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शुक्रवार, 6 जून 2014

कैसे मुस्काऊँ सज़ना के भर आएं अँखियाँ


नाम तेरा लव पे है साजन
उसपे ये तन्हाई का आलम 
कैसे मुस्काऊँ सज़ना 
जब भर-भर आयें अँखियाँ  
लागे  न जिया मोरा 
ओ मोरे बलमा
जाने ना तूं मेरा 
दर्द सजनवा 
लौट के आजा 
ओ मोरे राजा
भर ले बाँहों में मुझे 
ओ दिलज़ानियां
दिल में समाया जब से 
चैन ना आया मुझे 
पल पल जुदाई का डर
हर पल खाया मुझे 
कर दिया सच तूने 
सपना ये कैसा 
कैसे मुस्काऊँ साज़न 
उज़ड़ा ये दिल का आँगन
रोये ये नैना निशदिन 
तड़पे दिल प्रीतम तुम बिन 
याद ना तुमको आई 
कैसी  ये प्रीत निभाई 
भूल जाऊं मैं भी तुझे 
करूँ क्या जतनवा
करूँ क्या जतनवा
बुझे ना जानम तुम बिन 
दिल का अगनवा 
कैसे मुस्काऊँ तुम बिन 
करूँ क्या जतनवा 
करूँ क्या जतनवा 
निभा चौधरी

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (07-06-2014) को ""लेखक बेचारा क्या करे?" (चर्चा मंच-1636) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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