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मंगलवार, 19 अगस्त 2014

कुछ मुक्तक

दर्द के गीत गाता  रहा
मन ही मन मुस्कराता रहा
आँसुओं ने बयां कर दिया
वरना मैं तो छुपाता रहा

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दिल खिलौना समझ ,तोड़ कर
चल दिए तुम मुझे  छोड़ कर
मैं खड़ा हूँ  वहीं   आज तक
ज़िन्दगी के उसी  मोड़  पर

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हाल पूछो न मेरी हस्ती का
सर पे इलजाम बुत परस्ती का
उसको ढूँढा ,नहीं मिला मुझको
क्या गिला करते अपनी पस्ती का

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लोग बैसाखियों के सहारे चले
जो चले भी किनारे किनारे चले
सरपरस्ती न हासिल हुई थी जिसे
वो समन्दर में कश्ती उतारे चले

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चन्द लम्हे भी क्या हसीं  होते
आप दिल के मिरे मकीं  होते
ज़िन्दगी और भी सँवर जाती
आप मेरे जो  हमनशीं होते

-आनन्द.पाठक
09413395592

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