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सोमवार, 15 सितंबर 2014

वैदिक शब्दावली (पांचवी किश्त )

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वैदिक शब्दावली (पांचवी किश्त )

(१)सहस्रबाहो :गीता में अर्जुन ने कृष्ण का विराट रूप देखकर उन्हें  सहस्रबाहो (हज़ारों हज़ार भुजाओं वाला )कहा है। श्रीकृष्ण अर्जुन को जो उनके सखा भी हैं और साख्य (सखा ,मित्र ) भाव की भक्ति  से भी सदैव संसिक्त रहते हैं दिव्य चक्षु मुहैया करवाते हैं ताकि वह उनका विश्वरूप(विराट रूप )देख सके। 

अर्जुन के अलावा कृष्ण का विराट  रूप देखने का अवसर यशोदा माता और दुर्योधन को भी मिला है। 

(२)  वेदान्त :वेदों के बाद जो ज्ञान आया है उसे वेदान्त कहा  गया है। इसका मतलब वेदों का अंत नहीं है सार है वेदों का- वेदान्त। वेदों का ज्ञानकाण्ड विभाग उपनिषद कहलाता है। जिस ज्ञान को प्राप्त करने पर व्यक्ति पर संसार के बंधन की  पकड़ ढीली पड़  जाती है वह जगत के मिथ्यत्व (नित्य परिवर्तनशील रूप ,आज है कल नहीं है )वह अपने अनंत चेतन अस्तित्व, अनंत चेतना को जान लेता है वह ज्ञान वेदों के अंत में आया है ,  उपनिषद कहलाया है। 

Vedant is one of the six philosophical treatises in Indian philosophy ,written by Ved Vyas (also known as Badarayan and Krishna dvaipaayan vyaas ,one of the incarnation of Lord Krishna  ).

Vyasa -"he who splits or compiles , an editor ",son of Paraashar Muni and Satyavati ,father of Shukadeva Gosvami ,and diciple of Narada Muni .Vyasdev splits the vedas into sections and writes them down .

(3)वसुदेव:वसुना धनेन दीव्यतीति :"जो धन ,वैभव ,ऐश्वर्य से संपन्न है। 

he who enjoys or shines with wealth ";Krishna's father in Mathura and husband of Devaki .

कृष्ण का एक नाम वासुदेवा है (जो वासुदेव के पुत्र हैं ). 

(४)संकर्षणा :सर्वांश रूप में आकर्षक ,कुल एहम(Incarnation of total ego ) के अवतार रूप  पुरुष। कृष्ण की योगमाया का विस्तार मनुष्य  रूप में अवतरित कृष्ण के  बड़े भाई बलराम को ही सङ्कर्षण(शंकरासन ) कहा गया है। 

(५)अनंतशेष :दस हज़ार हुड्स (फन ,फणों वाला )दिव्यनाग जो कृष्ण के महाविष्णु रूप की क्षीरसागर में शैया बनता है जो कृष्ण का सेवक है भक्त है। कृष्ण के मनुष्य अवतार रूप में यही बलराम हैं। 

(६)अनहतनाद(अनाहत नाद ,अनहद नाद ) :सृष्टि में परिव्याप्त ध्वनि को अनाहतनाद कहा  गया है  क़हतें  हैं योगी (कृष्णभावनाभावित योगी )इसे सुन सकते हैं।

(७)नारायण :कृष्ण के चतुर्भुज रूप को नारायण कहा गया है। हम सभी प्राणियों का अंतिम लक्ष्य नर से नारायण बनना  ही बतलाया गया है।मनुष्य बंदर से आदमी नहीं बना है जैसा डार्विन मानते हैं ,डार्विन के शिष्य और अनुगामी मानते हैं।  नारायण ने मनुष्य को अपने रूप में ही बनाया है। नारायण से नर बना है। अर्थात  मनुष्य जिसके हृदय में नारायण का वास है।

The form of Vishnu that resides eternally in the divine realm called the Vaikunth.

यहां कर्ण समेत सभी पांडव आवाहित (दिव्य) ऊर्जा से ही पैदा हुए हैं। सूर्य से कृष्ण इंद्र से अर्जुन ,धर्मके देवता  से युधिष्ठिर महाराज। वायुदेवता से भीम जो हनुमान के भाई हैं। 

महाराज परीक्षित स्वयं श्री कृष्ण की योगमाया की सृष्टि हैं। उत्तरा  के गर्भ मेंअभिमन्यु पुत्र परीक्षित की  अश्वथ्थामा के ब्रह्माश्त्र ने  ह्त्या कर दी थी कृष्ण ने अपनी योगमाया से उन्हें दोबारा पैदा किया था। इसीलिए यह बालक परीक्षित कहलाया जिसने  कृष्ण का चतुर्भुज रूप माँ के गर्भ में ही देख लिया था। दो बार पैदा होने के कारण यह द्विज कहलाया। 

(८)नीलकंठ :शंकर (लार्ड शिव )का एक नाम नीलकंठ है। देवासुर संग्राम में आपने क्षीरसागरमंथन से निकला सारा विष पी लिया था।अमृत कलश दानव लेकर भाग रहे थे। पार्वती ने इनकी  जान  बचाने के लिए इनका गला कसके दबा दिया था ताकि विष कंठ के नीचे न जाए। विष के वहीँ रह जाने से इनका कंठ नीला हो गया था इसीलिए ये नीलकंठ कहलाये।

(9)Nar-Narayan :The twin decensons ,where Nar was a perfected soul and Narayan was the Supreme Lord .

