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शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

याद आएंगे केपी सक्सेना



हमेशा याद आएंगे केपी सक्सेना
  बॉलीवुड की चर्चित फिल्मों 'जोधा अकबर', 'स्वदेश' और 'लगान' की पटकथा लिखने वाले और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात साहित्यकर केपी सक्सेना को लोकप्रिय साहित्यकार और व्यंग्यकार के तौर पर उनके योगदान के लिए हमेशा याद किया जाएगा। सक्सेना ही वह शख्स थे, जिन्होंने पहली बार कवि सम्मेलनों में गद्य विधा को अलग पहचान दिलाई। मशहूर व्यंग्यकार केपी सक्सेना को लखनऊ की सरजमीं पर रहते हुए देशभर में शोहरत मिली। शुरुआती दौर में उन्हें प्रकाशकों ने हालांकि स्वीकार नहीं किया, लेकिन बाद में अपने धारदार लेखन के बल पर उन्होंने जो पहचान बनाई, वही उन्हें फिल्म फेयर तक ले गई। लखनवी संस्कृति के वह ऐसे पुरोधा थे, जो फिल्मी नगरी के लिए सबसे विश्वस्त सूत्र बन गए। पद्मश्री सम्मान से अलंकृत केपी की यादें लखनऊ की गलियों से जुड़ी हैं। यहां के गोलागंज के भगवती पान भंडार पर उनका मनपसंद पान मिलता था। साथ ही बबन कश्मीरी की पतंग की दुकान पर भी वह रोज जाया करते थे। प्रखर समालोचक वीरेंद्र यादव ने कहा, "यह सही है कि केपी जी का जाना एक शून्य पैदा कर गया। वह लोकप्रिय साहित्य से जुड़े थे। इसलिए उनकी अपनी एक अलग पहचान थी। उनकी कमी वाकई प्रशंसकों को खलेगी।" यादव कहते हैं कि यह भी सच है कि केपी 'गंभीर साहित्य' से कोसों दूर थे। यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि वह श्रीलाल शुक्ल और हरिशंकर परसाई की श्रेणी के साहित्यकार तो नहीं थे लेकिन लोकप्रिय साहित्य में जो मुकाम उन्होंने हासिल किया वह शायद ही कोई कर पाएगा। हमने एक प्रमुख लोकप्रिय व्यंग्यकार को खो दिया है। उन्होंने कहा, "कवि सम्मेलनों में अपनी गद्य शैली के माध्यम से ही जिस तरह उन्होंने लोगों के बीच अपनी पहचान बनाई वह अद्भुत थी। उनसे पहले कवि सम्मेलनों में गद्य विधा को उतनी पहचान नहीं मिली थी।"  साहित्यकार शैलेंद्र सागर ने कहा, "वह एक बेहद लोकप्रिय व्यंग्यकार थे। उनका जाना वाकई में दुखद है। उन्होंने जिस तरह से फिल्मों के माध्यम से अपनी प्रतिभा की पहचान कराई, वह लंबे समय तक लोगों को याद रहेगी।"  उल्लेखनीय है कि बरेली में 1934 में जन्मे कालिका प्रसाद सक्सेना, अपने प्रशंसकों के बीच केपी नाम से लोकप्रिय हुए। वह पचास के दशक में लखनऊ आए थे। सत्तर के दशक में वजीरगंज थाने के पीछे और अस्सी के दशक में रवींद्रपल्ली के पास नारायण नगर में रहे।  केपी ने आकाशवाणी, दूरदर्शन और रंगमंच के लिए 'बाप रे बाप' और 'गज फुट इंच' नाटक लिखने के अलावा दूरदर्शन के लिए धारावाहिक 'बीवी नातियों वाली' भी लिखा जो काफी प्रशंसनीय रहा। केपी के लिखे इस सीरियल को देश का पहला हिंदी का सोप ओपेरा होने का गौरव हासिल है। यह सीरियल इतना लोकप्रिय हुआ कि पब्लिक डिमांड पर इसके आगे के एपीसोड भी उन्हें लिखने पड़े। रेलवे की नौकरी के दौरान ही उन्होंने विभागीय नाट्य प्रतियोगिताओं में धाक जमाना शुरू कर दिया था।

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (02-11-2013) "दीवाली के दीप जले" : चर्चामंच : चर्चा अंक : 1417) "मयंक का कोना" पर भी होगी!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    दीपावली पर्वों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सेनापति तुम हास्य के, व्यंग अंग प्रत्यंग |
    लखनौवा तहजीब के, जीवित मल्ल- मलंग |

    जीवित मल्ल- मलंग, अमीना हजरत बदले |
    बदले बदले रंग, ढंग पर पश्चिम लद ले |

    हुआ बड़ा बदलाव, नहीं अब ठेना देना |
    हवा बदलने स्वर्ग, चले के पी सक्सेना ||

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    1. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

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