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शनिवार, 11 अप्रैल 2020

चन्द माहिया

चन्द माहिया

1
ये रात ,ये  तनहाई
सोने कब देती
वो तेरी अंगड़ाई

2
जो तू ने कहा, माना
तेरी निगाहों में
फिर भी हूँ अनजाना

3
कुछ दर्द-ए-ज़माना है
और ग़म-ए-जानां
जीने का बहाना  है

4
कूचे जो गए तेरे
सजदे से पहले
याद आए गुनह मेरे

5
इक वो भी ज़माना था
हँस कर रूठी तुम 
मुझको ही मनाना था

-आनन्द.पाठक-

7 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (15-04-2020) को   "मुस्लिम समाज को सकारात्मक सोच की आवश्यकता"   ( चर्चा अंक-3672)    पर भी होगी। -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    कोरोना को घर में लॉकडाउन होकर ही हराया जा सकता है इसलिए आप सब लोग अपने और अपनों के लिए घर में ही रहें।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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