मित्रों!

आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।


समर्थक

बुधवार, 18 जनवरी 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 20 [मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ात[

उर्दू बह्र पर एक बातचीत " क़िस्त 20 [मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ात]

[[Disclaimer Clause  : वही जो क़िस्त 1 में है]

 ----पिछली कड़ी में हम 4-मुरक़्क़ब ज़िहाफ़्  ख़ब्ल्......शक्ल्.......ख़रब्.......सरम्...... पर् चर्चा कर चुके हैं । अब कुछ और मुरक़्क़ब  ज़िहाफ़ात की चर्चा करेंगे

5-ज़िहाफ़ सतर : यह मिश्रित [मुरक़्क़ब] ज़िहाफ़ भी दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ ख़रम+ क़ब्ज़ से मिल कर बना है । मुज़ाहिफ़ को ’अस्तर’कहते हैं  और यह ज़िहाफ़ भी सदर/इब्तिदा से मख़्सूस है
चूँकि ख़रम का ज़िहाफ़ ’मफ़ा ईलुन’ से मन्सूब है। ’मफ़ा’ के मीम [सर-ए-वतद ] को गिराना -ख़रम कहलाता है अत: यह ज़िहाफ़ ’मफ़ाईलुन’ पर लगता है और् पाँचवें मुक़ाम् पर् जो साकिन् [सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् का ] का गिराना क़ब्ज़् कहलाता है 
मफ़ा ई लुन् [12 2 2 ]+सतर् = फ़ा  इ लुन्  [2 12 ] यानी पहले मक़ाम् से ’मीम्’ गिरा दिया और् पाँचवें मुक़ाम् से ’ये’ [ई =ऐन्+ये] गिरा दिया तो बाक़ी बचा ’फ़ा इ लुन् [ऐन् मुतहर्रिक् है ] जिसे ’फ़ाइलुन्;[212] से बदल् लिया

6-ज़िहाफ़् ख़ज़्ल्  :-यह् भी  एक् मिश्रित् ज़िहाफ़ है जो मुफ़र्द [एकल] ज़िहाफ़ इज़्मार+तय्य के संयोग से बना है । मुज़ाहिफ़ का नाम  ’मख़्ज़ूल’ है  । यह आम ज़िहाफ़  है।
आप जानते है - ज़िहाफ़ इज़्मार का काम है सालिम रुक्न के सबब-ए-सकील  के  दूसरे स्थान पर जो मुतहर्रिक है]-को साकिन करना और ज़िहाफ़ तय्य का काम है सालिम रुक्न के सबब-ए-ख़फ़ीफ़ के चौथे स्थान पर हो-जो साकिन है को गिराना ।
अब यह सूरत सिर्फ़ एक ही सालिम रुक्न में ही सम्भव  [मुमकिन] है और वह  सालिम रुक्न है ’मु त फ़ा इलुन [1 1 2 12]= जिस में  मु त [1 1][सबब-ए-सकील]+फ़ा [2] [सबब-ए-ख़फ़ीफ़]+ इलुन [12] [वतद-ए-मज्मुआ] है
  मु त फ़ा इलुन [1 1 2 12] + ख़ज़्ल = मुत् फ़ इलुन् [ 2 1 12] यानी दूसरे मुक़ाम् पर् जो -त- [जो मुतहर्रिक् है] को साकिन् किया तो-त्-[साकिन्] बचा जो मीम् के साथ् मिल् कर् -मुत् [2] बना लिया । और् - फ़ा - [फ़े+अलिफ़] का अलिफ़ जो चौथे स्थान पर है -तय्य’ के अमल से गिरा दिया तो बचा फ़े [मुतहर्रिक वज़न 1] इस प्रकार अमल के बाद जो शेष रुक्न बची वो बची मुत् फ़ इलुन् [ 2 1 12 [ जिसे रुक्न् -मुफ़् त इलुन् से बदल् लिया 

