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गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

एक दिन

अपनी दुनिया में से निकाल कर
एक दिन ऐसा दे दे मुझे...

जिसमें उगता सूरज,
चलता सूरज
और ढलता सूरज
साथ—साथ देखें..

उस रंगीन दिन में
ब्लैक एंड व्हाइट दौर के
गानों की मिठास घुली हो
उस दिन की शुरूआत
सर्दी की सर्द हवाओं सी हो
जिसमें खुशी कोहरा समाया हो

दोपहर पीपल की
छांव में सिमटी हो और
शाम में शहरी गुलाबी रंग
की मिलावट हो
शाम वो कुछ ऐसी हो
जो सिर्फ तेरी और मेरी हो

बस वो एक खास दिन
अपनी ज़िंदगी ​का दे दे मुझे...

13 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना मुझे बहुत अच्छी लगी .........
    शनिवार 19/10/2013 को
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    में आपकी प्रतीक्षा करूँगी.... आइएगा न....
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (18-10-2013) "मैं तो यूँ ही बुनता हूँ (चर्चा मंचःअंक-1402) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  3. वो सुबह भी आएगी कभी न कभी ,आस पर ही जीवन टिका है। आशा से भरपूर रचना।

    उत्तर देंहटाएं

  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आप की इस प्रविष्टि की चर्चा शनिवार 19/10/2013 को प्यार और वक्त...( हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल : 028 )
    - पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर ....

    उत्तर देंहटाएं