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रविवार, 16 नवंबर 2014

पानी केरा बुदबुदा अस मानस की जात , देखत ही बुझ जाएगा ,ज्यों तारा परभात

पानी केरा बुदबुदा अस मानस  की जात ,

देखत ही बुझ जाएगा ,ज्यों तारा परभात।

यहाँ देखना शब्द महत्वपूर्ण है देखना साधरण देखना (किसी के दोष किसी के गुण देखना नहीं है )अवेर्नेस में

देखना है यह स्थिति जीवन का मर्म सार तत्व जान ने की स्थिति है। विडंबना यह है जब तक यह ज्ञानोद्य

होता है देखना,  असली देखना बनता है।जीवन चुक  जाता है।


जीवन पानी से उत्पन्न पानी से पैदा उस बुलबुले की तरह है जो प्रतीयमान  है आभासी है। वास्तव में तो

उसका

सच स्वयं पानी ही है।बुलबुला क्षणिक  है -प्राकट्य है आभासी "होना" है।

The underlying reality of a bubble is water .The bubble is just an appearance .It forms and disappears

.When

the water is quiet there is no bubble .

दिन और रात्रि की पुनरावृत्ति क्रमिक है। दिन के बाद रात और रात के बाद फिर दिन  जग और  जीवन की

यही रीत है। पौ फटते ही उषा के आते ही तारा गण विलीन हो जाते हैं।

बीती विभावरी जाग री ,

अंबर पनघट में डुबो रही ,

तारा घट उषा नागरी।

सुबह होती है शाम होती है ,

उम्र यूं ही तमाम होती है।

फिर भी मैं मैं -मैं के मुगालते में हूँ। संसार की नश्वरता को मैं (the feeling of I)नहीं जानता।

महाकवि संत कबीर चेता रहा है :

चेत  सके तो चेत -जीवन तो जा रहा है।

The world is only like this .It is an appearance in time ,like day an night in a sequence .

विशेष :जीव अपने असली स्वरूप आत्मन (आत्मा ) को नहीं जानता। परमात्मा की मटीरियल एनर्जी जो

परमात्मा

की


रचनात्मक शक्ति है उस माया में ही फंसके रह जाता है इसीलिए उसका सारा जीवन रागद्वेष में ही बीत

जाता

है। वह यह नहीं जान पाता की यह सृष्टि परमात्मा की ही अभिव्यक्ति है। परमात्मा ही इसका उपादान

(MATERIAL CAUSE )और निमित्त (नैमित्तिक कारण ,efficient cause )दोनों है।

घड़ा (मिट्टी )भी वही है कुम्हार भी वही है। किसी भी चीज़ का "होना "existence वही है। जीव जीव में फर्क नहीं

है

एक

ही

चेतना सबमें व्याप्त है। व्यक्ति के स्तर (at an individual level )पर हम उसे जीवात्मा कह देते हैं । समष्टि

(totality )के स्तर पर ईश्वर। परमात्मा। अपोज़िट्स का भेद मिटे तब देखना देखना हो जाए। अभी तो तेरे मेरे

का भेद है। अभी तो me ,mine and I मेरे सबसे बड़े संबंधी हैं।यही आध्यात्मिक दृष्टि है महाकवि कबीर की इस

साखी में।


Kabir Doha "Pani Tera Budbuda"

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (17-11-2014) को "वक़्त की नफ़ासत" {चर्चामंच अंक-1800} पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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