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सोमवार, 11 अगस्त 2014

प्रिय मित्रों एक गीत सादर निवेदित -

सपने  में बारात सजी थी 
दुल्हन जैसी रात सजी थी । 
पलकों में सतरंगी सपने ले 
घूँघट का पट मुख पर दे 
उर अन्तर में आस लगाये 
प्रेम दीप भी साथ जलाये । 
मनमोहक स्वरूप ले करके 
अजब छवि जो पास खड़ी थी 
सपने  में बारात सजी थी 
दुल्हन जैसी रात सजी थी ।
आकिंचन-सी देख रही थी 
नयनों से निज पेख रही थी 
सौन्दर्य शिरोमणि वह भामा 
वय में दिखती थी वह श्यामा । 
तन-मन में आकर्षण लेकर 
गजब रूप की राशि खड़ी थी 
सपने  में बारात सजी थी 
दुल्हन जैसी रात सजी थी ।
मधुर मिलन का क्षण था वह 
निहार रही थी जिसको वह 
इतने में आवाज आ गयी 
उठ जाओ अब सुबह हो गयी । 
अधूरे सपने के कारण ही 
मिलन नहीं वह कर पायी थी 
सपने  में बारात सजी थी 
दुल्हन जैसी रात सजी थी ।
http://shakuntlamahakavya.blogspot.com/2014/07/blog-post_27.html


2 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद उम्दा रचना और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेहद उम्दा रचना और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ

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