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सोमवार, 30 दिसंबर 2013

समझदार कौन

आज के ज़माने को देख कर ऐसा लगता है जैसे दोड़ लगी पड़ी है एक दुसरे को पछाड़ कर आगे निकलने की। पूछने पर लोग कहते हैं यही तो समझदारी है लोग आगे हो जाने को समझदारी की पराकाष्ठा मानते हैं इसके लिए साम ,दाम ,दण्ड ,भेद की नीति को भी लगा देते हैं।मानो की आगे निकलना एक लड़ाई है।इस दोड़ में अव्वल आने के लिए अपना-पराया,मान-अपमान,उचित-अनुचित का भेद भी भुला देते हैं 
          आज की पीढ़ी बहुत समझदार हो गयी है।देखो क्या तरक्की की है।वाह मानना पड़ेगा हमारे पूर्वज आर्थिक स्थिति में हम से कही आगे थे इसे हमारे वेद पुराण बताते हैं।पुरातत्वविद भी इसकी पुष्टि करते हैं की ऐसी सोच,ऐसा व्यवहार उनमे दूर-दूर तक था ही नहीं।आज जहाँ भी  हमारी  नयी पीढ़ी को देख कर आश्चर्यचकित होंगे वे तो  शायद आज की पीढ़ी को पहचान ही न पाए।आखिर इतना बदलाव आ चुका है इस पीढ़ी में उनके मुकाबले।जिस बदलाव की उन्होंने कल्पना तक नहीं की थी।उसे जिंदगी में उतार कर सत्य साबित कर रही है आज की पीढ़ी।
         हम गर्व करते हैं की पूर्वज श्री रामचंद्र जी हैं।जो अपनी मर्यादा के लिए जाने जाते हैं।दुष्यन्त पुत्र भरत हैं जो अपनी वीरता के कारण चक्रवर्ती राजा बने तथा आर्यावत का दूसरा नाम भारत उन्ही के नाम पर पड़ा।ब्रहम ऋषि विश्वामित्र जैसे वैरागी,तपस्वी,योध्दा की हम संतान हैं।देशभक्ति में अपना स्थान भगतसिंह,सुभाषचंद्र बोस,चंद्रशेखर आजाद ने बनाया है जो हमारे ही पूर्वज हैं।किन्तु उन क्षेत्रो में पिछड़ गये जिनमे आज की पीढ़ी अव्वल दिखाई दे रही है।जैसे हमे उन पर गर्व होता है वेसे ही उनको हमपर आश्चर्य तो अवश्य ही होता होगा।वे भी आश्चर्य में भरकर अवश्य ही कहते होंगे,"क्या ये हमारी ही संतान हैं।"उन्होंने हमसे यह उम्मीद तो अवश्य ही लगायी होगी की हम कुछ नया ही करके दिखाएंगे तो हम अपने  उनकी उम्मीदों पर खरा उतारने तो हम भी अपने आपको उनकी उम्मीदों पर खरा उतारने की कोशिश में जुटे हैं
        वे हमारी तरह प्रखर बुध्दि के नहीं थे।वे इतने नादान भोले तथा दयावान थे कि अपने पराये में अन्तर तक नहीं जान पाते।इसलिए कार्य तो एक करते थे पर लाभ सब उठाते थे पर हम तो चालाक हैं उदहारण के लिए नेताओ  को ही ले लो।देश के खजाने का अपनी स्वार्थ सिध्दि के लिए सही उपयोग कर रही हैइससे देश की धन संपदा का सही उपयोग हो रहा है।क्योकि वो ही तो देशवासी हैं देश की संपदा के सच्चे उतराधिकारी हैं देश की जनता को इस संपदा का कोई भाग नहीं मिलना चाहिए क्योकि यह तो देश की जनता का निर्णय है कि वे ही इसके उतराधिकारी बने अब जनता का निर्णय तो सर आखों पर रखना पड़ेगा।जनता को चिंतामुक्त रखने के लिए कहाँ,किस प्रकार उन्होंने देश संपदा अपने निजी स्वार्थ के लिए उपयोग की।इसका भी हिसाब किताब नहीं बताते।देश व देश की जनता के लिए सोचने वाला वाला बेवकूफ है इसी बेवकूफी तो हमारी हमारे पूर्वजो ने ने खूब की पर हम तो समझदार हैं। हम थोड़े ही बेवकूफी दिखाएँगे हम तो अपने  बारे सोचेंगे।हम तरक्की करेंगे तो देश तरक्की करेगा।