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शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

संजीवनी भूले --पथिक अनजाना –४५६ वीं पोस्ट




        संजीवनी भूले    --पथिक अनजाना –४५६ वीं पोस्ट 

 जब जब अवतारों ने मानवता को जीवित रखने की खातिर
अनथक परिश्रम से संजीवनी शक्ति फैलाने का श्रम किया
जब जब भागीरथी ने मानवता के शुद्धिकरण की खातिर
गंगा को धरा पर अवतरित करने हेतू अपना जीवन दिया
लगा मूल्य इंसा ने संजीवनी भूल देवों की मूर्तियाँ बना दी
विवश देवगण क्या करे जब बुद्धिमान ही बुद्धिहीन हो जावे
चेतावनियाँ बन गई इंसानी कहानियाँ खुदा खोगया कहलावे
पथिक अनजाना

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (19-01-2014) को "सत्य कहना-सत्य मानना" (चर्चा मंच-1496) पर भी होगी!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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