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सोमवार, 29 जुलाई 2013

"सतरंगी-शहनाई हो"

'सतसईया' का दोहा हो या,  'पदमावत'चौपाई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?
केश-कज्जली ,छवि कुन्दन सी,
चन्दन जैसी   गंध   लिये |
देवलोक    से     पोर-पोर में,
भर   लाई   क्या  छंद प्रिये | 
 चक्षुचकोर,चन्द्रमुख चंचल,चन्दनवन से आई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?
रक्त - कपोल,   नासिका तीखी, 
अधर  पगे, मधु  प्याले से |
क्षण-क्षण मुस्कानों से पूरित-,
मृग-नयना ,   मतवाले    से |
मदमाती,मदमस्त,मुखर सी,मस्त-मस्त अंगडाई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की, सबसे  श्रेष्ठ रुबाई हो ?
देह-कलश  से बरस    रही है, 
यौवन   की   रसधार    प्रिये  |
पुष्प - लता सी  स्वर्ण-देह में,
घुंघरू   सी   झनकार   प्रिये |
मलयागिरि से चली मस्त हो,  मंद वही पुरवाई हो ?
 या बच्चन की 'मधुशाला'की ,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?
मेरे लिये सुमुखि आई हो ?,
धरती पर  नव-छन्द लिए |
महक रहा  जो  मधुर गंध  से,
अमृत-घट  निज  संग  लिए |
सप्त-लोक के सप्त-सुरों की , सतरंगी-शहनाई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की ,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?

4 टिप्‍पणियां:

  1. चक्षुचकोर,चन्द्रमुख चंचल,चन्दनवन से आई हो ?
    या बच्चन की 'मधुशाला'की,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?
    बहुत सुन्दर ... आभार

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  2. सुन्दर प्रस्तुति ....!!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार (30-07-2013) को में” "शम्मा सारी रात जली" (चर्चा मंच-अंकः1322) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. अप्रतिम रचना
    भा गई मन को
    सादर

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