7- ज़िहाफ़ क़सम :- यह मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ भी दो मुफ़र्द [एकल] ज़िहाफ़ असब+अज़ब से मिल कर बना है मुज़ाहिफ़ को ’अक़सम’ कहते है । यह ज़िहाफ़ भी सदर और इब्तिदा से मन्सूब है
आप जानते है कि ज़िहाफ़ ’असब’ का काम है सबब-ए-सक़ील के दूसरे मुत्तहर्रिक [जो किसी  सालिम रुक्न  के पांचवें मुक़ाम पर आता हो तो ] को साकिन करना 
और अजब का काम है वतद-ए-मज्मुआ के सर-ए-रुक्न को ’ख़रम’ करना यानी कहीं  ’मुफ़ा’ [वतद मज्मुआ ] आए तो मीम को गिराना ।आप अगर ग़ौर से देखें तो ’सबब-ए-सक़ील [2-हर्फ़ी] का हर्फ़-ए-दोयम पाँचवे मक़ाम पर तभी आयेगा जब कि इस के पहले वतद [3 हर्फ़ी] आता हो । और ऐसा बस एक ही रुक्न है -मफ़ा इ ल तुन’ [1 2 1 1 2] जो ये शर्त पूरी करता है
मुफ़ा इ ल तुन [12 1 1 2]+ क़सम = फ़ा इल् तुन् [ 2 2 2 ] यानी ज़िहाफ़् ’अज़ब्’ से मुफ़ा का ’मीम्’ गिरा दिया और् ज़िहाफ़् असब् से ’इ ल ’ [सबब्-ए-सक़ील्] के ’लाम’ को साकिन् कर् दिया तो बाक़ी बचा फ़ा इल् तुन् [2 2 2] जिसे रुक्न् ’मफ़् ऊ लुन्’ [2 2 2] से बदल लिया ।[इ ल [1 1]  सबब्-ए-सक़ील्  जब  इल् [2] हो जाता है तो सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् का वज़न् देता है ]
8-ज़िहाफ़ जमम :-यह मुरक़्क़ब [ मिश्रित]ज़िहाफ़ दो मुफ़र्द [एकल] ज़िहाफ़ अज़ब+अक़्ल से मिल कर बना है । इस की मुज़ाहिफ़ शकल को ’अज़्म’ कहते हैं और यह ज़िहाफ़ भी शे’र में सदर/इब्तिदा से  मख़्सूस है 
  आप जानते हैं   [और जैसा  ऊपर लिख भी चुके हैं] कि अजब का काम है वतद-ए-मज्मुआ के सर-ए-रुक्न को ’ख़रम’ करना यानी कहीं  ’मुफ़ा’ [वतद मज्मुआ] आए तो ’मीम’ को गिराना । और ’ज़िहाफ़ ’अक़्ल’ का काम है -सबब-ए-सक़ील के मुतहर्रिक दोयम [यानी सबब-ए-सक़ील में दूसरे स्थान पर का मुत्तहर्रिक अगर पाँचवें स्थान पर आए तो ]---को गिराना है। हम यह भी जानते हैं कि यह स्थिति सिर्फ़ एक रुक्न में बन सकती है और वो रुक्न है-मुफ़ा इ ल तुन ; जिसम वतद-ए-मज्मुआ [3]+सबब-ए-सक़ील [2]+सबब-ए-ख़फ़ीफ़[2] आता है 
मुफ़ा इ ल तुन [12 1 1 2 ]+ जमम = फ़ा इ तुन [2 1 2] यानी मुफ़ा का ख़रम कर दिया यानी मीम गिरा दिया  तो बचा ’फ़ा’[2] और अक़्ल के अमल से ’इ ल ’ [सबब-ए-सक़ील ] का लाम गिरा दिया तो बचा खाली -इ[1] यानी मुज़ाहिफ़ रुक्न हो गई -फ़ा इ तुन [2 1 2] जिसे मानूस रुक्न ’फ़ाइलुन’ [212] से बदल लिया
 एक बार दोनो ज़िहाफ़ ’क़सम’ और ’जमम’ को ध्यान से देखें ---कोई फ़र्क़ नज़र आता है ? जी हाँ है फ़र्क़ । और वो फ़र्क़ है मात्र  हर्फ़-ए-सक़ील के हर्फ़-ए-दोयम मुतहर्रिक में । पहले केस में यह  ’साकिन’ करार पाता है जब कि दूसरे केस में यह ’साकित’ यानी गिरा दिया गया है 
चलते चलते एक बात और ---हम नौ मश्क़ शायर [यानी नवी नवी  शायर जो शायरी करते हैं ] तो 2122  1222  22  122 .....जैसे अलामत लगा कर शायरी करते है ..यह तरीक़ा शुरुआती दौर में तो काम कर जाता है मगर गहराईयों में उतरने  पर यह निज़ाम भी बहुत  कारगर नहीं होता  " देख कर नहीं बता सकते कि 1 की अलामत साकिन के लिए है या हरकत के लिए है जैसे 
इल  और इल्  दोनो ही सबब है  पहले का वज़न 1 1 है और दूसरे का वज़न 2 है ।पर जब -ल- मय हरकत होगा तब भी वज़न 1 से दिखाते है और जब -ल- मय साकिन होगा तब भी वज़न 1 से ही दिखाते हैं ।
मगर घबराइए नहीं------ फिर भी गिर्दान 1222  2122   2212....अलामत बहुत हद तक कारगर साबित होती है। यह बात तो मैने यूँ ही लिख दी--बात चली तो बात निकल आई
खैर ..अब अगले ज़िहाफ़ पर चलते है 

