मित्रों!

आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।


समर्थक

गुरुवार, 3 अक्तूबर 2013

श्रीमदभगवद गीता अध्याय चार :श्लोक (२५ -२६ ) दैवम एवापरे यज्ञं ,योगिन : पर्युपासते , ब्रहमाग्नाव अपरे यज्ञं ,यज्ञेनैवोपजुह्वति।

श्रीमदभगवद गीता अध्याय चार :श्लोक (२५ -२६  )

दैवम एवापरे यज्ञं ,योगिन : पर्युपासते ,

ब्रहमाग्नाव अपरे यज्ञं ,यज्ञेनैवोपजुह्वति। 

दैवम -स्वर्ग के देवता ;एवा  -वास्तव में ;  अपरे -अन्य ;  यज्ञं -आहुति ,बलि ;योगिन :  -आ२६ ध्यात्मिक अभ्यासी,ज्ञानीजन  ;  

पर्युपासते -पूजा -उपासना ;  ब्रह्मा -परम सत्य से सम्बंधित ,परम सत्य का ;  अग्नौ -अग्नि में ;  अपरे -अन्य ;  यज्ञं -आहुति ;  

यज्ञेन -आहुति द्वारा ;  एवा -वास्तव में ;


उपजुह्वति -अर्पण करना। 


कोई योगीजन देवताओं का पूजनरुपी यज्ञ करते हैं और दूसरे ज्ञानीजन ब्रह्मरुपी अग्नि में यज्ञ के 

द्वारा (ज्ञान रुपी )यज्ञ का हवन  करते हैं।

Some yogis worship the celestial gods with material offerings 

unto them .Others 

worship perfectly who offer the self as sacrifice in the fire of 

the Supreme Truth . 


दिव्य चेतना में रहते हुए ही उस परमशक्ति को स्वयं को अर्पण  करना चाहिए यज्ञ करना चाहिए। बेशक  लोग चेतना के अलग अलग 


स्तरों  एवं अपनी अपनी समझ के साथ  यज्ञ करते हैं। सबके लिए यज्ञ का मतलब यकसां नहीं है। भौतिक सुख साधनों की प्राप्ति के 



लिए कुछ लोग अपनी समझ से द्रव्य की आहुति देते हैं। 




जिन्हें यज्ञ की गहन  बूझ है वह स्वयं को ही यज्ञ में होम कर देते हैं।इसे 

ही आत्माहुति या फिर आत्मसमर्पण कहा जाता है। यहाँ 

आत्मा ही हव्य सामिग्री है।

Yogi Shri Krishna Prem explained this very  well :"In this 

world of dust and din ,whenever one makes an atmahuti 

in the flame of divine love ,there is an explosion ,which is 

grace ,for no true atmahuti can ever go in vain ."


लेकिन स्वयं को अर्पण करने की विधि क्या है ?परिपूर्ण आत्मसमर्पण  है 

, जिसकी चर्चा  १८ वें अध्याय के ६६ वें श्लोक में की गई है।  

श्रीमदभगवत गीता अध्याय चार :श्लोक (२६ )


श्रोत्रादीनीन्द्रियान्य अन्ये ,संयामाग्निषु जुह्वति ,

शब्दादीन विषयां  अन्ये इंद्रियाग्निषु जुह्वति। 


श्रोत्रा -आदीनी -जैसे श्रवण क्रिया हो ;  इंद्रियानी -इन्द्रिय ,सेन्स ओर्गेन्स ; अन्ये -अन्य ;  संयम -शांत या नियंत्रित व्यवहार ; अग्निषु -यज्ञ अग्नि ;  जुह्वति -आहुति ; शब्दादीन -ध्वनि कम्पन ,आदि ; विषयान -इन्द्रिय सुख की वस्तुएं ;अन्ये -अन्य ; इन्द्रिय -सेंस  ऑर्गन से सम्बन्धी 


अन्य योगी लोग श्रोत्रादि समस्त इन्द्रियों का संयम रुपी अग्नि में हवन करते हैं तथा कुछ लोग शब्दादि विषयों का इन्द्रिय रुपी अग्नि में हवन करते हैं। 

Others offer hearing and other senses in the sacrificial fire of restraint .Still others offer sound and other objects of the senses as sacrifice in the fire of the senses .

To explain it further -Some offer the organs of perception like the ear as oblation in the fire called restraint ,while others offer the sense objects like the sound as sacrifice in the fire called senses .

(योगाग्नि )अग्नि हव्य सामिग्री के स्वरूप को भस्म करके तब्दील कर देती है।बाहरी (वैदिक )कर्म काण्ड में  अग्नि हव्य सामिग्री को स्वाह कर डालती है। लेकिन आध्यात्मिक रूप में योगाग्नि प्रतीकात्मक होती है। यह अग्नि स्व :अनुशासन और संयम की है जो इन्द्रियों के भौतिक विषयों को भस्म कर देती है कामनाओं का अंत कर देती है। जिसमें वासनाएं  जलके स्वाह हो जाती हैं।

यहाँ आध्यात्मिक उत्कर्ष के दो विरोधी भाव वाले ध्रुव  हैं :

एक है इन्द्रियों का बलपूर्वक निग्रह जैसा हट योगी करते हैं। इसमें इन्द्रियों को निष्क्रिय कर दिया जाता है। इनके कार्य को निलंबित कर दिया जाता है। इनसे काम ही नहीं लिया जाता है। बस शरीर के आवश्यक नित्य कर्म शेष रह जाते  हैं जैसे शौच और मूत्र त्याग आदि। मन का निग्रह हैं यहाँ मन को हटा लिया जाता है बलपूर्वक इन्द्रियों और उनके विषयों से इच्छा शक्ति द्वारा। मन अंतर्मुखी हो रहता है। 

भक्ति योग दूसरा ध्रुव है :

इसमें मन प्रभु से लगा है उसके रूप का ,नाम का, धाम का, स्मरण करता है, ध्यान करता है. यहाँ हर अणु  में ब्रह्म है। इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों से मुखातिब ही नहीं हैं वह तो परमात्मा को देख सुन याद कर रहीं हैं।उदात्त शिखर है भक्ति का ब्रह्म और उसकी सृष्टि में एक प्रभु को ही देखना। यहाँ कोई निग्रह नहीं है रूपान्तरण  है.

Shree Krishna says :raso 'ham apsu kaunteya "Arjun ,know me to be the taste in water ."Accordingly , bhakti yogis practice to be -hold God through all their senses ,in everything they see ,hear ,taste ,feel ,and smell.

भक्ति मार्ग सहज सरल है। यहाँ रस है आनंद है गिरने का ख़तरा नहीं है। 


अति सूधो स्नेह का मारग है यहान नेक सयानाप नाहिं 

हटयोग कष्ट साध्य है। 

If one is riding a bicycle and presses the brakes to stop the forward motion ,he will be in an unstable condition ,but if the cyclist simple turns the handle to the left or right ,the bicycle will easily stop its forward motion and still remain stably balanced .


भक्ति मार्ग में इन्द्रियों के विषय बदल जाते हैं भगवान् की  और जाता है यह रास्ता यहाँ बस दिशा परिवर्तन है। निग्रह नहीं हैं हट नहीं है ,भक्ति  योग है   । जीव का ब्रह से आत्मा  का परमात्मा से दिव्य मिलन है।  


ॐ शान्ति 


2 टिप्‍पणियां: