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गुरुवार, 5 मार्च 2015

क्या अजब ज़माना है

क्या
अजब जमाना है
लोग
बेच डालते है
माँ का नाम
और
करते है व्यवसाय
माँ के नाम पर,

भूल जाते है
संबंधो को
लूट जाते है ज़ज्बात
और
 सजा लेते है
अपनी दूकान ,

बाँध डालते है
सीमाएं
धर्म और आस्था की,

तोड़ डालते है
विश्वास की डोर
और
कर डालते है
बेघर विश्वास को,

अर्थ का
समाज है
और
अर्थ के सम्बन्ध

छिनभिन्न कर डालते है
ममत्व और भातृत्व
सच क्या
ज़माना है ?

3 टिप्‍पणियां:

  1. अर्थ का
    समाज है
    और
    अर्थ के सम्बन्ध

    छिनभिन्न कर डालते है
    ममत्व और भातृत्व
    सच क्या
    ज़माना है ?

    उत्तर देंहटाएं
  2. रंगों के महापर्व होली की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (07-03-2015) को "भेद-भाव को मेटता होली का त्यौहार" { चर्चा अंक-1910 } पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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