9- ज़िहाफ़ नक़्स : यह मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ भी दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ असब+कफ़्फ़ से मिल कर बना है इसके मुज़ाहिफ़ को -मन्क़ूस- कहते हैं
ज़िहाफ़ ’असब’ का काम तो आप ने ऊपर देख ही लिया है कि कैसे अमल करता है।ज़िहाफ़ असब का काम है अगर सालिम रुक्न में -सबब-ए-सक़ील के दूसरे मुत्तहर्रिक जो किसी  सालिम रुक्न  के पांचवें मुक़ाम पर आता हो तो उस को साकिन करना और ज़िहाफ़ कफ़्फ़ का काम है कि सालिम रुक्न में सबब-ए-ख़फ़ीफ़ का साकिन अगर ’सातवें’ मुक़ाम पर आता है तो उसको गिराना ।  ऐसी स्थिति -  एक ही रुक्न में आती है और वो वही रुक्न है --मुफ़ा इ ल तुन् [12 1 1 2] जो उपर लिखा है 
मुफ़ा इ ल तुन [12 1 1 2] +नक़्स  = मुफ़ा इ ल् तु [1 2 2 1] यानी पाँचवे मुक़ाम् पर् जो-ल- मुतहर्रिक् है -को साकिन् -ल्- करना और् सातवें मुक़ाम् पर् जो -न्- साकिन् है -को गिराना तो बाक़ी बचा मुफ़ा इल् तु [ 12 2 1]  यहां-तु [1] मय् हरकत् बचा
जिसे -मफ़ा ईलु [12 21] से बदल् लिया 
10- ज़िहाफ़्  अक़्स् :-यह् मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ दो  ज़िहाफ़  अज़ब+नक़्स से मिल कर बना है दूसरे शब्दों में आप यह भी कह सकते हैं कि यह 3-मुफ़र्द ज़िहाफ़ अज़ब+असब+कफ़ से मिल कर बना है  ,इसके मुज़ाहिफ़ का नाम ’अक़स’ है और यह ज़िहाफ़ भी शे’र के सदर/इब्तिदा मुक़ाम के लिए निर्धारित है
अजब का काम है वतद-ए-मज्मुआ के सर-ए-रुक्न को ’ख़रम’ करना यानी कहीं  ’मुफ़ा’ [वतद मज्मुआ ] आए तो मीम को गिराना और ज़िहाफ़ असब का काम है सबब-ए-सक़ील के मुतहर्रिक दोयम [जो किसी सालिम रुक्न के पाँचवे मुक़ाम पर आता हो] को साकिन करना और ज़िहाफ़ कफ़ का काम है सबब-ए-ख़फ़ीफ़ के साकिन [जो सालिम रुक्न के सातवें मुक़ाम पर आता हो] को गिराना ।अब ऐसी स्थिति तो सिर्फ़ एक ही सालिम रुक्न में हो सकती है और वो है -मुफ़ा इल तुन
मुफ़ा इ ल तुन् [12 1 1 2] + अक़्स = फ़ा इल् तु [2 2 1 यानी अज़ब् से मुफ़ा को ख़रम् किया यानी मीम् को गिरा दिया तो बचा -फ़ा’ ,ज़िहाफ़् असब् से चौथे स्थान पर जो [सबब-ए-सक़ील का ] -ल-मुतहर्रिक है को साकिन किया तो बचा -इ ल् - और् ज़िहाफ़् कफ़् से सातवें मुक़ाम पर जो नून साकिन है -को गिरा दिया तो बचा -तु-।इस प्रकार कुल मिला कर बाक़ी बचा --फ़ा इल् तु [2 2 1] जिसे रुक्न् -मफ़् ऊ लु [2 2 1] से बदल् लिया

