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रविवार, 6 अक्तूबर 2013

एक घड़ी आधी घड़ी ,आधी से पुनि आध , तुलसी संगत साध की ,काटे कोटि अपराध। जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज

एक घड़ी आधी घड़ी ,आधी से पुनि आध ,


तुलसी  संगत साध की ,काटे कोटि अपराध। 


जगदगुरु श्री कृपालुजी  महाराज 


शाश्वत भाव से सदा सर्वदा मुक्त यदाकदा हमारे इस गृह पर जहां इत्तेफाक से जीवन भी है ऐसे दिव्यव्यक्तित्व के स्वामियों का जन्म होता है जिनका मकसद होता है जनकल्याण। जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज ऐसी ही रूहानी हस्ती हैं। अपने शिष्यों के बीच इन्हें "महाराजजी "नाम से ही पुकारा जाता है। 


उत्तर प्रदेश के  इलाहाबद के पास एक छोटे से गाँव  मानगढ़ में शरत पूर्णिमा की रात को आपका जन्म सन १९२२ ईसवी को  हुआ।बचपन से ही आप कुशाग्र बुद्धि के स्वामी थे। १४ साल की अल्पआयु में ही आप काशी ,चित्रकूट और इंदौर विश्वविद्यालयों में अध्ययन के लिए पहुंचे। 

ढाई साल की अल्पावधि में ही आपने वहां कई पाठ्यक्रम संपन्न किये। 

सोलह बरस की उम्र में आप पढ़ाई लिखाई से अलग होकर चित्रकूट के सघन जंगलों में पहुँच गए। वहां आप राधाकृष्ण के प्रति अपने अनन्यप्रेम में समाधिस्थ हो गए। कई कई दिनों तक आप इस अवस्था में अन्न-जल  ग्रहण नहीं करते थे जैसे बाहरी चेतना से आपका संपर्क ही टूट जाता हो अन्तश्चेतना शेष रह जाती हो। 


कई कई दिनों तक आप "महाभाव "में भाव समाधि लगाते रहते थे। स्वयं कृष्ण की आराध्य राधारानी में प्राकट्य होता है इस "महाभाव "का। पांच सौ बरस पहले इस महाभाव  में चैतन्य महाप्रभु ने भी गोते लगाए थे। दो बरस की साधना के बाद आप राधा कृष्ण के प्रति अपने दिव्य प्रेम को प्रसाद के रूप में बाँटने निकल पड़े जंगल छोड़ इस जगत की ओर जन कल्याण हेतु। 


भक्ति साहित्य :

राधाकृष्ण की लीलाओं में स्वयं डूबकर आपने सैंकड़ों पदों और साखियों की रचना की है। आपकी शैली में अपना एक वैशिष्ठ्य है जिसकी तुलना सिर्फ आपसे ही की जा सकती है। आप गाते गाते और पद जोड़ने लगते हैं संकीरतन की पदावली में। 

कीर्तन जागरण :

उत्तर प्रदेश और राजस्थान में आपनेअपने  कीर्तनों से एक अलख  ही जगा दी थी । रात रात भर चलते थे ये कीर्तन। मीराबाई ,सूरदास ,तुलसी बाबा , रसखान का रस मिलेगा आपको जगद्गुरु कृपालुजी महाराज रचित "कीर्तनों" में।

जगदगुरूत्तम :

कलियुग के गत पांच हज़ार बरसों में आदिनांक केवल पांच शख्शियतों को आदि जगदगुरुओं (Original Jagadagurus)का दर्जा (पदवी )प्राप्त हुई है। ये हैं क्रमश :

(१) जगद्गुरु शंकराचार्य 

(२ )जगद्गुरु निम्बार्काचार्य 

(३)जगद्गुरु रामानुजाचार्य 

(४)जगदगुरु माधवाचार्य 

जनवरी १९५७ में काशी विद्वत परिषत (Kashi Vidvat Parishat ) ने आपको संभाषण के लिए आमंत्रित  किया था।इस संस्था से शीर्ष  ५००अध्येयता , वैदिक साहित्य के  जुड़े हुए रहे हैं।सभी ने मुक्त कंठ से माना आप सबसे अग्रणी हैं आध्यात्मिक ज्ञान और वैदिक साहित्य  के अंतिम आगार हैं। इसी संभाषण श्रृंखला के दौर विद्वत परिषत ने आपको जगद्गुरु के ओहदे से विभूषित किया। 

इसी संस्था ने आपको जगदगुरुत्तम (Supreme amongst all Jagadgurus )भी घोषित किया। बाद इस के आपने भारत देश का व्यापक भ्रमण किया। महीना महीना आपके प्रवचनों का सिलसिला नगर नगर चला। मकसद एक ही था हमारी आध्यात्मिक विरासत वैदिक साहित्य से जन जन को वाकिफ करवाना। 

आज इनके शिष्य अनेक देशों में अपनी सेवाएं दे रहें हैं। इनमें से एक स्वामीमुकुंदानंद जी का सानिद्द्य हमें यहाँ अमरीका में प्राप्त हुआ।  एक सप्ताह तक प्रति दिन उनके प्रवचनों का आस्वादन किया। 

जगद्गुरु कृपालु परिषत आज महाराज के काम को आगे बढ़ा रही है। महाराजजी स्वयं भी नब्बे के पार जा रहे हैं फिर भी राधा भाव में प्रवचन करते हैं। 

भारत में जगद्गुरु कृपालुयोग ट्रस्ट ,अमरीका में जगद्गुरु कृपालुजी योग सक्रिय है। दुनिया के अनेक नगरों में आज राधा गोविन्द धाम खड़े हैं। 

संपर्क सूत्र :

www.jkyog.org

व्यक्ति का सही परिचय उसकी वाणी उसका संभाषण होता है सुनिए "महाराजजी" को :

  

  1. Kripaluji Maharaj - Singapore Lecture [Subtitled]

    An incredible lecture given by Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj during His first and much-anticipated visit to Singapore in 2007.







1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (07-10-2013) नवरात्र गुज़ारिश : चर्चामंच 1391 में "मयंक का कोना" पर भी है!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का उपयोग किसी पत्रिका में किया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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