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सोमवार, 25 नवंबर 2013


















मुश्किल हो लाख, नमनीदा न हो
जिन्दगी ही क्या, जो पेचीदा न हो।
जो न मुस्कराते रहें, वो लब नहीं
जख्म वो कैसा जो पोशीदा न हो।
खुश न हो इतना, बहारें देखकर
गर खिजां आये तो रंजीदा न हो।
जुर्म करने के लिए जब हो उठे
हाथ वो कैसा जो लरजीदा न हो।
होठ हंसने के लिए जाएं तरस
इस कदर भी कोई संजीदा न हों।

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज मंगलवार को (26-11-2013) "ब्लॉगरों के लिए उपयोगी" ---१४४२ खुद का कुछ भी नहीं में "मयंक का कोना" पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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