11- ज़िहाफ़ क़तफ़ =यह मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ असब+हज़्फ़  से मिल कर बना है और मुज़ाहिफ़ को ’मक़्तूफ़’ कहते हैं और यह ज़िहाफ़ शे’र के मुक़ाम अरूज़ और जर्ब से मख़्सूस है
आप जानते है कि ज़िहाफ़ ’असब’ का काम है सबब-ए-सक़ील के दूसरे मुत्तहर्रिक जो किसी  सालिम रुक्न  के पांचवें मुक़ाम पर आता हो तो उस को साकिन करना और ज़िहाफ़ हज़्फ़ का काम है  सालिम रुक्न के  आख़िर में [अगर सबब-ए-ख़फ़ीफ़ आता हो तो ]  ’को गिराना । अब ऐसा रुक्न तो बस एक ही है -मुफ़ा इ ल तुन [1 2 1 1 2 ] यानी वतद[मुफ़ा]1 2  +सबब-ए-सक़ील[ इ ल ] 1 1  +सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [तुन] 2 , जिस पर यह अमल हो सकता है
मुफ़ा इ ल तुन [12 1 1 2] + क़तफ़  = मुफ़ा इ ल् [ 12 2] यानी इ ल के लाम् को साकिन् कर् दिया तो बचा -ल्- और् हज़्फ़् से तुन् गिरा दिया तो  बचा  -मुफ़ा इल् [1 2 2] जिसे -फ़ऊलुन् [1 2 2] से बदल् लिया

12-ज़िहाफ़ ख़ल’अ = यह मुरक़्क़ब ज़िहाफ़  दो मुफ़र्द ज़िहाफ़  ख़ब्न+क़त’अ के संयोग से बना है  और मुज़ाहिफ़ का नाम -मख़्लू’अ-होगा और यह ज़िहाफ़ भी शे’र के अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम से निर्धारित है 
आप जानते हैं कि ज़िहाफ़ ख़ब्न का काम है सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [जो रुक्न के शुरु में आता हो तो  ] के हर्फ़-ए-साकिन को गिराना है और ज़िहाफ़ क़त’अ का काम है वतद-ए-मज़्मुआ [अगर रुक्न के आखिर में आता हो] को साकिन को गिराना और उससे पहले जो हर्फ़-ए-मुतहर्रिक है को साकिन करना } अब ऐसा रुक्न तो बस एक ही है जिसमे सबब-ए-ख़फ़ीफ़ शुरु[2]  में आता है और वतद मज़्मुआ रुक्न[21] के आख़िर में आता है और वो रुक्न है --मुस् तफ़् इलुन् [2 2 12]
मुस् तफ़् इलुन् [ 2 2 12] + ख़ल’अ = मु तफ़् इ ल् [1 2 2] यानी मुस् का -स्-गिरा दिया और इलुन् का -न्- गिरा दिया और् उस् से पहले जो मुतहर्रिक् -लु- है उसे साकिन् कर दिया तो बाक़ी बचा मु तफ़् इल् [1 2 2] जिसे मानूस् रुक्न् -फ़ऊलुन् [1 2 2] से बदल लिया  
13-ज़िहाफ़ नह्र =यह मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ जद्द’अ+कसफ़ से मिल कर बना है और मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मन्हूर्। यह ज़िहाफ़ भी शे’र के अरूज़ और जर्ब मुक़ाम से मख़सूस है
आप जानते हैं किसी रुक्न के शुरु  में 2-सबब-ए-ख़फ़ीफ़ लगातार आए तो इसको गिराना ’जद्द’अ कहलाता है और किसी रुक्न के आखिर में वतद-ए-मफ़रुक़ [हरकत+साकिन+हरकत] आए तो हरकत दोयम को गिरा देना ’कसफ़’कहलाता है । अब ऐसी स्थिति  तो सिर्फ़ एक ही रुक्न में होगी और वो रुक्न है -मफ़ ऊ लातु’ [बह्र-ए-मुक़्तज़िब का बुनियादी रुक्न]
मफ़ ऊ लातु 2 2 2 1]  + नह्र = ला [2] यानी ज़िहाफ़ जद्द’अ की अमल से दोनो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ मफ़ और ऊ दोनो गिरा दिया और कस्फ़ के अमल से लातु का मुतहर्रिक -तु-गिरा दिया तो बाक़ी बचा -ला [लाम+अलिफ़] [2] इसे मानूस रुक्न फ़े’अ [2] यहाँ ऐन साकिन है  
14-ज़िहाफ़् सलख़ = यह् मुरक़्क़ब् ज़िहाफ़् दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ जब्ब+वक़्फ़ से मिल कर बना है और मुज़ाहिफ़ को -मस्लूख़्-कहते हैं 
आप जानते हैं कि ज़िहाफ़ ’जब्ब’ का काम है दो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ [जो किसी रुक्न के आख़िर में आते हों] को एक साथ गिराना और वक़्फ़ का काम है वतद-ए-मफ़रूक़ के मुतहर्रिक दोयम को साकिन करना 
तो ऐसी स्थिति सिर्फ़ एक सालिम रुक्न में आता है और वो रुक्न है -फ़ा’अ ला तुन [21 2 2 ] यानी बहर-ए-रमल  का बुनियादी रुक्न का मुफ़स्सिल शकल है
फ़ा’अ ला तुन [2 1 2 2] + सलख = फ़ा’अ [2 1] यहाँ -ऐन साकिन है । यानी ज़िहाफ़ जब्ब से दोनों  सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [जो रुक्न के अन्त में है] -ला- और -तुन- गिरा दिया और फ़ा’अ [जिस में -ऐन- मुत्तहर्रिक है ] को साकिन कर दिया तो बचा -ऐन [साकिन] अत: बाक़ी बचा -फ़ा’अ [ बसकून-ए-ऐन ] [21]
15-ज़िहाफ़ दरस = यह मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ क़स्र+बतर से मिल कर बना है और मुज़ाहिफ़ का नाम है -मद्रूस् ।यह ज़िहाफ़ भी अरूज़ और जर्ब से मख़्सूस है
आप जानते है कि ज़िहाफ़ कस्र का काम है सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [अगर रुक्न के आख़िर मे हो तो ] के हर्फ़-ए-साकिन को गिराना और उस से पहले के मुतहर्रिक को साकिन करना  और [अगर किसी रुक्न के आखिर में सबब-ए-ख़फ़ीफ़ हो और उस से पहले वतद-ए-मज्मुआ हो तब]  ज़िहाफ़ बतर का काम है -वतद-ए-मज्मुआ को गिराना 
ऐसी स्थिति तो निम्न रुक्न में बनती है फ़ा इला तुन  [ 2 12 2]
फ़ा इला तुन् [2 12 2] + दर्स = फ़ा त् [21] यानी ज़िहाफ़् कस्र् से तुन का -न-[नून] गिरा दिया और इस से पहले जो मुतहर्रिक -तु- है को साकिन कर दिया तो -त्- बचा और ज़िहाफ़ बतर से वतद -ए-मज्मुआ -इला- गिरा दिया तो बचा रह गया- फ़ा -और -त्- यानी  -फ़ा त् [2 1] जिसे मानूस् रुक्न् -फ़ा’अ [21] [बसकून्-ए-ऐन्] से बदल् लिया

