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शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2013

नष्ट होते वनस्पति कवच से घातक बनते चक्रवात

नष्ट होते वनस्पति कवच से घातक बनते चक्रवात

रमेश पाण्डेय
पिछले दिनो आये फैलिन तूफान ने पूर्वी प्रदेशों में जमकर कहर बरपाया। इसके बाद यह सोचना जरूरी हो गया है कि आखिर यह चक्रवात इतने घातक क्यों बन रहे हैं। आखिर इसके लिए सच में जिम्मेदार कौन लोग हैं। आम आदमी या फिर पर्यावरण से खिलवाड कर रहे सफेदपोश राजनैतिक लोग। यहां यह बताना समीचीन है कि चक्रवात का तात्पर्य चार प्रकार से नुकसान पहुंचाना होता है। इसी कारण इन तूफानों का नामकरण चक्रवात से किया जाता है। पहला नुकसान तेज हवा के झोंके से होता है, दूसरा नुकसान समुद्री लहरों के बस्तियों में भीतर तक प्रवेश करने से होता है, तीसरा नुकसान भू-भाग में अत्यधिक वर्षा के कारण हुआ करता है और चौथा नुकसान तूफान के कारण बांध या उद्योगों के नष्ट होने के कारण हुआ करता है। प्रकृति ने इन नुकसानों से बचाव के लिए मैनग्रोव प्रदान किया है। मैनग्रोव अर्थात प्रकृति द्वारा प्रदान किया गया वनस्पति कवच। मानव ने विकास की अंधी दौड में इस वनस्पति कचव को नष्ट कर दिया है और जो कुछ बचा है उसे भी नष्ट करता जा रहा है। यह वनस्पति रक्षा कवच समुद्र के तटीय इलाकों में पेडों, मूंगे और पहाड की चटटानों, बालू और रेत की प्रचुर मात्रा के रूप में प्रकृति ने प्रदान कर रखी है। आज चारों तरफ खनन हो रहा है। पेडों की अंधाधुंध कटान की जा रही है। पास्को जैसी विवादित परियोजना को हरी झंडी देकर हजारों पेडों को कटवा दिया गया। देश के सभी प्रदेशों में खनन माफिया मनमानी तरीके से रेतों की खुदाई करवा रहे है। मूंगे की चटटानों को डायनामाइट का इस्तेमाल कर तोडा जा रहा है। इसके अलावा लगातार फैल रहे प्रदूषण से प्रकृति का यह वनस्पति कवच नष्ट किया जा रहा है। अगर समय रहते सरकार और सत्ता में बैठे लोगों ने न चेता तो आने वाले समय में प्राकृतिक आपदाओं का कहर और तेजी से बरपेगा। इसके पहले भी सैंडी, कटरीना जैसे कई तूफान आ चुके हैं। सभी चक्रवाती तूफानों ने जन के साथ ही व्यापक धनहानि की है। इससे बचने के लिए सरकार करोडों रूपये तो व्यय कर देती है, पर उस कारण का पूरी तरह से निवारण करने की कोशिश नहीं की जा रही है, जिसके कारण चक्रवाती तूफान के बार-बार आने की संभावना अधिक होती जा रही है। निश्चित रूप से इसके लिए पर्यावरण ़िमत्रों को सजग होना होगा और अपनी आवाज उठानी होगी। लगातार हो रहे अंधाधुंध खनन और पेडों की कटान को रोकने के लिए यह पहल नक्कारखाने में तूती की आवाज जैसा होगी, फिर भी पहल होनी चाहिये। दुखद है कि फैलिन चक्रवात के कारण इतने बडे पैमाने पर नुकसान हुआ। तकरीबन अस्सी लाख लोग बेघर हो गये। करोडों की फसल चौपट हो गयी। बावजूद इसके भी चक्रवात के अचानक आने के कारणों पर नजर नहीं डाली जा रही है और लगातार इस बढ रही इस भयावहता से बचाव के रास्ते नहीं खोजे जा रहे हैं।


8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (19-10-2013) "शरदपूर्णिमा आ गयी" (चर्चा मंचःअंक-1403) पर भी होगी!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. रचना को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद

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  3. तटीय इलाके पे रीअलटर्स की पूरी नजर रहती है। सुनामी ने भारत में वहां वहां तबाही न कर सकी जहां जहां मैन्ग्रूव्ज़ बाकया थे। आपने बड़ा सार्थक मुद्दा उठाया है।

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  4. वीरेन्द्र जी प्रतिक्रिया और उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद

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  5. satya kathan ... dinodin prakriti ka kahar badhta ja raha iska karan jante huya bhi insaan sudhrta nahi ..samyik rachna

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  6. सुुनीता जी, अच्छी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

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