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गुरुवार, 20 मार्च 2014

राजा अकेला क्या करेगा—पथिकअनजाना-- 521वीं पोस्ट



दहल उठा अचानक देख कर मैं अपनी नजरों के सामने जो हैं
मैं जाने किस लोक में पहुँचा जाने किस राह से गुजरता हुआ
सामने जो बिछी थी बिसात शतरंज की नजर न हट सकी मेरी
मुझे लगा मानो राजा के सिवाय सारे मोहरे उतरे मनमानी को
सेनापति रानी प्यादे ही नही जानवर घोडेहाथी व ऊंट भी थे  भी
सारे मोहरे अपनी अपनी मर्जी से गलत बेहिसाब राह विचरने लगे
हैरान हुआ राजा अकेला क्या करेगा उसका अस्तित्व नकारा गया
खिलाडियों के हुक्म व स्पर्श बेकार हुये ऐसी बिसात का हाल क्या
राजा किंकर्त्वमूढ हुआ खिलाडी सिर धुन रहे थे लोग हंस रहे थे
अब उस देश परिवार की गहनता से सोचैं जहाँ घटित ऐसा होवे
अनियंत्रण हेतू  दोष राजा या परिवार प्रमुख का जग वाले मानेंगे
राह सही लाने हेतू हालातों को क्या विचारे जहाँ न्याय बिक जावे
राजा कोई गैर नही मेरे देश की जनता शेष बैठाये जहाँ बैठ जावे
जनता को राजा कहें हम वही तो  जो सेवकों को काम में लगावे
पथिक अनजाना


1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (21-03-2014) को "उपवन लगे रिझाने" (चर्चा मंच-1558) में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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