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सोमवार, 10 अगस्त 2015

• कवि का दीपक / हरिवंशराय बच्चन

आज देश के ऊपर कैसी
काली रातें आई हैं!
मातम की घनघोर घटाएँ
कैसी जमकर छाई हैं!
लेकिन दृढ़ विश्वास मुझे है
वह भी रातें आएँगी,
जब यह भारतभूमि हमारी
दीपावली मनाएगी!
शत-शत दीप इकट्ठे होंगे
अपनी-अपनी चमक लिए,
अपने-अपने त्याग, तपस्या,
श्रम, संयम की दमक लिए।
अपनी ज्वाला प्रभा परीक्षित
सब दीपक दिखलाएँगे,
सब अपनी प्रतिभा पर पुलकित
लौ को उच्च उठाएँगे।
तब, सब मेरे आस-पास की
दुनिया के सो जाने पर,
भय, आशा, अभिलाषा रंजित
स्वप्नों में खो जाने पर,
जो मेरे पढ़ने-लिखने के
कमरे में जलता दीपक,
उसको होना नहीं पड़ेगा
लज्जित, लांच्छित, नतमस्तक।
क्योंकि इसीके उजियाले में
बैठ लिखे हैं मैंने गान,
जिनको सुख-दुख में गाएगी
भारत की भावी संतान!
आखिर 15 अगस्त 1947 को हरिवंशराय बच्चन जी   का ये सपना पूरा हो गया...
वे देश के सैनिकों से कहते हैं...
कटी न थी गुलाम लौह श्रृंखला,
स्वतंत्र हो कदम न चार था चला,
कि एक आ खड़ी हुई नई बला,
परंतु वीर हार मानते कभी?
निहत्थ एक जंग तुम अभी लड़े,
कृपाण अब निकाल कर हुए खड़े,
फ़तह तिरंग आज क्यों न फिर गड़े,
जगत प्रसिद्ध, शूर सिद्ध तुम सभी।
जवान हिंद के अडिग रहो डटे,
न जब तलक निशान शत्रु का हटे,
हज़ार शीश एक ठौर पर कटे,
ज़मीन रक्त-रुंड-मुंड से पटे,
तजो न सूचिकाग्र भूमि-भाग भी।

देश के युवकों से / हरिवंशराय बच्चन
कठोर सत्य हैं, नहीं कहानियां,
जिन्हें सुना गई कई शताब्दियां,
करो अतीत की पुनः न गलतियां,
न कान बीच उँगलियाँ दिये रहो।
अनेक शत्रु देश पार हैं खड़े,
अनेक शत्रु देश मध्य हैं पड़े,
कुशल कभी नहीं बिना हुए कड़े,
सजग कृपाण हाथ में लिए रहो।
स्वतंत्रता लता अभी मृदुल नवल,
समूल पशु इसे कहीं न लें निगल,
कि हो हज़ार वर्ष की रगड़ विफल,
युवक सचेत चौकसी किए रहो।
देश के लेखकों से / हरिवंशराय बच्चन
बहुत प्रसिद्ध खेल हैं कृपाण के,
कहां समान वह कलम-कमान के,
अचूक हैं निशान शब्द-बाण के,
कलम लिए हुए कभी न तुम डरो।

समस्त देश की बसेक टेक हो,
समस्त छिन्न-भिन्न जाति एक हो,
विमूढ़ता जहां वहाँ विवेक हो,
यही प्रभाव शब्द-शब्द में भरो।

न आज स्वप्न-कल्पना-सुरा छको,
न आज बात आसमान की बको,
स्वदेश पर मुसीबतें, सुलेखकों,
उसे प्रदान आज लेखनी करो।

देश के कवियों से / हरिवंशराय बच्चन

सुवर्ण मृत्तिका हुई कलम छुई,
अमृत हर एक बिंदु लेखनी चुई,
कलम जहाँ गई वहाँ विजय हुई,
विफल रही नहीं कभी न भारती।

कलम लिए चले कि तुम कला चली,
कि कल्पना रहस्य-अंचला चली,
कि व्योम-स्वर्ग-स्वप्न-श्रृंखला चली,
तुम्हें स्वदेश-पुतलियां निहारतीं।

करो विचित्र इंद्रधनु-विभा परे,
तजो सुरम्य हस्ति-दंत-घरहरे,
न अब नखत निहारकर निहाल हो,
न आसमान देखते रहो खड़े,
तुम्हें ज़मीन देश की पुकारती।

देश के नेताओं से / हरिवंशराय बच्चन

विनम्र हो ब्रिटेन-गर्व जो हरे,
विरक्त हो विमुक्त देश जो करे,
समाज किसलिए न देख हो दुखी,
कि उस महान को खरीद बंक ले।

