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बुधवार, 2 जुलाई 2014

"भीना सा मौसम" (श्वेता)

एक भीना-भीना सा मौसम
यादों की मुंडेर पर आ बैठा है
एक पल ख़ामोशी के आँचल में
दूजे पल बादलों के संग उड़ पड़ता है
यादों की फुहारों में जीवन बगिया
ख़िल कर ताज़गी से भर उठती है
एक कुमभलाता सा कवल अपने ही
तालाब के पानी में मुस्कुरा उठता है
ये यादें भी निर्जीव को सजीव कर जाती हैं
कभी नवप्राण नवचेतना से 
काया को नव उल्लास दे जाती हैं !!!!!!
$hweta

6 टिप्‍पणियां:

  1. आप की ये खूबसूरत रचना...
    दिनांक 03/07/2014 की नयी पुरानी हलचल पर लिंक की गयी है...
    आप भी इस हलचल में अवश्य आना...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर...

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  2. मुबारक मुबारक मुबारक अभिनन्दन आपके द्वारा अन्यों का भी आपका बड़ा सुख है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं