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बुधवार, 31 जुलाई 2013

नरक की अंतिम जमीं तक गिर चुके है आज जो
नापने को कह रहे , हमसे बह  दूरिया आकाश की ..

इस कदर भटकें हैं युबा आज के इस दौर में 
खोजने से मिलती नहीं अब गोलियाँ  सल्फास की 

आज हम महफूज है ,क्यों दुश्मनों के बीच में
दोस्ती आती नहीं है रास अब बहुत ज्यादा पास की

बँट  गयी सारी जमी ,फिर बँट गया ये आसमान
क्यों आज फिर हम बँट गए ज्यों गड्डियाँ हो तास की

हर जगह महफ़िल सजी पर दर्द भी मिल जायेगा
अब हर कोई कहने लगा है  आरजू बनवास की

मौत के साये में जीती चार पल की जिंदगी
क्या मदन ये सारी  दुनिया, है बिरोधाभास की


मदन मोहन सक्सेना

18 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया आदरणीय मदन जी-

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    1. आप की हार्दिकता सदैव कुछ न कुछ नया करने को प्रेरित करती है | प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    साझा करन् के् लिए आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 01/08/2013 को चर्चा मंच पर है
    कृपया पधारें
    धन्यवाद

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    उत्तर
    1. आप की हार्दिकता सदैव कुछ न कुछ नया करने को प्रेरित करती है | प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ

      हटाएं
  4. सच ही तो है दोस्त ये दुनिया विरोधाभास की,
    यही तो है ईश-माया जो न दिल से जा सकी |

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  5. आदरणीय सुन्दर रचना की बधाई !

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