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सोमवार, 25 नवंबर 2013

स्त्रियों को उनकी मौलिक स्थिति का बोध कराएं



बीसवीं सदी महिलाओं की है, ऐसा गांधी जी ने कहा था। उन्होंने आह्वान किया था कि महिलाओं को उस अंधेरे से निकालो जहां वे वर्षों से पड़ी हैं। जब स्त्री शिक्षा आंदोलन शुरू हुआ तो उसमें महिलाओं की कम भागीदारी देखकर गांधी जी ने कहा कि औरतों को सिखाया जाता है कि वे अपने को पुरुषों की दासी मानें, इसलिए स्त्रियों के लिए स्कूल, कालेज और तमाम मंच खुले तो उन्हें समझ में नहीं आया कि वे क्या करें। ठीक उस गुलाम की तरह जब उसे आजाद किया जाता है तो उसे लगता है कि मानो उसके सिर से साया ही उठ गया है। अपने अखबार नवजीवन में लिखते हुए गांधी जी ने कहा कि कांग्रेस वालों का फर्ज है कि वे स्त्रियों को उनकी मौलिक स्थिति का पूरा बोध कराएं और उन्हें इस तरह की तालीम दें जिससे वे भविष्य में पुरुषों के साथ बराबरी के दरजे से हाथ बंटाने लायक बनें। 1941 में लिखे गांधी जी के ये वाक्य आज भी उतने ही समझे जाने लायक हैं जितने कि वे आज से 72 साल पहले थे। हकीकत यह है कि समाज में आज भी स्त्रियोंं की स्थिति बदतर ही है। उसे आधुनिका बनाने की कोशिशें हो रही हैं और बाजार में उसे गुडिय़ा बनाकर पेश किया जा रहा है पर जब तक पुरुषों की सोच नहीं बदलेगी, तब तक वे गुडिय़ा ही बनी रहेंगी। उन्हें अपने सम्मान की रक्षा के लिए पुरुषों का सहारा लेना पड़ेगा और पुरुष इस सहारे की कीमत भी वसूलता है। पिछले दिनों देश में जो घटनाएं घटीं, ये ऐसी ही पुरुष मानसिकता की तरफ इशारा करती हैं। दिलचस्प बात यह है कि ऐसा कोई सामान्य और कम पढ़े- लिखे पुरुष नहीं करते बल्कि वे कर रहे हैं जिन्हें समाज अपना आदर्श मानता है। जिन महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए पुरुषों ने एक लंबी लड़ाई लड़ी, वे आज फिर पीछे की तरफ धकेली जा रही हैं। स्त्री का काम सिर्फ पढ़-लिखकर एक सुघड़ गृहिणी बनने तक ही सीमित नहीं है, वह आज पुरुषों के बराबर बढ़ रही है। घर के कामकाज के अलावा बाहर के कामकाज में भी। वह स्कूल-कालेज में टीचर है, कालेज में प्रोफेसर है। राजनीति, न्यायपालिका आदि सभी जगह उसका बराबर का दखल है। कारपोरेट हाउसेज में उसकी मेधा की मिसाल सामने है। आज तमाम कंपनियों की सीईओ तथा बड़े पदों पर महिलाएं हैं। इसी तरह पत्रकारिता के क्षेत्र में आज वह पुरुष के बराबर खड़ी है। ऐसे में अगर दफ्तरों में या वर्कप्लेस पर उसके साथ कुछ ऐसी अनहोनी होती है, जिसकी कल्पना उसने उस व्यक्ति के साथ नहीं की होगी, जिसको वह आदर्श समझती रही है तो उसके सारे मूल्यों और सारी आस्थाओं का भंग होना स्वाभाविक है।
एक पत्रकार के रूप में मैंने स्वयं पाया कि महिलाओं के लिए पहले यह क्षेत्र वर्जित था और आमतौर पर महिलाओं को साफ्ट स्टोरीज पर लगाया जाता था। उनसे किसी तरह के स्कूप अथवा क्राइम की स्टोरी कवर करने की कल्पना संपादक करते ही नहीं थे। पर आज महिलाओं ने इस मिथक को तोड़ा है तो इसी बूते कि समाज ने उन्हें कुछ बहुत ही सही पर सम्मान और सुरक्षा प्रदान की है, और यह सुरक्षा उन्हीं पुरुषों की सहायता से आई जो महिलाओं का सम्मान करना जानते हैं। बगैर पुरुषों की मदद के स्त्रियां वे सभी काम नहीं कर सकती थीं जो उनके लिए वर्जित समझे जाते थे। इसमें अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिम के तौर-तरीकों ने भी बड़ी मदद की। पश्चिमी देशों में स्त्रियों को वे सभी अधिकार प्राप्त हैं जिनके बूते वे