स्वदेश बाग-डोर हाथ में लिए,
विशाल जन-समूह साथ में लिए,
कभी नहीं उचित कि हो अधोमुखी
प्रवेश तुम करो प्रमाद--पंक में।

करो न व्यर्थ दाप, होशियार हो,
फला कभी न पाप, होशियार हो,
प्रसिद्ध है प्रकोप जन-जनार्दनी,
मिले तुम्हें न शाप होशियार हो,
तुम्हें कहीं न राजमद कलंक दे।


देश के नाविकों से / हरिवंशराय बच्चन

कुछ शक्ल तुम्हारी घबराई-घबराई-सी
दिग्भ्रम की आँखों के अन्दर परछाईं सी,
तुम चले कहाँ को और कहाँ पर पहुँच गए।
लेकिन, नाविक, होता ही है तूफान प्रबल।
यह नहीं किनारा है जो लक्ष्य तुम्हारा था,
जिस पर तुमने अपना श्रम यौवन वारा था;
यह भूमि नई, आकाश नया, नक्षत्र नए।
हो सका तुम्हारा स्वप्न पुराना नहीं सफल।
अब काम नहीं दे सकते हैं पिछले नक्शे,
जिनको फिर-फिर तुम ताक रहे हो भ्रान्ति ग्रसे,
तुम उन्हें फाड़ दो, और करो तैयार नये।
वह आज नहीं संभव है, जो था संभव कल।















रुको प्रणाम इस ज़मीन को करो,
रुको सलाम इस ज़मीन को करो,
समस्त धर्म-तीर्थ इस ज़मीन पर
गिरा यहां लहू किसी शहीद का।
आज देश के ऊपर कैसी
काली रातें आई हैं!
मातम की घनघोर घटाएँ
कैसी जमकर छाई हैं!
लेकिन दृढ़ विश्वास मुझे है
वह भी रातें आएँगी,
जब यह भारतभूमि हमारी
दीपावली मनाएगी!
शत-शत दीप इकट्ठे होंगे
अपनी-अपनी चमक लिए,
अपने-अपने त्याग, तपस्या,
श्रम, संयम की दमक लिए।
अपनी ज्वाला प्रभा परीक्षित
सब दीपक दिखलाएँगे,
सब अपनी प्रतिभा पर पुलकित
लौ को उच्च उठाएँगे।
तब, सब मेरे आस-पास की
दुनिया के सो जाने पर,
भय, आशा, अभिलाषा रंजित
स्वप्नों में खो जाने पर,
जो मेरे पढ़ने-लिखने के
कमरे में जलता दीपक,
उसको होना नहीं पड़ेगा
लज्जित, लांच्छित, नतमस्तक।
क्योंकि इसीके उजियाले में
बैठ लिखे हैं मैंने गान,
जिनको सुख-दुख में गाएगी
भारत की भावी संतान!
आखिर 15 अगस्त 1947 को हरिवंशराय बच्चन जी   का ये सपना पूरा हो गया...
वे देश के सैनिकों से कहते हैं...
कटी न थी गुलाम लौह श्रृंखला,
स्वतंत्र हो कदम न चार था चला,
कि एक आ खड़ी हुई नई बला,
परंतु वीर हार मानते कभी?
निहत्थ एक जंग तुम अभी लड़े,
कृपाण अब निकाल कर हुए खड़े,
फ़तह तिरंग आज क्यों न फिर गड़े,
जगत प्रसिद्ध, शूर सिद्ध तुम सभी।
जवान हिंद के अडिग रहो डटे,
न जब तलक निशान शत्रु का हटे,
हज़ार शीश एक ठौर पर कटे,
ज़मीन रक्त-रुंड-मुंड से पटे,
तजो न सूचिकाग्र भूमि-भाग भी।

देश के युवकों से / हरिवंशराय बच्चन
कठोर सत्य हैं, नहीं कहानियां,
जिन्हें सुना गई कई शताब्दियां,
करो अतीत की पुनः न गलतियां,
न कान बीच उँगलियाँ दिये रहो।
अनेक शत्रु देश पार हैं खड़े,
अनेक शत्रु देश मध्य हैं पड़े,
कुशल कभी नहीं बिना हुए कड़े,
सजग कृपाण हाथ में लिए रहो।
स्वतंत्रता लता अभी मृदुल नवल,
समूल पशु इसे कहीं न लें निगल,
कि हो हज़ार वर्ष की रगड़ विफल,
युवक सचेत चौकसी किए रहो।
देश के लेखकों से / हरिवंशराय बच्चन
बहुत प्रसिद्ध खेल हैं कृपाण के,
कहां समान वह कलम-कमान के,
अचूक हैं निशान शब्द-बाण के,
कलम लिए हुए कभी न तुम डरो।

