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गुरुवार, 24 जुलाई 2014

"कैसी सजी आ रही"

मित्रों आज एक नवगीत 
कैसी    सजी     आ     रही 
बालीबुड से चली  आ  रही।  
अनुपम    सुगन्ध    लिए 
वर   आभूषण   से   सजी
दिव्य    सुन्दरता   लेकर 
वह    चली      आ     रही
कैसी    सजी     आ     रही 
बालीबुड से चली  आ  रही।
अनेक     पुष्पों   से   सजी   
मन्द  -  मन्द    मुस्काती 
जैसे   कुछ     गुनगुनाती
तनिक   आवाज  न  रही  
कैसी    सजी     आ     रही 
बालीबुड से चली  आ  रही।
मैं अपलक उसे  देख  रहा 
उसके  तन  व  चाल   को
मगर    वह   कैसी     थी 
मेरी  तरफ  देख  न  रही
कैसी    सजी     आ     रही 
बालीबुड से चली  आ  रही।
वह    कोई    और     नहीं
एक    कार     थी    सजी  
सुन्दर   वर   को   लेकर
मेरी तरफ चली आ रही 
कैसी    सजी     आ     रही 
बालीबुड से चली  आ  रही।   
http://shakuntlamahakavya.blogspot.com/2014/07/blog-post_24.html


3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (26-07-2014) को ""क़ायम दुआ-सलाम रहे.." (चर्चा मंच-1686) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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