हर क्षेत्र में पुरुषों की बराबरी पर हैं। पत्रकारिता के पेशे में रात को कभी भी स्टोरी के लिए भागना पड़ता है। एक अच्छा पत्रकार वही है जो बिना यह सोचे कि उसका अगला कदम क्या होगा, परिस्थितियों के पीछे भागता है। एक अच्छी स्टोरी तब ही मिल पाएगी जब संवाददाता उस घटना स्थल पर जाएगा। और यह अब देखा जा रहा है कि महिलाएं कई बार अपने पुरुष सहकर्मियों की अपेक्षा घटनास्थल पर जल्दी पहुंच जाती हैं। लेकिन पिछली दिसंबर से लेकर जो घटनाएं हुई हैं, उनसे क्या आने वाले दिनों में महिलाओं को ऐसे जोखिम वाले कामों को अंजाम देने में पीछे नहीं हटना पड़ेगा?  एक संपादक जिसकी छवि एक ऐसे पत्रकार के रूप में हो जो किसी भी ताकतवर सरकार से भिड़ सकता हो और जो किसी के खिलाफ पुख्ता सबूतों के साथ स्टोरी करवा सकता हो, जो किसी का भी स्टिंग आपरेशन करवा सकता हो, उसके विरुद्ध उसकी सहकर्मी का आरोप उसके मन के कलुष को ही बताता है। चूंकि उस संपादक ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है और प्रायश्चित स्वरूप छह महीने तक अपने पद से हट जाने का फैसला किया है, इसलिए अब इसमें मामले के संदिग्ध होने की कोई गुंजाइश नहीं बची है। लेकिन क्या संपादक का स्वघोषित प्रायश्चित इस हरकत के लिए पर्याप्त सजा है? क्या हमारा संविधान किसी आरोपी और आरोप सिद्ध अपराधी को ऐसी सजा की मंजूरी देता है?  मात्र अपराध मान लेने से उनके प्रति कोई सहज सहानुभूति अथवा संवेदना नहीं पैदा होती। उनके प्रति सहानुभूति तो तब होती जब वे पुलिस के समक्ष जाकर कहते कि हां उनसे अपराध हुआ है । मालूम हो कि इस पत्रिका ने अपने जन्म के साथ ही तहलका मचाना शुरू कर दिया था। जब देश में भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार थी, तब इसी पत्रिका ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को एक ठेकेदार से रिश्वत लेते हुए दिखाकर तहलका मचा दिया था। उसके बाद गुजरात के दंगों का स्टिंग इसी पत्रिका ने किया था। पर आज इसी पत्रिका के संपादक की सहकर्मी ने उन पर यौन शोषण का आरोप लगाकर उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया है। पर क्या सिर्फ गलती मान लेने से इस पूरे घटनाक्रम पर परदा डाला जा सकता है? भले उनके सहकर्मी भी संतुष्ट हो जाएं लेकिन संपादक ने पत्रिका के पाठकों से जो विश्वासघात किया है, उसका जवाब उन्हें देना होगा। यह मामला पूरे मीडिया जगत को शर्मसार कर देने वाला तो है ही बल्कि उन लोगों के लिए किंकर्तव्यविमूढ़ कर देने वाला है जो इस पत्रिका के साहस और संपादक की नैतिकता के कायल बन चुके थे। शीर्ष पदों बैठे लोग महज एक सामान्य आदमी नहीं होते, वे उस पूरे समाज के रोल माडल होते हैं। उनकी एक-एक हरकत पर जन सामान्य की नजर रहती है, इसलिए इसका भुगतान तो उन्हें करना ही पड़ेगा।

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज मंगलवार को (26-11-2013) "ब्लॉगरों के लिए उपयोगी" ---१४४२ खुद का कुछ भी नहीं में "मयंक का कोना" पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. उसे आधुनिका बनाने की कोशिशें हो रही हैं और बाजार में उसे गुडिय़ा बनाकर पेश किया जा रहा है पर जब तक पुरुषों की सोच नहीं बदलेगी, तब तक वे गुडिय़ा ही बनी रहेंगी। उन्हें अपने सम्मान की रक्षा के लिए पुरुषों का सहारा लेना पड़ेगा और पुरुष इस सहारे की कीमत भी वसूलता है।

    ---आग और पानी का संगम होगा तो यही अंजाम होगा...चिल्लाते रहिये...

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