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शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

एक ग़ज़ल : गो धूप तो हुई है ....

एक ग़ज़ल : गो धूप तो हुई है.....

गो धूप तो हुई है , पर ताब वो नहीं है
जो ख़्वाब हमने देखा ,यह ख़ाब वो नही है
मज़लूम है कि माना ख़ामोश रहता अकसर
पर बे नवा नही है ,बे आब वो नही है
कुछ मग़रिबी हवाओं का पुर असर है शायद
फ़सले नई नई हैं ,आदाब वो नहीं है
अपने लहू से सींचा है जाँनिसारी कर के
आई बहार लेकिन शादाब वो नही है
एह्सास-ए-हिर्स-ओ-नफ़रत ,अस्बाक़-ए-तर्क-ए-उल्फ़त
मेरी किताब-ए-हस्ती में बाब वो नहीं है
इक नूर जाने किसका दिल में उतर गया है
एहसास तो है लेकिन क्यूँ याब वो नही है
ता-उम्र मुन्तज़िर हूँ दीदार-ए-यार का मैं
बेताब जितना ’आनन’ ,बेताब वो नही है


शब्दार्थ
ताब =गरमी/चमक/उष्णता
मजलूम = जिस पर जुल्म हुआ हो/पीड़ित/शोषित
बे-नवा = बिना आवाज़ का /गूँगा
बेआब = बिना इज्जत का
मगरिबी हवाएँ = पश्चिमी सभ्यता
जानिसारी =प्राणोत्सर्ग
आदाब =तमीज-ओ-तहज़ीब
शादाब = खुशहाली
एहसास-ए-हिर्स-ओ-नफ़रत ,अस्बाक़-ए-तर्क-ए-उलफ़त
= लालच और नफ़रत की अनुभूति और प्यार मुहब्बत के छोड़ने
भुलाने के सबक़/पाठ
मेरी किताब-ए-हस्ती = मेरे जीवन की किताब में
याब = प्राप्य/मिलता
मुन्तज़िर = इन्तज़ार में /प्रतीक्षा में
-आनन्द.पाठक-
08800927181

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (07-01-2017) को "पढ़ना-लिखना मजबूरी है" (चर्चा अंक-2577) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    नववर्ष 2017 की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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