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शनिवार, 13 सितंबर 2014

वैदिक शब्दावली (तीसरी किश्त )

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वैदिक शब्दावली (तीसरी किश्त )

(१) कारण शरीर(The Causal Body) :जीव-आत्मा 

(Embodied  Soul )तीन किस्म के शरीर लिए रहता है 'इनमें से कारण शरीर जीव के जन्म -जन्मांतरों के कुल संचित कर्मों का हिसाब किताब लिए रहता  है।जीव-आत्मा जब एक काया से दूसरी में जाता है अपने संग संचित कर्मों का एक छोटा सा अंश लिए आता है इस दुनिया में उसे ही प्रारब्ध कहा जाता है। 

(२) सूक्ष्म शरीर (Subtle Body ):मृत्यु के समय जब जीव पुराना कॉस्टयूम (पंचमहाभूतों से बना स्थूल शरीर )छोड़ नए में जाता है तब मन बुद्धि अहंकार के रूप में कर्मों का हिसाब भी साथ ले जाता है। जन्म और मृत्यु दो दरवाज़े हैं जीव एक से दूसरे  में जाता है ,जन्म जन्मांतरों से यह सिलसिला चला आ रहा है।देह का अंत देहांत कहलाता है और एक होती है जीव की आखिरी मृत्यु जिसे परान्तकाल कहा जाता है। यह श्रीकृष्ण (पर्सनैलिटी आफ गॉड हेड )के  उन भक्तों को नसीब होती है जो कृष्णभावना -भावित रहते हैं पवित्र हृदय के साथ अपने सब कर्मों मन ,बुद्धि और अहंकार  को कृष्ण के श्री कमल चरणों में अर्पित कर देते हैं। इन्हें फिर दिव्य शरीर मिलता है ये वैकुण्ठलोकों  (श्री कृष्ण के गोलोक ,कृष्ण लोक आदि )में ही जाते हैं। 

(  ३)स्थूल शरीर (देह ):आकाश -वायु -अग्नि -जल -पृथ्वी आदि पांच महाभूतों (पांच महातत्वों )से बनी देह जिसे क्षेत्र भी कहा गया है जीव(देही ) का स्थूल शरीर (देह )कहलाता है। मृत्यु के समय इसी देह का अंत होता है देही (आत्मा )का नहीं। कांशशन्स इज़ लिमिटलैस एग्ज़िस्टेंस (सत्यम -ज्ञानम् -अनन्तं )/सच्चिदानंद।आत्मा परमात्मा का अंश होने के कारण दिव्य है अनश्वर है।पांच महाभूतों से अतीत है परे है। पदार्थ के परमाणु -अणुओं का जोड़ नहीं है जीवकोशाओं का रसोई घर  नहीं है। 

(४)कृष्ण (Krishna ):जो सभी प्राणियों को अपनी ओर आकर्षित करता है सब का हृदय (मन )और मस्तिष्क को सम्मोहित कर लेता है। वह कृष्ण है। 

"he who attracts the minds and hearts of everyone ";the Supreme personality of Godhead.

Shree  Krishna -God takes on two forms in His Divine pastimes -Krishna (the Energetic )and Radha Rani (His Divine Energy ,Yogmaya ).Krishna is also called the Complete Brahm (Absolute God )of the Universe ,to whom all the other forms of God are subservient.

(५ )कर्म :

वेदों द्वारा बताये गए विधान के अनुसार किया गया (शाश्त्र विहित )कर्म। साधारण कर्म या सकाम कर्म ,फल की इच्छा से किया गया कर्म साधारण कर्म कहा गया है इसे ही यहां हम सिर्फ कर्म कह रहे हैं। यह कर्मबंधन का कारण बनता है।देह और देह के सम्बन्धियों के भले के लिए किया गया कोई भी कर्म साधारण कर्म है। 

Kaam-lust ;high fever  

Karma -action performed according to scriptural regulations ;action pertaining to the development of the material body 

(६) अकर्म (निष्काम कर्म ):जिसका आगे फल नहीं है जो भगवान की ख़ुशी के लिए किया गया है कृष्णभावना -भावित होकर किया गया कर्म। मनुष्य का अधिकार कर्म तक सीमित है। फल देना भगवान का काम है ,फल अनेक घटकों पर निर्भर करता है इनमें से कितने ही वेरिेबिल्स हमें ज्ञात ही नहीं हैं। इसलिए निष्काम कर्म ही गीता में कर्मयोग कहा गया है। यानी कर्म करते समय में हमारा मन भगवान की तरफ हो फलेच्छा पर नहीं। 

इसे अकाम भी कहा गया है। 

desireless ;one who serves the Lord without material motive .

(७ )विकर्म :शाश्त्र के विपरीत ,सामाजिक नियमों के विपरीत ,किसी को भी आहत करने वाला कर्म ,विकर्म है यह कर्मबंधन  से बांधता है। बुरा नतीजा ही निकलता है ऐसे कर्म का। कर्मभोग भोगना पड़ता है। आगे या पीछे। इस जन्म में या आइन्दा  किसी और जन्म में। 

बहरसूरत कर्म किए बिना हम एक पल को भी नहीं रह सकते। सोते समय भी हम कर्ता  और भोक्ता दोनों ही बने रहते हैं। स्वप्न टूटने पर ही हमें बोध होता है की हम स्वप्न देख रहे थे। 

हमारी चेतना (illuminator ,consciousness ) न तो कर्ता  है ,न ही भोक्ता वह तो ब्रह्म (brahman )है।limitless existence है जो न समय पर निर्भर है न आकाश पर न ही किसी वस्तु पर। our consciouness is not dependent upon time ,space and or any other object,it is eternal .It is all knowledge (limtless knowledge ),limitless bliss i.e सच्चिदानंद।   इस सार्वभौम चेतना को जो परम चेतना का एक कण है MIND -BODY -INTELLECT COMPLEX मान लेना ही हमें  कर्म बंध  से बांधता है। गुण  ही गुणों को बरतते हैं। त्रिगुणात्मक सृष्टि (माया ),सतो-रजो -तमो गुण ही असल में कर्ता  हैं। हमारा मन जल धाराओं की तरह हैं उसमें विचार निरंतर पैदा होते रहते हैं दिन भर में ६० ,०० ० से भी ज्यादा विचार आते हैं जाते हैं कभी सतोगुण (goodness )बढ़त बना लेता है कभी रजो(passion ) तो कभी तमो. (ignorance ) . हम अपने को करता और भोक्ता मान लेने की गलती जन्म -जन्मांतरों  से करते आ रहे हैं।जब की हम न तो करता हैं न भोक्ता हैं।  

उपनिषदों  में ब्रह्म के दो रूप बतलाये गए हैं ,इनमें से-

(८) परब्रह्म -असीम ,निर्गुण ,निष्प्रपंच ,स्थिर एवं अमूर्त(impersonal 

,without form ) है। 

(९ )अपरब्रहम -सगुण ,सविशेष ,सप्रपंच एवं मूर्त (personal ,with form 

)है।    

 उपनिषदों ने  परब्रह्म को ही ब्रह्म कहा  है। अपरब्रहम को ईश्वर माना है।

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (14-09-2014) को "मास सितम्बर-हिन्दी भाषा की याद" (चर्चा मंच 1736) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हिन्दी दिवस की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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