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बुधवार, 30 अक्तूबर 2013

इस भौतिक जगत के ,भव- सागर के पार जाने के लिए स्वस्थ शरीर रुपी नाव चाहिए।इसीलिए कहा गया -हेल्थ इज वेल्थ। एक तंदरुस्ती हजार नियामत।

अध्यात्म हमारे मन के और पदार्थ शरीर के लिए ज़रूरी है। क्यों ?



सहजीवन (symbiotic living )का सही अर्थ समझना है तो जीवन में अध्यात्म और पदार्थ दोनों को पर्याप्त स्थान देना पड़ेगा दोनों की सत्ता स्वीकारनी पड़ेगी। ये नहीं हो सकता हम शरीर की ज़रूरीयात की अनदेखी करें और मन को पोषण ज़ारी रहे। दोनों परस्पर आश्रित हैं। 

ठीक ऐसे ही सिर्फ भौतिक सुख भोग हमें जीवन का समर्थ आधार प्रदान नहीं करेगा। दोनों का अध्यात्म और पदार्थ का मेल ,सहजीवन परस्पर संवर्धन ज़रूरी है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास हो सकता है। भले हम भौतिक क्षेत्र (अपने कार्य क्षेत्र )में कितने ही झंडे गाढ़ लें,तरक्कियों के कितने ही  आसमान छू लें। यदि शरीर अस्वस्थ है मन विक्षुब्ध है तब सब बेकार हो जाएगा। इसलिए कोठी बंगला कार सुन्दर साथी से भी ज्यादा ज़रूरी है स्वस्थ काया और उसके अन्दर एक नीरोगी मन। 

पञ्च भूतों से बने शरीर को अच्छी तंदरुस्त खुराक चाहिए ही चाहिए। पदार्थ चाहिए। पदार्थ विज्ञान के ज़रूरी  उपादान भी चाहिए। लेकिन साथ ही मन को ऊर्ध्व गति देने के लिए मन के शुद्धिकरण के लिए अध्यात्म विज्ञान भी चाहिए। दोनों का संग साथ अपरिहार्य है। 

केवल अपने आपको चेतन ऊर्जा (दिव्य ऊर्जा अंश परमात्मा का ) मानकर बैठने से भी काम नहीं चलेगा। आप  सब कुछ केवल आत्मा की तरक्की के लिए नहीं कर सकते।शरीर की अनदेखी नहीं की जा सकती। जगदगुरु कृपालुजी महाराज ९० के पार चले आये हैं अभी भी योग (आसन )करते हैं।पर्याप्त सैर करते हैं। स्वस्थ भोजन करते हैं। 

काया के रोग ग्रस्त होने पर पीड़ा मन झेलता है।

 ऐसे में भगवान् में भी ध्यान कहाँ टिकेगा ?

भूखे रहने पर भी भजन नहीं होगा। 

भूखे भजन न होय गोपाला ,

ये ले अपनी कंठी माला। 

इस भौतिक जगत के ,भव- सागर के पार जाने के लिए स्वस्थ शरीर रुपी नाव चाहिए।इसीलिए कहा गया -हेल्थ इज वेल्थ। 

एक तंदरुस्ती हजार नियामत। 


इसीलिए जीवन में स्वस्थ जीवन शैली को अपनाना ज़रूरी है। मन और काया को  नीरोगी रखने का यही समय -सिद्ध नुस्खा है।

भौतिक साधनों से संपन्न व्यक्ति कई बार ऐसा मान  लेते हैं अध्यात्मविज्ञान  भौतिक बेहतरी के मार्ग का रौड़ा है। समय का अपव्यय है। समय भले आज महत्वपूर्ण निवेश है लेकिन ऐसा सोचना नादानी ही कहा जाएगा। 

"For without the the help of spiritual knowledge ,secular science has no means of eliminating the negative propensities of the mind ."

अधुनातन विज्ञान ,प्रकृति (External energy of God ) ,प्राकृतिक संसाधनों का तो हमारे  सुख के लिए अतिशय दोहन कर सकता है लेकिन हमारे मन हमारी अन्तश्चेतना ,हमारी मूल प्रकृति internal nature ,अतिरिक्त वासना ,क्रोध ,बे-मतलब की ईर्ष्या ,और भ्रांत  -धारण का उसके पास क्या कोई समाधान है ?


अध्यात्म ही दृष्टि -भ्रम ,निराधार विचार से मुक्ति दिलवा सकता है। इसलिए जीवन के अंतिम लक्ष्य को पहुँचने के लिए मन के पोषण के लिए अध्यात्म और तन के पोषण के लिए पदार्थ भी ज़रूरी है। 

अकेला चना भाड़ नहीं झोंक  सकता।  

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 31-10-2013 के चर्चा मंच पर है
    कृपया पधारें
    धन्यवाद

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  2. लाख टके की बात है, पहले मेटो भूख।
    बिन भोजन के सभी की, जाएँ अँतड़िया सूख।।

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  3. वैसे तो ये बाते सब जानते हैं पर अमल कहाँ करते हैं |सुबह सुबह आपका यह पोस्ट मन को उर्जावान बनादिया है |आभार |
    नई पोस्ट हम-तुम अकेले

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