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रविवार, 19 दिसंबर 2021

एक ग़ज़ल : वह अधेरों में इक रोशनी है

 


एक ग़ज़ल


वह अँधेरे में इक रोशनी है,

एक उम्मीद है, ज़िन्दगी है ।


एक दरिया है और एक मैं हूँ,

उम्र भर की मेरी तिश्नगी है ।


नाप सकते हैं हम आसमाँ भी,

हौसलों में कहाँ कुछ कमी है।


ज़िक्र मेरा न हो आशिक़ी में,

यह कहानी किसी और की है ।


लौट कर फिर वहीं आ गए हो,

राहबर ! क्या यही रहबरी है ?


सर झुका कर ज़ुबाँ बन्द रखना,

यह शराफ़त नहीं बेबसी है ।


आजकल क्या हुआ तुझ को ’आनन’

अब ज़ुबाँ ना तेरी आतशी है ।



-आनन्द.पाठक- 

6 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (20-12-2021 ) को 'चार दिन की जिन्दगी, बाकी अंधेरी रात है' (चर्चा अंक 4284) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। रात्रि 12:30 AM के बाद प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।

    चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

    यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

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