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गुरुवार, 30 जनवरी 2014

धुरी बन जाने को -पथिकअनजाना—470 वीं पोस्ट



नही समझ पाया मैं कभी मनुष्य हृद्य धुरी कैसे बन सकता हैं ?
पाठ शांति का दे इंसानों को र्निलोभी होने की सलाह दी जाती हैं
शांत ,र्निविचारी मनुष्य, तो पायेंगे पथ्थर मूर्तियों की दुनिया में
मुझे खिडकी से बाहर कभी आकाश कभी जमीन नजर आती हैं
हृद्य महसूस करता जानवरों में इंसा कभी इंसा जानवर होते हैं
प्रकृति की हर शै आन्तरिक हलचलों के निशां लगे हंसते ढोते हैं
मांग पाण्डित्य धन ऐश्वर्य इंसा, याद रावण की क्यों दिलाते हैं
जमी घूमती सौर गंगाये घूमती दिखता सब कुछ चलायमान हैं
परिवर्तन तो प्रकृति में  घटता नित्यप्रति नजर सबको आता हैं
इंसान को जीवन कुरूक्षेत्र में क्यों धुरी बन जाने को कहा जाता हैं

पथिक अनजाना

2 टिप्‍पणियां:

  1. हमें जीवन के कुरुक्षेत्र में अर्जुन बनने को कहा जाता है, इसके लिये हमें हर वस्तु का मोह त्यागना होगा तभी तो जीवन युध्द को तत्पर होंगे।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (31-01-2014) को "कैसे नवअंकुर उपजाऊँ..?" (चर्चा मंच-1508) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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