हम नाम कमाएँगे तो देश नाम कमाएगा वेसे आज भी देश में बेवकुफो की कमी नहीं है अन्ना हजारे तो आज भी देश के नाम पर भूखा मरने को तेयार है इतना करता तो कोई बात नहीं थी पर वो तो और लोगो को भी देश्देश के प्रति सोचने को विवश करता है इससे पता चलता है की बेवकुफो की कमी नहीं है सोचने की बेवकूफी तो हर कोई कर लेता है पर के नाम पर कोई बेवकूफी नहीं करता।करने वालो को तो गाली तक देने की हिम्मत कर लेते हैं।एक जमाना था जब भारतीय लोग अपनी जिंदगी कष्टों में बीता लेते थे किन्तु अपनी शर्तो पर जीते थे जिद्दी थे कि यदि किसी का कार्य झूठ से,पीछे क रास्ते को अपनाकर होने वाला लगता था उसे होने ही नहीं देते थे बड़े बोल बोलते थे कुछ नहीं था पर कहते थे चरित्र रूपी धन है भारत ने आदर्शवादी,चरित्रवान, कर्मठ,दयावान,वीर, भद्र,महापुरुषों को जन्म दिया है  आज विश्व ये जानकार आश्चर्य में डूब जाता है वह भारत में जन्म लेने के लिए प्रार्थना करता है किन्तु भारतीय वर्तमान युवा पीढ़ी तो समझदार है। जीवन तो एक ही बार मिलता है इसको जी भरकर जियेगी।चाहे दुसरे की जिंदगी जीने लायक ही न रह जाये अपने चारो ओर जंगलराज ही बन जाये कोई चिंता की बात नहीं।आखिर गुरु की आज्ञाकारी शिष्य बनने की आदत हमारी नस नस में व्याप्त है।माता-पिता की आज्ञाकारी संतान बनने की परम्परा हममे आज भी झलकती है उस समय गुरु वे बनते जो चरित्र निर्माण को अपना ध्येय बनाते थे।रामराज्य लेन की कोशिश करते थे और यही करने अपना जीवन समर्पित कर देते थे किन्तु आजकल के माता -पिता गृहस्थ जीवन को चलाने में इस प्रकार व्यस्त हैं की बच्चो के लिए समय ही नहीं है उनकी अनुपस्थिति में दूरदर्शन ही उनका मार्गदर्शन करते हैं बच्चे उनसे मन:स्थिति के अनुरूप शिक्षा ग्रहण करते हैं उनको यह गुरु अत्यधिक पसंद है क्योकि ये अपनी पसंद से नहीं बच्चो की पसंद से शिक्षा ग्रहण करते हैं ये बच्चे आखिर आज के ज़माने के बच्चे गुरु से उपयोगी ज्ञान प्राप्त करते हैं।यदि उपयोगी ज्ञान प्राप्त न हो तो गुरु की तरफ ध्यान देना बंद कर देते हैं।अन्य साधनों से शिक्षा ग्रहण करते हैं क्योकि इसमें पारंगत होना अत्यंत आवश्यक है आखिर देश का भविष्य कर्णधार है बच्चे के लक्षणों को देखकर माता -पिता लड़ प्यार में उन्हें उन्हें नहीं रोकते क्योकि बच्चे ही समझदार होते हैं उन्हें दुनियादारी का अनुभव अत्यधिक होता है उनके पास जन्मसिद्ध अधिकार होता है कि वो ही माता -पिता को फटकार के उन्हें सही राह पे ले और बच्चे अपनी जिम्मेदारी को पूर्णत निभाते भी हैं युवा होने पर पाई शिक्षा को जीवन में चरितार्थ करके दिखाते हैं।व्यवसाय कोई भी अपनाये पर चरित्र वही दिखाते है जिसमे वे दीक्षित होते हैं।यही करने के लिए शिक्षा ली थी।

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (31-12-13) को "वर्ष 2013 की अन्तिम चर्चा" (चर्चा मंच : अंक 1478) पर भी होगी!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    2013 को विदायी और 2014 की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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