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मंगलवार, 25 मार्च 2014

भाजपा के शोकगीत पर संघ का भागवत पाठ


16वीं लोकसभा के लिए हो रहा चुनाव कई मायनों में अनोखा है। इस चुनाव की स्मृतियां  लंबे समय तक याद की जाएंगी। इसके पीछे तीन कारण है। पहला कारण यह कि 10 वर्ष से देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का इस चुनाव में कोई अहम रोल नहीं है। दूसरा यह कि तमाम अन्तरविरोधों के बावजूद नरेन्द्र मोदी का झंडा कोई नहीं झुका सका। तीसरा यह कि भाजपा के शोकगीत पर संघ का भागवत पाठ नसीहत देता रहा। टिकट बंटवारे को लेकर भाजपा में छिड़ा अन्तर्द्वन्द कम होने का नाम नहीं ले रहा है। जब लालकृष्ण आडवाणी, जसवंत सिंह सरीखे नेता अपना धैर्य खो बैठे तो छोटे नेताओं के बारे में कहना ही क्या है। आडवाणी को जो मलाल है, वह तो समझ में आ रहा है कि उनकी आंखों के आगे मोदी को कद इतना बढ़ गया कि वह भाजपा के आइकन बन गए। यह कहीं न कहीं अंदर से आडवाणी को चौन से जीने नहीं दे रहा है। दूसरे जो लोग नाराज होने का नाटक कर रहे हैं, उसके पीछे मूल कारण यह है कि वे इस (मोदी) लहर में पार लगना चाह रहे थे, सो उनकी मंशा पूरी नहीं हो पा रही है। हम बात अगर मुरली मनोहर जोशी की करें तो साफ है कि जो खुद अपनी सीट नहीं बचा सकता, वह भाजपा के लिए अन्य सीटों को कैसे प्रभावित कर सकेगा। ठीक यही दशा बिहार के लालमनि चौबे की है। इन सब के बीच 24 मार्च को संघ प्रमुख भागवत ने आडवाणी को जो पाठ सुनाया, उससे आडवाणी ही नहीं बल्कि नाराजगी का नाटक कर रहे कई और नेताओं को संकेत में संदेश देने की कोशिश हुई है। भाजपा में कुछ वरिष्ठ नेताओं को किनारे किए जाने से उपजे विवाद के बीच राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि यात्रा को सफल बनाने के लिए समय के अनुरुप बदलाव जरुरी है। भागवत ने यह बात उस समय कही, जब वहां लालकृष्ण आडवाणी की मौजूदगी रही। आरएसएस के मुख्यपत्र ऑर्गेनाइजर और पांचजन्य द्वारा आयोजित कार्यक्रम में भागवत ने कहा, ऐसा कहा जाता है कि बदलाव जरुरी है। समय के अनुसार जो भी बदलाव जरुरी होते हैं, उन्हें करना चाहिए ताकि यात्रा सफल और स्थिर हो। ऐसे समय में जब भाजपा आडवाणी और जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं को एक किनारे करने के साथ एक तरह के बदलाव का सामना कर रही है, भागवत की टिप्पणियां महत्व रखती हैं। आडवाणी पिछले हफ्ते खुद को भोपाल से उम्मीदवार न बनाए जाने से नाराज हो गए थे। उन्हें उनकी इच्छा के विपरीत भोपाल की जगह गांधीनगर से खड़ा किया गया है। जसवंत सिंह राजस्थान के बाडमेर से चुनाव लड़ना चाहते थे लेकिन उन्हें वहां से उम्मीदवार नहीं बनाया गया जिसके बाद सिंह ने भाजपा छोड़ दी और निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनावी मैदान मंें उतर गए। भागवत ने इन सब से बेफिक्र होकर कहा कि समय के अनुसार बदलाव होना चाहिए लेकिन श्ढांचाश् पहले जैसा ही होना चाहिए। भागवत ने इससे एक कदम और आगे बढ़ते हुए यह भी कहा कि यही स्थापित विचार है कि बदलाव जरुरी है। निरंतर बदलती दुनिया का मूल सत्य शाश्वत है और जो बदलता नहीं। बदलाव अच्छे के लिए होना चाहिए। एक तरह से भागवत ने यह संकेत देकर साफ कर दिया कि मोदी के नेतृत्व में जो कदम उठाया जा रहा है, वह कहीं से गलत नहीं है। एक तरह से संघ प्रमुख भागवत की यह टिप्पणी भाजपा के कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने का काम करेगी। इस समय जब चुनावी जंग छिड़ी हुई है और सेना के सारे सैनिक मोरचे पर डटे हैं, ऐसे में सेनापति को हतोत्साहित करने के बजाय उसे उत्साहित करने की जरुरत है। जो हो रहा है वह अच्छा है या बुरा है। इसका मूल्यांकन तो परिणाम आने के बाद ही किया जाएगा।

4 टिप्‍पणियां:

  1. समय परिवर्तनशील है और सबसे बलवान भी |उसके आगे सबको सर झुकाना पड़ता है ! मेरा व्यक्तिगत मत है कि ६५ साल से अधिक उम्र के सभी व्याक्ति को सरकारी ,अर्ध सरकारी एवं सभी सार्वजनिक संस्था के पदों से मुक्त हो जाना चाहिए , भागवत जी को भी ऐसा करना चाहिए और नए पीढ़ी को अपना भविष्य निर्धारित करने का अधिकार देना चाहिए !नए लोगों का सप्ना नया है ,नयी उड़ान के लिए समर्थ भी है !
    लेटेस्ट पोस्ट कुछ मुक्तक !

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीयचर्चा मंच पर ।।

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  3. राजनीति में 'लोकगीत' अब 'शोक-गीत' बन छाया है !
    जों कुछ है सो ठीक ,यह राजनीति की माया है !!

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