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गुरुवार, 15 मई 2014

गर ऐसा हुआ की बात --पथिकअनजाना ---602 वीं पोस्ट




बीती देर रात जब गुजर रहा था अनजानी गली से
इक मोड आने पर सोच रहा था कि राह कौन जायें
ध्यानाकर्षित हुआ किसी महिला पुरूष की बात पर
महिला बेबुनियादी कल्पनाओ से कान भर रही थी
संभवत: पुरूष सामने महिला के गिडगिडा रहा था
रौब महिला की आवाज में दब्बूपन पुरूष बता रहा
वो जोड हाथ आबरू लुट जाने का खौफ खा रहा था
धीमी आवाज हेतू बीबी को बेचारा वह मना रहा था
सुन लगा बेकसूर चूंकि घटना घटित की बात न थी
गर ऐसा हुआ की बात मोहतरमा तो दुहरा रही थी
हावी हुआ यहाँ नतमस्तक व नतमस्तक हुई हावी
जाने कब बसैरे पर जा पहुंचा सोचते सुबह हो गई
फिर सुबह बीती रात की बात दिमाग पर छा गई
मानवीय संस्कारों की विभिन्नता मुझे तडफा गई
महिला को शह पिता की न होती तो बनती मोती
असंस्कारी माता-पिता बाद विवाह दखल रखते हैं
संस्कारी संतान होके पुरूष आबरू बचाने भगते हैं
दुश्मन पुत्रियों केअपने असंस्कार प्रदर्शित करते हैं
 मोह त्यागें कुपथ न जायें सृष्टि मे खुश्बू फैलायें

पथिक अनजाना

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