16-ज़िहाफ़ जह = यह भी एक मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ है जो दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ बतर+हज़्फ़ से मिल कर बना है और मुज़ाहिफ़ का नाम है ---मजहूफ़
आप जानते हैं कि [अगर किसी रुक्न के आखिर में सबब-ए-ख़फ़ीफ़ हो और उस से पहले वतद-ए-मज्मुआ हो तब]ज़िहाफ़ बतर का काम है -वतद-ए-मज्मुआ को गिराना [
और [अगर सबब-ए-ख़फ़ीफ़ रुक्न के आख़िर में आता हो तो ] ज़िहाफ़ हज़्फ़ का काम है सबब-ए-ख़फ़ीफ़ को गिराना  सालिम रुक्न ’फ़ा इला तुन’ ही एक ऐसा सालिम् रुक्न् है जो यह शर्त पूरा  करता है
  फ़ा इला तुन [2 12 2 ] + जह्फ़ = फ़ा [2] यानी ज़िहाफ़ बतर की अमल से वतद-ए-मज्मुआ [ इला 1 2 ] गिरा दिया और ज़िहाफ़ हज़्फ़ की मदद से सबब-ए-ख़फ़ीफ़ -’ तुन’[2] गिरा दिया तो बाक़ी बचा ’फ़ा’ [2] जिसे मानूस रुक्न ’फ़े’अ [2]  [बसकून-ए-एन]से बदल लिया
17 ज़िहाफ़ रब्ब’अ = यह भी एक मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ है जो दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ ख़ब्न +बतर से मिल कर बना है और जिसके  मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मरबू’अ
आप जानते ही हैं कि ज़िहाफ़ खब्न का काम है सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [जो रुक्न के शुरु में आता हो] का हर्फ़-ए-साकिन को  गिराना और  ज़िहाफ़ बतर का काम है -वतद-ए-मज्मुआ को गिराना [अगर किसी रुक्न के आखिर में सबब-ए-ख़फ़ीफ़ हो और उस से पहले वतद-ए-मज्मुआ हो तब] अब ऐसी शर्त तो सालिम रुक्न ’फ़ा इला तुन [2 12 2] में ही आती है 
फ़ा इला तुन [2 12 2] +रब्ब’अ = फ़ तुन् [1 2] यानी ज़िहाफ़ ख़ब्न के अमल से सबब-ए-ख़फ़ीफ़ -फ़ा[2] का अलिफ़ गिरा दिया तो बचा -फ़े- और बतर के अमल से -वतद-ए-मज्मुआ -इला- [12] गिरा दिया तो बाक़ी बचा तुन्-[2]
इस प्रकार बचा -फ़ तुन् [12] जिसे मानूस रुक्न -फ़ ’अल् [1 2] से बदल् लिया यहाँ -ल्- साकिन् है  और् ऐन् मय् हरकत् है  जो ’अ [ऐन+लाम् मिलकर ’अल्- [2] बना लिया सबब्-ए-ख़फ़ीफ़]
---------------------------------------
(क)    अभी मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ का ज़िक़्र ख़त्म  नहीं हुआ । ये तो मात्र उन ज़िहाफ़ात का ज़िक़्र ख़त्म हुआ जिनके मुरक़्क़ब का कोई नाम होता है । दो या दो से अधिक ज़िहाफ़ हैं  ऐसे हैं  जो किसी सालिम् रुक्न् पर् अलग् अलग् अमल् तो करते हैं मगर् उनका  कोई संयुक्त मुर्क़्क़ब नाम तो नहीं है,  परन्तु सालिम रुक्न के टुकड़ों पर one by one काम करते हैं ,अमल करते हैं और उनके मुज़ाहिफ़ नाम में इन दोनों मुफ़र्द ज़िहाफ़ का नाम शामिल कर लेते  हैं । मुफ़र्द [एकल] ज़िहाफ़ कभी भी हासिल-ए-मुज़ाहिफ़ पर नहीं लगाते यानी मुज़ाहिफ़ का मुज़ाहिफ़ नहीं होगा -उसूलन ये ग़लत होगा
(ख) ऐसा नहीं है कि मुज़ाहिफ़ पर ज़िहाफ़ नहीं लगते । लगते हैं --ज़रूर लगते है । उसके के लिए Exclusively दूसरा निज़ाम [व्यवस्था] है और इस व्यवस्था का नाम है
(i) तस्कीन-ए-औसत का अमल 
(ii) तख़्नीक़ का अमल 