(10 )ॐ (ओम ):यह ध्वनि (नाद ब्रह्म )भी सृष्टि में व्याप्त है जिसे योगी सुन सकते हैं ट्यूनिंग के द्वारा। 

औंकार :कृष्ण को ही कहा गया है। महावाक्य है ओम।परम- ध्वनि है यह जिसका उच्चारण उपनिषद के हरेक मन्त्र से पहले किया जाता है। प्रत्येक शुभ कार्य से पहले ओम कहा आजाता है अर्थात कृष्ण का स्मरण किया जाता है किसी भी कार्य को करने से पहले ओम कहकर।ऐसा करने से हम कृष्ण से कनेक्ट हो जाते हैं उसे दूरध्वनी द्वारा हेलो कह देते हैं।  

हरिओम शब्द में सगुण  और निर्गुण ब्रह्म दोनों आ जाते है हरी(हरि ) विष्णु को कहा जाता है।ओम कृष्ण को। ब्रह्मज्योति या ब्रह्म विष्णु के पैर के अंगूठे से निसृत प्रकाश (तेजस )को कहा जाता है इस तेजस (effulgence )को  ही ब्रह्मज्ञानी निर्गुण ब्रह्म कह देते हैं।   

(११)क्षर:भौतिक जगत की सभी चीज़ें क्षर हैं इनका क्षय (decay ,छीज़ना ) आप रोक नहीं सकते। 

(१२) अ -क्षर:जिसका क्षय नहीं हो सकता ,जैसे परमात्मा का वैकुण्ठ और  उस वैकुण्ठ लोक के दिव्य प्राणी। 

अक्षर- ब्रह्म शब्द भी वैदिक संस्कृति का अंग बना है। यानी शब्द ही ब्रह्म है। 

(१३) पुरुषोत्तम :क्षर एवं अक्षर दोनों से ही जो पर है। जो सर्व आत्माओं का भी आत्मा है। पुरुषों (सभी आत्माओं में )सर्वोत्तम  है.वही परमात्मा ,सुप्रीम डिवाइन पर्सनैलिटी है। इसीलिए मनुष्य रूप में अवतरित  राम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहा गया है। राम और कृष्ण की लीलाएं हमारे सुख के लिए हैं हमारे अंदर भक्ति भाव और आकर्षण पैदा करने के लिए। भगवान हमारे प्रति प्रेम और करुणा से आप्लावित होकर हमारे कल्याण के लिए ही अपने अनंत  गुणों का बखान करते हैं मोहग्रस्त अर्जुन को अपने दिव्य स्वरूप के विश्वरूप के दर्शन कराते हैं अर्जुन को दिव्य चक्षु मुहैया करवाकर। यह आत्मश्लाघा नहीं है।परमात्मा का हमारे प्रति नि:स्वार्थ पितृतुल्य  प्रेम है।

purushottam :"most exalted person ";name for shree Krishna .

(१४)पुरुषार्थ :आत्मा की तरक्की के लिए किया गया प्रयत्न। पुरुषार्थ का एक अर्थ जीवन का लक्ष्य भी है। धर्म ,अर्थ, काम ,मोक्ष जीवन के चार पुरुषार्थ बतलाये गए हैं। 

purusharth is goal of life .



Actions performed by exercising our free will ,once freedom of choice to improve upon our own situation .

(१४  )विभु :सर्वशक्तिमान ;

all powerful 

(15)Vibhooti :secondary incarnation indirectly empowered by the Supreme Lord ;opulence by which Krishna controls the material manifestation .

भगवान का एक नाम उसके गौण अवतार के रूप विभूति (संसार का समस्त ऐश्वर्य)भी है जो इस संसार चक्र को बनाये हुए है इसकी पालना करता  है। 

(१५ )Vibhooti :secondary incarnation indirectly empowered by the Supreme Lord ;opulence by which Krishna controls the material manifestation .

भगवान का एक नाम उसके गौण अवतार के रूप विभूति (संसार का समस्त ऐश्वर्य)भी है जो इस संसार चक्र को बनाये हुए है इसकी पालना करता  है। 

(१६ )प्रस्थान त्रयी :उपनिषद -गीता -ब्रह्मसूत्र को स्थान त्रयी कहा गया है। ये तीन रास्ते हैं उस एक अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति के उस एक परब्रह्म को जानने के। 

वेदों के ज्ञान भाग का निरूपण करने वाले ग्रन्थ उपनिषद हैं जिनमें सृष्टि के मूलतत्व 'ब्रह्म' पर विचार किया गया है। उपनिषदों का सार श्रीमदभगवद्गीता है। तथा इन सबका समन्वय ब्रह्मसूत्र में किया गया है जिसमें ५५५ सूत्र हैं।इसीलिए उपनिषद -गीता -ब्रह्मसूत्र को स्थान त्रयी कहा गया है।  

  
     

  
     

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