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मंगलवार, 15 अक्तूबर 2013

दीगर है कि योग के पूरे दोहन के लिए इसका ध्यान मनन वाला पक्ष भी सक्रीय किया जाना चाहिए। भले कई पढ़े लिखे उसे पेसिव मेडिटेशन कहते हैं।

 



योगासन इतने असरकारी सिद्ध क्यों होते हैं ?



जीवन जीने की कला वही है जो जीवन के सभी पहलुओं को समाहित किये हो -भौतिक ,मानसिक ,संवेगात्मक ,बौद्धिक और 

आध्यात्मिक पक्षों से रु -ब -रु हो।भले योग का केंद्रीय लक्ष्य आध्यात्मिक उत्कर्ष की ओर  मानव को ले जाना है लेकिन इसमें 

समाहित भौतिक आसनों का सभी को यकसां लाभ मिलता है भले उनका आध्यात्मिक लक्ष्य कुछ भी रहा हो। 




योग आसन हमारी काया  ,चित्त (मन )और संवेगों में सामंजस्य स्थापित करते हैं। भौतिक धरातल पर हमारे महत्वपूर्ण कायिक अंग 

,पेशियाँ स्नायु (तंत्रिकाएं ,नर्व्ज़ )हो सकता है अपना काम ठीक से अंजाम न दे पा रहे  हों।आसन उनमें एक समन्वयन ,समायोजन ले 

आते हैं। ऐसे में काया पर आसनों का  बड़ा अनुकूल प्रभाव पड़ता है।  

मानसिक धरातल पर मनुष्य नकारात्मक विचार ,राग द्वेष पाले रहता है। ऐसे में पेशीय गठानें शरीर के किसी भी हिस्से में पनप 

सकती हैं -ग्रीवा में यही गठानें सर्विकल स्पोन्डलाइटिस (Cervical spondylitis ),चेहरे पर न्युराल्जिया (Neuralgia) के रूप में 

प्रगटित हो सकती हैं। हर मानसिक ग्रन्थि (राग द्वेष ,ईर्ष्या )की गठान का एक संगत प्रभाव हमारे शरीर को अपनी लपेट में लेता है।

नकारात्मक भावों के संगत एक गठान पेशीय गठान बन के मुखरित हो सकती है। 

मन शरीर को असर ग्रस्त करता है शरीर फिर मन को भी करता है। 

क्रिया प्रतिक्रिया  युगल है यह।

भावात्मक (रागात्मक ,संवेगात्मक दवाब ),इमोशनल टेंशन फेफड़ों के निर्बाध काम  में खलल पैदा कर सकता है। श्वसन सम्बन्ध 

खलल यहाँ तक के दमा उभर सकता है दमे का उत्प्रेरक तत्व है रागात्मक दवाब। योग का मकसद इन तमाम गठानों को खोलना है। 

दीगर है कि योग के पूरे दोहन के लिए इसका ध्यान मनन वाला पक्ष भी 

सक्रीय किया जाना चाहिए। भले कई पढ़े लिखे उसे पेसिव 

मेडिटेशन कहते हैं। 

ध्यान -मनन -मंथन (रूप ध्यान )हमारे चित्त को शुद्ध करता है। राग 

द्वेष को मेट देता है। हमारा अंतस शांत हो जाता है। 

Proper combination of aasans ,pranayam ,subtle body 

relaxation ,and meditation ,tackle these knots ,both at the 

physical and mental levels .

जीवन क्षम ऊर्जा जागृत होती है। मन हल्का हो जाता है।प्रसन्न बदन 

और प्रफुल्ल एक साथ। सर्वप्रकार संतुलित।  अब तक यही ऊर्जा 

रागद्वेष के चलते प्रसुप्त पड़ी थी। 

दमा ,मधुमेह ,उच्च रक्त चाप (Hypertension ),जोड़ों के दर्द (arthritis ),पाचन सम्बन्धी विकारों में अलावा इसके कई लाइलाज 

पुराने पड़े मानवीय संरचना से ताल्लुक रखने वाले रोगों में एक आनुषांगिक चिकित्सा के रूप में योग आसनों का अपना स्थान 

बरकरार है।

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (16-10-2013) "ईदुलजुहा बहुत बहुत शुभकामनाएँ" (चर्चा मंचःअंक-1400) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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