब सूट-बूट कर पहन कर निकलता है और ओबामा जैसे शक्तिशाली राजनेता को गले लगाता है तो उदारवादियों के सीने पर सांप लोटना अनिवार्य ही है. एक व्यक्ति जो उदारवादियों की रत्ती भर भी उनकी परवाह नहीं करता  उसे सहन करना उनके लिए कठिन होगा ही, ख़ास कर तब जब सरकार उन एनजीओ’स  की जांच करवा रही है जिनके बलबूते पर यह लोग उदारपंथी का अपना धंधा चला रहे थे.  

एक मायने में तो उदारवादियों की भी अपनी एक जाति है. जो कोई भी इस जाति का नहीं उसको सहन करना देना उदारवादियों के लिए थोड़ा कठिन होता है और  मोदी जी किसी भी दृष्टीकोण से इस “उदारवादी” जाति के नहीं हैं. 

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