  और् ये दोनो ज़िहाफ़ -मात्र मुज़ाहिफ़ रुक्न पर ही अमल करते है ......सालिम रुक्न पर अमल नहीं करते ।
बेहतर होगा कि इसकी चर्चा हम अलग से और विस्तार से किसी अगली क़िस्त में करें तो भ्र्म की गुंजाइश नहीं रहेगी और बात भी साफ़ साफ़ समझ में आ जायेगी।
(ग)   और भी बहुत से मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ है जिनका ज़िक़्र यहाँ पर मैने नहीं किया है  जो किसी भी अरूज़ की मुस्तनद [प्रमाणित] किताब में मिल जायेगी । हम ने तो मात्र उन्हीं ज़िहाफ़ात का ज़िक़्र किया है जो मानूस हैं और उर्दू शायरी में कसरत [बहुतायत] से प्रचलित [राइज़] है । एक बात तो तय हैं कि मुतक़्क़ब ज़िहाफ़ जो दो या दो से ज़्यादा एकल ज़िहाफ़ से मिल कर बना है उन तमाम एकल जिहाफ़ का ज़िक़्र और उनके तरीक़-ए-अमल पर चर्चा पहले ही कर चुका हूँ 
अगली कड़ी में ज़िहाफ़ात की चर्चाओं को एक जगह पर sum up करते हुए  ,कुछ अन्य विषयों पर चर्चा करूँगा जिससे  सुधी पाठक गण को विषय को दुहराने और समझने में सुविधा होगी ।    

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात और तज़्क़िरात के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  ,मेरे  बड़े भाई अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर कि बिसात कहाँ  । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी नहीं है बस साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

www.urdu-se-hindi.blogspot.com
or
www.urdusehindi.blogspot.com
-आनन्द.पाठक-
0880092 7181

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें