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सोमवार, 16 जून 2014

एक लघु व्यंग्य व्यथा : हुनर सीख लो ! हुनर !!


मेम साहब-आज मैं काम पर आने को नहीं ।एक महीने के लिए गाँव जा रही हूं। मेरा हिसाब कर के चेक घर पे
कूरियर से  भिजवा देना-’- बाई ने अक्टिवा स्कूटर पर बैठे बैठे ही मोबाईल से फोन किया

 मेम साहब के पैरों तले ज़मीन खिसक गई -अरे सुन तो ! तू  है किधर अभी?’

’मेम साहब ! मैं आप के फ्लैट के नीचे से बोल रही हूँ

जब तक श्रीमती जी दौड़ कर बालकनी में नीचे देखने आती कि बाई ने अपना स्कूटर स्टार्ट किया और हवा हो गई
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’बाई चली गई-लो पकड़ो झाड़ू-पोंछा "- श्रीमती जी नीला पीला होते हुए पोंछे की बाल्टी थमा दिया
मैं बाल्टी पकड़े सोचता रहा कि एक चाय वाला कैसे प्रधानमन्त्री बनता है और एक IIT-रूड़की का 
पास आऊट ,इंजीनियर भारत सरकार के प्रथम श्रेणी का राजपत्रित अधिकारी चीफ़ इन्जीनियर कैसे पोंछा लगाता होगा स्मृति इरानी जी को स्मरण किया ...अपनी डीग्रियाँ अपना सर्टिफ़िकेट याद कर रहा था कि अचानक श्रीमती जी चीखी

’अरे अभी तक यहीं खड़े हो ? शुरू नहीं किया ?सुना नहीं प्रधानमन्त्री ने क्या कहा  । डीग्री  सर्टिफ़िकेट काम नहीं आयेगी -हुनर ही काम आयेगा ,हुनर !

झाड़ू-पोंचा का हुनर सीख लो ..रिटायर्मेन्ट के बाद काम आयेगा...व्यंग्य लेखन से कुछ ज़्यादा  ही कमा लोगे....

’मम्मी । पापा के आफ़िस का ड्राईवर आ गया’- छोटे बेटे ने खबर दी

’जा ,बोल दे .wait करे साब पोछा लगाने के बाद आफ़िस जायेगा

’अरे भाग्यवान ! ऐसा मत कहना ,वरना कल वो अपनी गाड़ी का चाबी भी थमा देगा -ड्राईवरी भी सीख लो साहब -हुनर है बाद में काम आयेगा

-काश मैं भी उस कामवाली बाई के साथ ही भाग गया होता

-आनन्द.पाठक-
09413395592

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (17-06-2014) को "अपनी मंजिल और आपकी तलाश" (चर्चा मंच-1646) पर भी होगी!
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. भाई बाहर नहीं तो घर में ही मार्किट वैल्यू बनाये रखिये...ये अंदर की बात है...

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