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रविवार, 29 दिसंबर 2013

काँपते लबों से विदाई --पथिक अनजाना





                                        काँपते लबों से विदाई   --435
चाहते हैँ सनम जब हम जहान से जुदा होंगें
जोड कर हाथ करें हम खुदा से इक दरखास
होगें हाथ तुम्हारे वक्ते मौत हाथ हमारों में
काँपते लबों से विदाई हो लेकर मिलन की आस
बंधनों,गैरख्यालों ने कियाआशाऔं का सत्यानाश
मुस्कायें उनके चेहरे कहलाये हैं हम शाबाश
खरीदे गम व आहें होते फिर क्यों हम निराश
पथिक अनजाना
http://pathic64.blogspot.com

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर अर्थ गर्भित रचना।

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (30-12-13) को "यूँ लगे मुस्कराये जमाना हुआ" (चर्चा मंच : अंक-1477) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    जवाब देंहटाएं