समस्त देश की बसेक टेक हो,
समस्त छिन्न-भिन्न जाति एक हो,
विमूढ़ता जहां वहाँ विवेक हो,
यही प्रभाव शब्द-शब्द में भरो।

न आज स्वप्न-कल्पना-सुरा छको,
न आज बात आसमान की बको,
स्वदेश पर मुसीबतें, सुलेखकों,
उसे प्रदान आज लेखनी करो।

देश के कवियों से / हरिवंशराय बच्चन

सुवर्ण मृत्तिका हुई कलम छुई,
अमृत हर एक बिंदु लेखनी चुई,
कलम जहाँ गई वहाँ विजय हुई,
विफल रही नहीं कभी न भारती।

कलम लिए चले कि तुम कला चली,
कि कल्पना रहस्य-अंचला चली,
कि व्योम-स्वर्ग-स्वप्न-श्रृंखला चली,
तुम्हें स्वदेश-पुतलियां निहारतीं।

करो विचित्र इंद्रधनु-विभा परे,
तजो सुरम्य हस्ति-दंत-घरहरे,
न अब नखत निहारकर निहाल हो,
न आसमान देखते रहो खड़े,
तुम्हें ज़मीन देश की पुकारती।

देश के नेताओं से / हरिवंशराय बच्चन

विनम्र हो ब्रिटेन-गर्व जो हरे,
विरक्त हो विमुक्त देश जो करे,
समाज किसलिए न देख हो दुखी,
कि उस महान को खरीद बंक ले।

स्वदेश बाग-डोर हाथ में लिए,
विशाल जन-समूह साथ में लिए,
कभी नहीं उचित कि हो अधोमुखी
प्रवेश तुम करो प्रमाद--पंक में।

करो न व्यर्थ दाप, होशियार हो,
फला कभी न पाप, होशियार हो,
प्रसिद्ध है प्रकोप जन-जनार्दनी,
मिले तुम्हें न शाप होशियार हो,
तुम्हें कहीं न राजमद कलंक दे।


देश के नाविकों से / हरिवंशराय बच्चन

कुछ शक्ल तुम्हारी घबराई-घबराई-सी
दिग्भ्रम की आँखों के अन्दर परछाईं सी,
तुम चले कहाँ को और कहाँ पर पहुँच गए।
लेकिन, नाविक, होता ही है तूफान प्रबल।
यह नहीं किनारा है जो लक्ष्य तुम्हारा था,
जिस पर तुमने अपना श्रम यौवन वारा था;
यह भूमि नई, आकाश नया, नक्षत्र नए।
हो सका तुम्हारा स्वप्न पुराना नहीं सफल।
अब काम नहीं दे सकते हैं पिछले नक्शे,
जिनको फिर-फिर तुम ताक रहे हो भ्रान्ति ग्रसे,
तुम उन्हें फाड़ दो, और करो तैयार नये।
वह आज नहीं संभव है, जो था संभव कल।















रुको प्रणाम इस ज़मीन को करो,
रुको सलाम इस ज़मीन को करो,
समस्त धर्म-तीर्थ इस ज़मीन पर
गिरा यहां लहू किसी शहीद का।


आज देश के ऊपर कैसी
काली रातें आई हैं!
मातम की घनघोर घटाएँ
कैसी जमकर छाई हैं!
लेकिन दृढ़ विश्वास मुझे है
वह भी रातें आएँगी,
जब यह भारतभूमि हमारी
दीपावली मनाएगी!
शत-शत दीप इकट्ठे होंगे
अपनी-अपनी चमक लिए,
अपने-अपने त्याग, तपस्या,
श्रम, संयम की दमक लिए।
अपनी ज्वाला प्रभा परीक्षित
सब दीपक दिखलाएँगे,
सब अपनी प्रतिभा पर पुलकित
लौ को उच्च उठाएँगे।
तब, सब मेरे आस-पास की
दुनिया के सो जाने पर,
भय, आशा, अभिलाषा रंजित
स्वप्नों में खो जाने पर,
जो मेरे पढ़ने-लिखने के
कमरे में जलता दीपक,
उसको होना नहीं पड़ेगा
लज्जित, लांच्छित, नतमस्तक।
क्योंकि इसीके उजियाले में
बैठ लिखे हैं मैंने गान,
जिनको सुख-दुख में गाएगी
भारत की भावी संतान!
आखिर 15 अगस्त 1947 को हरिवंशराय बच्चन जी   का ये सपना पूरा हो गया...
वे देश के सैनिकों से कहते हैं...
कटी न थी गुलाम लौह श्रृंखला,
स्वतंत्र हो कदम न चार था चला,
कि एक आ खड़ी हुई नई बला,
परंतु वीर हार मानते कभी?
निहत्थ एक जंग तुम अभी लड़े,
कृपाण अब निकाल कर हुए खड़े,
फ़तह तिरंग आज क्यों न फिर गड़े,
जगत प्रसिद्ध, शूर सिद्ध तुम सभी।
जवान हिंद के अडिग रहो डटे,
न जब तलक निशान शत्रु का हटे,
हज़ार शीश एक ठौर पर कटे,
ज़मीन रक्त-रुंड-मुंड से पटे,
तजो न सूचिकाग्र भूमि-भाग भी।

