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गुरुवार, 9 जनवरी 2014

क्षमाप्रार्थी न कहलावोगे ---पथिक अनजाना --४४८ वां पोस्ट






                      क्षमाप्रार्थी न कहलावोगे
हमसफर मेरे ,आज मैंने हकीकत निचोड संवारी हैं
जीवन समस्याओं अनिश्चित जीवनराह विचारी हैं
रखो सामने हर पल इसे  विजय सदैव तुम्हारी हैं
दुनिया में कभी भी तुम किसी को अपना न मानो
खुदा जो विवशदाता वह तुम्हारे कर्मों का ज्ञाता हैं
इसके दायरे में समस्त दुनियायी सबंधों का वजूद
प्यार इनसे जीवन सौत नही पर आत्मिक मौत हैं
कुपथ,कुविचार न अपनाये क्षमाप्रार्थी न कहलावोगे
न डूबो न विचारो न पुकारो तो सुखद राह गुजारोगे
यह जीवन मंत्र सब अपनायें तो जग क्यों सुधारोगे
पथिक अनजाना

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (10-01-2014) को "चली लांघने सप्त सिन्धु मैं" (चर्चा मंच:अंक 1488) में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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