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बुधवार, 25 दिसंबर 2013

शासन का मशविरा ---- पथिक अनजाना






                                              शासन का  मशविरा ---   पथिक अनजाना
   जाने वक्त कैसा आगया या भूले से मैं यहाँ आ गया
   शासन मशविरा देता अब प्रकाशकों व उदघोषकों को
   स्थान नहीं दो न्यायपालिका व शासन विरूढ रोष को
   आखें खुली, कान खुले जुबान बन्द व लिखना मना हैं
   तमाशबीनों से भरी दुनिया में खुदा भी हुआ अनबना हैं
   चन्द  सिरमौर्य जय-योग्य , शेष सुलझे लोग रोग हैं
   संघर्षशील नई पौध की रचनायें होती गैरों के भोग हैं
   भावार्थ न समझे जनहित न समझें कहलाते योग्य हैं
   पथिक अनजाना
   http://pathic64.blogspot.com


          
    

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (26-12-13) को चर्चा - 1473 ( वाह रे हिन्दुस्तानियों ) में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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