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बुधवार, 18 मार्च 2015

लघु कथा 13 : मान-सम्मान


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"....कुछ तर्बियत बची है कि नहीं कि सब घोल कर पी गये  तुम लोग..." -पड़ोसी अब्दुल चाचा ने नन्हें को लानत भेजते हुए साधिकार कहा- " तुम लोगो को मालूम है कि नहीं कि भाई जान यानी तुम्हारे पिता जी एक हफ़्ते से खाट पकड़े है ...पंडित जी को कोई देखने वाला नही...और तुम लोग हो कि.."
पिछले हफ़्ते बाथरूम में फिसल गये  पिता जी ---चोट गहरी लगी थी --खाट पकड़ लिया था  । कोई देखने वाला नहीं--कोई सेवा करने वाला नही। शून्य में कुछ निहारते रहते थे। मन ही मन कुछ बुदबुदाते रहते थे एकान्त में  ।लड़के सब बाहर अपने अपने काम में व्यस्त। देखने कोई नहीं आया  । अब्दुल चाचा ने नन्हें को ख़बर कर दिया  ।
नन्हें भागा -भागा पिता जी को देखने आया ।देख कर घबरा गया।मरणासन्न स्थिति में आ गये हैं अब तो। हालत देख कर आभास हो गया कि पिता जी अब ज़्यादा दिन नहीं चलेंगे।
" भईया ! पिता जी को आप दो महीने अपने यहाँ रख लेते तो मैं अपनी बेटी की शादी निपटा लेता फिर मैं उन्हें अपने यहाँ ले जाता"- नन्हें ने बड़े भाई को टेलीफोन पर अपनी व्यथा बताई
" नन्हें ! तू तो जानता ही है कि मैं हार्ट का मरीज़ हूँ डाइबिटीज है ..सुगर लेवेल बढ़ गया है आजकल....मैं तो ख़ुद ही मर रहा हूँ"- बड़े भाई ने अपनी असमर्थता जताई और पत्नी पार्श्व में खड़ी निश्चिन्त हो गईं
नन्हें ने  छॊटे भाई से बात की--" छोटू ! पिता जी को अगर दो महीने के लिए अपने पास रख..लेता तो......"
बात पूरी होने से पहले ही छोटू बोल उठा-" भईया ! बम्बई की खोली में एक कमरे का मकान भी कोई मकान होता है ---पाँव फैलाओ तो दीवार से सर लगता है...स्साला रोज घुट घुट कर जीना-पड़ता है अरे !--इस जीने से तो मर जाना बेहतर---भईया ! आप मेरी मज़बूरी तो जानते ही हो..." छोटे ने अपनी असमर्थता जताई और पत्नी पार्श्व में खड़ी मुस्कराई
 थक हार कर नन्हे एम्बुलेन्स’  खोजने निकल गया कि कोई उधारी में एम्बुलेन्स मिल जाता तो.....
 पिता जी अकेले खाट पर पड़े शून्य में बड़ी देर तक छत की ओर निहारते रहे....कुछ सोचते रहे...शायद अतीत चलचित्र की भाँति एक बार उनके नज़रों के सामने से घूम रहा था......बेटों के जवाब सुनने से पहले..भगवान ने सुन ली...टिमटिमाटी लौ थी...बुझ गई...कमरे में धुँआ फैल गया ...एक इबारत उभर गई

तमाम उम्र  इसी  एहतियात  में  गुज़री
                  कि आशियाँ किसी शाख-ए-चमन पे बार न हो

[बार =भार]

 नन्हें ने सबको खबर कर दिया ....
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"नन्हें ! तू वहीं रुक ,मैं आ रहा हूँ ! पिता जी का क्रिया-कर्म गाजे-बाजे के साथ बड़ी धूम-धाम से होना चाहिए ..पूरे गाँव को बुलाना है...पूरे शहर को खिलाना है
पूरे शहर में कितना "मान सम्मान"था पिता जी का। शहरवालों को भी तो पता चले कि वकील साहब के लड़को ने मान-सम्मान में कोई कसर नहीं छोड़ी...."-बड़े भाई ने फोन किया

जो ’मर ’ रहे थे वो ’ज़िन्दा’ हो गए .... जल्दी जल्दी तैयार होकर अपनी गाड़ी निकाली और रवाना हो गए---पिता जी की ’विरासत’ सम्भालने और ’नगदी’-गहने भी !

-आनन्द.पाठक
09413395592

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (20-03-2015) को "शब्दों की तलवार" (चर्चा - 1923) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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