देश के युवकों से / हरिवंशराय बच्चन
कठोर सत्य हैं, नहीं कहानियां,
जिन्हें सुना गई कई शताब्दियां,
करो अतीत की पुनः न गलतियां,
न कान बीच उँगलियाँ दिये रहो।
अनेक शत्रु देश पार हैं खड़े,
अनेक शत्रु देश मध्य हैं पड़े,
कुशल कभी नहीं बिना हुए कड़े,
सजग कृपाण हाथ में लिए रहो।
स्वतंत्रता लता अभी मृदुल नवल,
समूल पशु इसे कहीं न लें निगल,
कि हो हज़ार वर्ष की रगड़ विफल,
युवक सचेत चौकसी किए रहो।
देश के लेखकों से / हरिवंशराय बच्चन
बहुत प्रसिद्ध खेल हैं कृपाण के,
कहां समान वह कलम-कमान के,
अचूक हैं निशान शब्द-बाण के,
कलम लिए हुए कभी न तुम डरो।

समस्त देश की बसेक टेक हो,
समस्त छिन्न-भिन्न जाति एक हो,
विमूढ़ता जहां वहाँ विवेक हो,
यही प्रभाव शब्द-शब्द में भरो।

न आज स्वप्न-कल्पना-सुरा छको,
न आज बात आसमान की बको,
स्वदेश पर मुसीबतें, सुलेखकों,
उसे प्रदान आज लेखनी करो।

देश के कवियों से / हरिवंशराय बच्चन

सुवर्ण मृत्तिका हुई कलम छुई,
अमृत हर एक बिंदु लेखनी चुई,
कलम जहाँ गई वहाँ विजय हुई,
विफल रही नहीं कभी न भारती।

कलम लिए चले कि तुम कला चली,
कि कल्पना रहस्य-अंचला चली,
कि व्योम-स्वर्ग-स्वप्न-श्रृंखला चली,
तुम्हें स्वदेश-पुतलियां निहारतीं।

करो विचित्र इंद्रधनु-विभा परे,
तजो सुरम्य हस्ति-दंत-घरहरे,
न अब नखत निहारकर निहाल हो,
न आसमान देखते रहो खड़े,
तुम्हें ज़मीन देश की पुकारती।

देश के नेताओं से / हरिवंशराय बच्चन

विनम्र हो ब्रिटेन-गर्व जो हरे,
विरक्त हो विमुक्त देश जो करे,
समाज किसलिए न देख हो दुखी,
कि उस महान को खरीद बंक ले।

स्वदेश बाग-डोर हाथ में लिए,
विशाल जन-समूह साथ में लिए,
कभी नहीं उचित कि हो अधोमुखी
प्रवेश तुम करो प्रमाद--पंक में।

करो न व्यर्थ दाप, होशियार हो,
फला कभी न पाप, होशियार हो,
प्रसिद्ध है प्रकोप जन-जनार्दनी,
मिले तुम्हें न शाप होशियार हो,
तुम्हें कहीं न राजमद कलंक दे।


देश के नाविकों से / हरिवंशराय बच्चन

कुछ शक्ल तुम्हारी घबराई-घबराई-सी
दिग्भ्रम की आँखों के अन्दर परछाईं सी,
तुम चले कहाँ को और कहाँ पर पहुँच गए।
लेकिन, नाविक, होता ही है तूफान प्रबल।
यह नहीं किनारा है जो लक्ष्य तुम्हारा था,
जिस पर तुमने अपना श्रम यौवन वारा था;
यह भूमि नई, आकाश नया, नक्षत्र नए।
हो सका तुम्हारा स्वप्न पुराना नहीं सफल।
अब काम नहीं दे सकते हैं पिछले नक्शे,
जिनको फिर-फिर तुम ताक रहे हो भ्रान्ति ग्रसे,
तुम उन्हें फाड़ दो, और करो तैयार नये।
वह आज नहीं संभव है, जो था संभव कल।















रुको प्रणाम इस ज़मीन को करो,
रुको सलाम इस ज़मीन को करो,
समस्त धर्म-तीर्थ इस ज़मीन पर
गिरा यहां लहू किसी शहीद का।

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