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मंगलवार, 12 नवंबर 2013

मुक्कद्दर आज रूठा है

मुक्कद्दर आज रूठा है

जुदा हो करके के तुमसे अब ,तुम्हारी याद आती है
मेरे दिलबर तेरी सूरत ही मुझको रास आती है

कहूं कैसे मैं ये तुमसे बहुत मुश्किल गुजारा है
भरी दुनियां में बिन तेरे नहीं कोई सहारा है

मुक्कद्दर आज रूठा है और किस्मत आजमाती है
नहीं अब चैन दिल को है न मुझको नींद आती है..

कदम बहकें हैं अब मेरे ,हुआ चलना भी मुश्किल है
ये मौसम है बहारों का , रोता आज ये दिल है

ना कोई अब खबर तेरी ,ना मिलती आज पाती है
हालत देखकर मेरी ये दुनिया मुस्कराती है

बहुत मुश्किल है ये कहना कि किसने खेल खेला है
उधर तन्हा अकेली तुम, इधर ये दिल अकेला है

पाकर के तन्हा मुझको उदासी पास आती है
सुहानी रात मुझको अब नागिन सी डराती है


मदन मोहन सक्सेना

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीयचर्चा मंच पर ।।

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  2. बहुत खूब !जज़बातों को कहा है गज़ल ने।

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